बिना सन्दर्भ समझे गांधी कथन को quote न करें, वरना होगा अर्थ का अनर्थ

गांधी से जूझने से पहले वो जमाना पढ़िए और उसकी मोटी-मोटी समझ बनाइये। साफ बात कि भारत का राष्ट्रीय आंदोलन, स्वतंत्रता संघर्ष जानिए। वहां के हालात, पृष्ठभूमि की बैकग्राउंड में गांधी को फिक्स करिये। ...

अतिथि लेखक

गांधी।

आलोक वाजपेयी

गांधी पर जरूरी किताबें बताने से पहले कुछ सामान्य बातें।

खुद गांधी द्वारा लिखे से शुरुआत करेंगे तो फंसने की बहुत सम्भावना रहेगी। गांधी कोई यूनिवर्सिटी प्रोफेसर की तरह बहुत कम ही लिखते हैं। जो चलन है आधुनिक दुनिया में लिखने और भाषा का, उसे भी गांधी बहुत कम इस्तेमाल करते हैं। इसलिए गांधी से जूझने से पहले वो जमाना पढ़िए और उसकी मोटी-मोटी समझ बनाइये। साफ बात कि भारत का राष्ट्रीय आंदोलन, स्वतंत्रता संघर्ष जानिए। वहां के हालात, पृष्ठभूमि की बैकग्राउंड में गांधी को फिक्स करिये। तब आप सच में महसूस करेंगे कि अन्य किसी भी व्यक्ति/ नेता की तरह ही गांधी भी थे। बस वो गांधी कैसे बन सके ये पड़ताल का विषय है।

गांधी को भांपने के लिए गांधी शब्दों सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, आदि आदि से परे जाना होगा। अगर इन शब्दों से ज्यादा प्रभावित हो जाएंगे तो एक अमूर्त नैतिकतावादी विमर्श में फंस जाएंगे और नतीजा कि ढाक के तीन पात। इन भारी भरकम शब्दों को बस Gandhian Dialectic की तरह से लीजिये जिस पर बाद में बताएंगे।

बिना सन्दर्भ समझे गांधी कथन को quote करें, वरना होगा अर्थ का अनर्थ

गांधी चूंकि मूलतः राजनीतिक थे, इसलिए उनकी हर बात का एक सन्दर्भ है, बिना सन्दर्भ समझे गांधी कथन को quote करेंगे तो अर्थ का अनर्थ करेंगे जैसा कि खूब हुआ है।

तो अब कुछ किताबें। बहुत ही सूक्ष्म बताएंगे वरना लिस्ट बहुत लंबी और बोझिल हो जाएगी जिसका यहां मतलब नहीं।

Richard Gregg की the power of non violence, krishna lal sridharani की किताब, joan v bondurant की किताब सबसे जरूरी किताबें हैं जो बहुत गंभीर अध्धयन की मांग करती हैं।

कृपलानी की Gandhi : his life and thought एक चुनौती है गांधी पे, उसे जरूर पढ़िए।

बिपन चन्द्र की Long Term Dynamics एक ऐसी किताब है जिसे जितनी भी बार पढ़िए नई अंतर्दृष्टि मिलेगी। जब तसल्ली से ये हो जाये फिर तेंदुलकर की गांधी पर जीवनी पढ़िए। इसके अलावा जीवनी बहुत सी हैं जो आपका मन करे।

गांधी की आखिरी किताब नहीं है हिन्द स्वराज

गांधी की आत्मकथा और हिन्द स्वराज से शुरू में दूर रहें तो अच्छा। खासकर हिन्द स्वराज से। हिन्द स्वराज को केंद्र में रखकर गांधी को समझेंगे तो बस एक उबलते मन के स्वामी होकर रह जाएंगे जिसे सब खराब खराब दिखेगा। हालांकि जिसे देखिये वही हिन्द स्वराज पे किताब ठोंके बैठा है, लेकिन उस किताब का मर्म बहुत कम लोग ही समझे होंगे। माफ करियेगा, वो किताब बहुत परिपक्वता की मांग करती है और गांधी की आखिरी किताब नहीं है।

(आगे अब गांधी के जीवन से छोटे छोटे प्रसंग उठाकर समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर ये बन्दा था क्या)

लेखक, इतिहासकार हैं।

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