भाजपा से सीखो भ्रष्टाचार को शिष्टाचार कैसे बनाया जाता है

अमित शाह के बेटे जय शाह ने खेती की उपज की शेयर बाजार में सौदेबाजी और ऑप्सन-फ्यूचर की दलाली के धंधे से साल भर में अस्सी करोड़ रुपए की कमाई की. उनकी आमदनी में 16000 गुने का जो उछाल आया ...

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हाइलाइट्स

अमित शाह के बेटे जय शाह ने खेती की उपज की शेयर बाजार में सौदेबाजी और ऑप्सन-फ्यूचर की दलाली के धंधे से साल भर में अस्सी करोड़ रुपए की कमाई की. उनकी आमदनी में 16000 गुने का जो उछाल आया उसका 95 फीसदी हिस्सा खेती की उपज की सौदेबाजी से ही आया

दिगंबर

अमित शाह के बेटे जय शाह ने खेती की उपज की शेयर बाजार में सौदेबाजी और ऑप्सन-फ्यूचर की दलाली के धंधे से साल भर में अस्सी करोड़ रुपए की कमाई की. उनकी आमदनी में 16000 गुने का जो उछाल आया उसका 95 फीसदी हिस्सा खेती की उपज की सौदेबाजी से ही आया.

भारत सरकार के सोलिसिटर जेनरल और जय शाह के वकील का कहना है कि खेती की उपज की सौदेबाजी से एक साल में 80 करोड़ कमा लेना गैरवाजिब या गैरकानूनी नहीं है.

मेरे ख्याल से इस मुद्दे को महज पिता-पुत्र-वंशवाद को बढ़ावा दिए जाने, भ्रष्टाचार के खिलाफ आग उगलते हुए सता हथियाने वालों के दोमुंहेपन, विरोधियों के साथ कठोरता और अपनी पार्टी वालों के साथ नरमी जैसे पहलू से ही नहीं देखना चाहिए.

संभव है कि यह मामला मौजूदा कानून के फ्रेमवर्क में गैरवाजिब या गैरकानूनी न हो. लेकिन निस्संदेह, यह खुलासा इस बात की एक और ताजा मिसाल है कि कानून में फेर-बदल करके किस तरह भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बना दिया जाता है.

खेती की उपज पर सट्टेबाजी हमारे यहाँ कुछ साल पहले तक गैरवाजिब और गैरकानूनी ही हुआ करती थी. सट्टेबाजी, जमाखोरी, काला बाजारी के खिलाफ कुछ दशक पहले तक कड़े कानून थे, जिसकी चपेट में आने वाले सेठ जेल में चक्की पीसते थे. अब यह एक सम्मानजनक पेशा हो गया है.

1991 में नवउदारवादी नीतियाँ, यानी निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण लागू होने के बाद शेयर बाजार में ऑप्सन, फ्यूचर, डेरिवेटिव्स और बेनामी रुक्कों के जरिये सट्टेबाजी को बढ़ावा दिया गया. लेकिन खेती की उपज के मामले में इसकी इजाजत देने को लेकर नीतिनिर्माताओं के बीच काफी बहस हुई. विरोध करनेवालों का तर्क था कि इससे बिना वास्तविक उत्पादन और खरीद-बिक्री के दलालों और सटोरियों की कमाई बढ़ेगी, समर्थकों का कहना था कि इससे वेदेशी सटोरिये देश में डालर लायेंगे तो विदेशी मुद्रा बढ़ेगी.

आज खेती की उपज में औप्सन-फ्यूचर ट्रेडिंग का कारोबार रोकेट की रफ़्तार से बढ़ रहा है. इस काम को संचालित करने के लिए बजाप्ता हमारे यहाँ राष्ट्रिय स्तर पर दो संस्थाएँ काम कर रही हैं-- National Commodity and Derivatives Exchange (NCDEX) और Multi Commodity Exchange of India (MCX). यानी सटोरियों की सहूलियत के लिए दो सरकारी एजेंसियाँ सेवारत हैं. पिछले साल जुलाई में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक NCDEX में खेती की उपज पर ऑप्सन-फ्यूचर का कुल कारोबार में हिस्सा 98.6 प्रतिशत था, जबकि सोना-चाँदी का हिस्सा महज 1.4 प्रतिशत.

सोचिये-- जिन फसलों को उगाकर देश के किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं, वे सटोरियों की तिजोरी में सोना-चाँदी की बरसात करते हैं. सबकुछ कानून सम्मत. असली मामला यहाँ है.

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दिगंबर जी की फेसबुक टाइमलाइन से साभार

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