जोर का झटका धीरे से… पलट रही है राजनीतिक हवा

इसके लिए किसी सबूत की जरूरत तो नहीं होनी चाहिए कि मोदी सरकार के कार्यकाल के आखिरी विधानसभाई चुनावों में लगे जोरदार झटके से, मोदीकृत भाजपा के हाथ-पांव फूल गए हैं।...

जोर का झटका धीरे से… पलट रही है राजनीतिक हवा

Analysis on election results of 5 states

0 राजेंद्र शर्मा

इसके लिए किसी सबूत की जरूरत तो नहीं होनी चाहिए कि मोदी सरकार के कार्यकाल के आखिरी विधानसभाई चुनावों में लगे जोरदार झटके से, मोदीकृत भाजपा के हाथ-पांव फूल गए हैं। फिर भी, पिछले एक हफ्ते में ही इसके कम से कम तीन महत्वपूर्ण संकेत सामने आ चुके हैं। बेशक, इनमें पहला सबूत तो बिहार के लिए भाजपा द्वारा आखिरकार स्वीकार किया गया सहयोगी पार्टियों के साथ सीटों का बंटवारा ही है। इस बंटवारे के फार्मूले जितना ही महत्वपूर्ण है, चुनाव से करीब चार महीने पहले ही इस सीट बंटवारे का सार्वजनिक रूप से एलान किया जाना। यह संयोग ही नहीं है कि बिहार ऐसा पहला ही राज्य है जहां भाजपा ने, सहयोगी पार्टियों के साथ सीटों के बंटवारे का तुरंत एलान करना जरूरी समझा है, जिसके लिए नया साल शुरू होने तक भी इंतजार नहीं किया जा सकता था। कहने की जरूरत नहीं है कि समझौते के एलान की इस जल्दी का सीधा संबंध, बिहार में एनडीए में शामिल भाजपा-इतर दलों की बढ़ती बेचैनी से है, जिसकी अभिव्यक्ति पांच राज्यों के विधानसभाई चुनावों के नतीजे आने से ऐन पहले, आरएसएलपी नेता कुशवाहा के अंतत: मोदी सरकार तथा एनडीए से नाता तोडऩे का एलान करने में ही हुई थी।

          बेशक, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि नीतिश कुमार के नेतृत्व में जदयू को, बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को बुरी तरह हराकर सत्ता में आए विपक्षी ‘‘महागठबंधन’’ से तोडऩे और नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार को ही एनडीए की सरकार में तब्दील करने के, संघ परिवार के ‘‘मास्टरस्ट्रोक’’ के बाद, बिहार में एनडीए में समीकरण बहुत बदल गए थे। एक ओर अगर इस मास्टरस्ट्रोक ने प्रकटत: ताकतों के समीकरण को भाजपा के नेतृत्ववाले एनडीए के पक्ष में झुका दिया था, तो दूसरी ओर नीतिश-कुशवाहा टकराव जैसी समस्याएं पैदा करने के अलावा भी, भाजपा और अन्य सहयोगी दलों के बीच की खींच-तान को भी बढ़ा दिया था। इसका काफी कुछ संबंध इस तथ्य से था कि करीब 17 फीसद मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में, जिसमें पूर्वांचल की कई सीटों पर तो मुस्लिम आबादी पचास फीसद तक है, मोदी राज में भाजपा के साथ गठबंधन एक अतिरिक्त कीमत की मांग करता है, जिसमें सरकार तथा सत्ताधारी पार्टी के बहुसंख्यकवादी आचरण को अंकुश में रखना भी शामिल है। इस अतिरिक्त कीमत की जरूरत तब और मुखर हो गयी, जब नीतिश कुमार को शामिल कर बिहार में नया एनडीए गठजोड़ बनने के बाद हुए विधानसभाई और लोकसभाई उपचुनावों में, राजद के नेतृत्व में बचा हुआ विपक्षी ‘‘महागठबंधन’’ साफ तौर पर भारी पड़ता दिखाई दिया। लेकिन, जहां अतिरिक्त कीमत की यह मांग बढ़ रही थी, वहीं मोदी-शाह की भाजपा तो ऐसी कोई भी मांग सुनने के लिए तैयार ही नहीं थी। इससे सत्ताधारी गठजोड़ का अंदरूनी तनाव काफी बढ़ चला था।

          मोदी राज के चौथे साल में जैसे-जैसे मोदी का जादू उतार पर होने का सच उजागर होता गया, वैसे-वैसे यह तनाव बढ़ता गया। 2017 के दिसंबर में हुए गुजरात के चुनाव में, मोदी के अपना पूरा जोर लगाने के बावजूद भाजपा का मुश्किल से बहुमत का आंकड़ा छू पाना, जैसे इसका एलान ही था कि हवा मोदी राज के खिलाफ होती जा रही है। इसके बाद, कर्नाटक में कांग्रेस से लगभग सीधे मुकाबले में भाजपा बहुमत पाने में ही विफल नहीं रही, जोड़-तोड़ की अपनी तमाम कोशिशों तथा राज्यपाल के पद के नंगे इस्तेमाल के बावजूद, अपनी सरकार बनवाने में भी विफल रही। इसके साथ ही मोदी के विजय रथ के पहिए जमीन में धंसने लगे और साल के आखिर तक आते-आते तो उन्हें जोरदार तरीके से पीछे ही धकेला जा चुका है।

          बेशक, यह तो कहना पड़ेगा कि खासतौर पर गुजरात के चुनाव के बाद से, हवा का रुख खिलाफ मुड़ता देखकर, अमित शाह को भी बिहार में सहयोगी दलों की मांगों को एक  हद तक सुनना जरूरी लग रहा था। तीन उत्तर भारतीय राज्यों में भाजपा की हार के जोरदार झटके से पहले ही, नीतिश कुमार लगातार दबाव डालकर, शाह से पर्याप्त समय रहते गठबंधन के सहयोगियों के बीच सीटों का बंटवारा किए जाने की जरूरत मनवाने में ही नहीं, इसका आश्वासन भी निकलवाने में कामयाब रहे थे कि नीतिश कुमार की पार्टी बिहार में एनडीए की ओर से, भाजपा जितनी ही सीटें पर ही चुनाव लड़ेगी। इसके साथ ही, जदयू के लिए जगह बनाने के लिए, भाजपा के अलावा एनडीए के अन्य घटकों को भी 2014 के आम चुनाव के मुकाबले कम सीटों पर लडऩे के लिए राजी करने की लंबी खींचतान शुरू हो गयी। इसी खींच-तान में, पहले ही एनडीए से बगावत की मुद्रा अपनाए, कुशवाह ने एनडीए से नाता ही तोड़ लिया। इसने, एनडीए के वोट के समीकरण को कमजोर करने के ऊपर से, इसका संकेत और दिया कि इस गठजोड़ का तो बिखरना भी शुरू हो गया है।

           तीन राज्यों के धक्के के बाद, आम तौर पर बिहार में एनडीए के भाजपा-इतर दलों ने और खासतौर पर रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने, दबाव और बढ़ा दिया। पासवान के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले, चिराग पासवान ने तो नोटबंदी के औचित्य तथा मंदिर निर्माण को एनडीए के एजेंडे पर लाने की कोशिशों पर भी सवाल उठाकर, इसके संकेत देने भी शुरू कर दिए थे कि लोजपा भी, बेहतर मौकों की तलाश में कुशवाह के  रास्ते पर जा सकती है। करीब 6 फीसद वोट खींचने में समर्थ लोजपा का अलग होना, बिहार में एनडीए के पूरे समीकरण पर ही पानी फेर देता और भाजपा की दलितविरोधी छवि को और मजबूत कर देता, वह अलग। नतीजा यह कि नीतिश-पासवान की जोड़ी, गठबंधन में भाजपा से घुटने टेकवाने में कामयाब रही। अंतत: अमित शाह को इसका सार्वजनिक एलान करना पड़ा कि पिछले चुनाव में 22 सीटें जीतने के बाद, भाजपा 2019 में बिहार में 40 में से सिर्फ 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि जदयू भी 17 सीटों पर ही लड़ेगी और लोजपा 6 सीटों पर और पिछले चुनाव में लड़ी सातवीं सीट के एवज में रामविलास पासवान के लिए राज्यसभा की सीट दी जाएगी, वह भी जल्द ही यानी आम चुनाव से पहले। इस तरह बिहार में भाजपा को, लोकसभा की पांच और राज्यसभा की एक सीट का घाटा तो चुनाव से पहले ही हो चुका है। जाहिर है कि इसके बाद भी इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि राजनीति के ‘‘मौसम वैज्ञानिक’’ कहलाने वाले रामविलास पासवान, चुनाव तक एनडीए के साथ टिके ही रहेंगे, फिर भाजपा के गठजोड़ के चुनाव में विपक्ष पर भारी पडऩे की गारंटी का तो सवाल ही कहां उठता है।

          दूसरा, ऐसा ही महत्वपूर्ण संकेत, महाराष्ट्र में शिव सेना के भाजपा से गठजोड़ के लिए करीब-करीब नाक रगड़वाने का है। बिहार के विपरीत, महाराष्ट्र के मामले में शिव सेना ने, भाजपा के साथ गठजोड़ करने में अब तक शायद ही कोई दिलचस्पी दिखाई है। उल्टे मोदी के राज के करीब-करीब पूरे दौर में शिव सेना, भाजपा से उलझती ही रही है और पिछले करीब दो साल से तो मोदी सरकार और भाजपा की तीखी आलोचनाएं ही करती आयी है। महाराष्ट्र में इस दौरान हुए कई चुनावों में, जिनमें दो लोकसभाई सीटों का उपचुनाव भी शामिल है, दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ी भी हैं और शिव सेना लगातार एक तरह से एनडीए के दरवाजे पर ही खड़ी रही है। मोदी की भाजपा के घटते जनसमर्थन को थामने के लिए, आरएसएस के अयोध्या में मंदिर निर्माण के मुद्दे को उछालने के बाद से तो, शिव सेना ने इसे लेकर मोदी राज पर हमले और तेज कर दिए हैं। इसके बावजूद, पिछले कुछ महीनों में कई मौकों पर खुद अमित शाह ने यह उम्मीद जतायी है कि शिव सेना के साथ भाजपा का गठजोड़ कायम रहेगा। इन्हीं हालात में तीन राज्यों में भाजपा की हार के बाद, शिव सेना ने मोदी राज पर हमले और तेज कर दिए हैं। यहां तक कि शिव सेना सुप्रीमो, उद्घव ठाकरे ने तो कार्यकाल के आखिर में जागने के लिए खुद प्रधानमंत्री मोदी को ‘‘कुंभकर्ण’’ के विशेषण से विभूषित करना और रफाल के सिलसिले में ‘‘चौकीदार, चोर है’’ का नारा दोहराना भी शुरू कर दिया है। अंतत: महाराष्ट्र में क्या होता है यह तो वक्त ही बताएगा, पर इस संख्यात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा फिलहाल मजबूरी में, गालियां खाकर भी मुस्कुरा कर दिखाने की कोशिश में लगी हुई है। उसे लगता है, जो एकदम गलत भी नहीं है कि, शिव सेना के लिए भी कोई दूसरा ठिकाना नहीं है।

          तीसरा महत्वपूर्ण संकेत, पूर्व-भाजपा अध्यक्ष और मोदी सरकार में वरिष्ठ मंंत्री, नितिन गडकरी के भाषणों में मिल रहा है। गडकरी ने तीन राज्यों में भाजपा की हार की पृष्ठभूमि में एक ही हफ्ते के दौरान एक से ज्यादा मौकों पर हार तथा नाकामियों की जिम्मेदारी न लेने वाले नेतृत्व की आलोचना की है। हालांकि, उनका निशाना अमित शाह पर ही माना जा रहा है, उन्होंने ‘अच्छा वक्ता होने से जीत नहीं मिलती है’, ‘खुद को सब कुछ जानने वाला मानना, आत्मविश्वास नहीं अहंकार है’ जैसी बातें भी कही हैं, जिनका निशाना खुद मोदी की तरफ माना जा रहा है। याद रहे कि तीन राज्यों की हार के बाद, खुद संघ परिवार में से इक्का-दुक्का ही सही, इसकी आवाजें भी उठनी शुरू हो गयी हैं कि भाजपा, मोदी-शाह जोड़ी की जगह, गडकरी जैसे किसी कम विरोध जगाने वाले चेहरे के साथ 2019 के आम चुनाव में जाएगी, तो उसकी कामयाबी की संभावनाएं ज्यादा होंगी। जिसे चुनाव में भाजपा के बहुमत से दूर रह जाने की स्थिति के लिए आरएसएस द्वारा तय किया गया विकल्प माना जाता था, उस पर अब चुनाव के लिए ही विचार किए जाने की पुकारें उठ रही हैं। तीन राज्यों की हार ने, 2019 के चुनाव में मोदी राज की विदाई को, वाकई एक वास्तविक संभावना के रूप में काफी नजदीक ला दिया है।         

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