आंकड़ें बताते हैं, देश में मोदी लहर नहीं, 2019 में योगी मोदी की लाचारी हैं

देश में मोदी लहर नहीं है। उल्टा  2019 के चुनाव में सत्ता विरोधी लहर की प्रवृत्ति का डर है। इसलिए  देश में लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले राज्य उ. प्र. में मोदी-शाह कोई गलती नहीं करना चाहते ...

अतिथि लेखक

 

2019 में योगी के कंधों पर मोदी लहर

अनुराग मोदी 

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद चारों तरफ मोदी लहर का डंका बजा रहा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष आमित शाह ने चुनाव नतीजों के बाद भाजपा की जीत को ना सिर्फ ऐतिहासिक बताया (जो उ. प्र. में कुछ मायनों में है भी), बल्कि मोदी को आज़ादी के बाद का सबसे शीर्ष नेता बता डाला। मतलब, उनके खुद के ऐतिहासिक पुरुष दीनदयाल उपाध्याय, नेहरु, पटेल, आम्बेडकर, लोहिया, जे. पी. और इंदिरा गांधी से भी आगे।

इस दावे और भारी बहुमत के बीच यह लग रहा था कि इंदिरा गांधी की तरह ही मोदी और अमित शाह के गठबंधन को को यह खुली छूट मिल गई है कि वो जिसे चाहें उ. प्र. का मुख्यमंत्री बनाएं; वो चाहें तो अब पत्थर को भी शालीग्राम बना दें। और, इसी अनुसार मोदी के विकास के वायदों और दावों को अमली ज़ामा पहनाने वाले नेता को कुर्सी पर बैठाने की बातें हो रही थी। और नतीजों के बाद दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पर हुई सभा में मोदी ने इस बात का इशारा भी किया था; उन्होंने नया भारत बनाने के साथ-साथ हारों हुओं का भी नेता होने का दावा किया था।

अनुराग मोदीलेकिन, इन दावों के कुछ दिनों के अंदर गोरख पीठ के प्रमुख एवं हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन करने के साथ ही अमित शाह ने जीत की बाद के अपने ही दावों की पोल खोल दी। इतना ही नहीं, पिछड़ों के नेता केशव प्रसाद मौर्या और अगड़ों के नेता दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी देकर समझौता करना पड़ा; हम सब जानते हैं, यह पद विद्रोह शांत करने के लिए होता है।

इससे 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति भी साफ़ हो गई: वो अगला चुनाव विकास और मोदी लहर के भारोसे भर पर नहीं लड़ेगी। कम से कम मोदीजी का 2019 का भविष्य तय करने वाले उ. प्र. जैसे सबसे महत्वपूर्ण राज्य में तो, वो योगी के भरोसेमंद हिंदूवादी कन्धों पर बैठकर और पिछड़ों-अगड़ों की दो बैसाखियों के सहारे लड़ा जाएगा।

अब यह सवाल यह है कि उ. प्र. के ऐतिहासिक जनादेश और अमित शाह के मोदी उवाच के बीच यह क्यों हुआ?  

असल में अमित शाह यह जानते हैं कि अगर देश में सही में मोदी लहर होती वो पंजाब में इतनी बुरी नहीं हारते और ना ही गोवा में इज्जत बचाने के लिए इतना सब लुटाना पड़ता। मगर, वो यह भी जानते हैं कि राजनीति में भी बाज़ार की ही तरह उसी ब्रांड का माल बिकता है, जिसकी मार्केटिंग बेहतरीन हो। और लोगों के को बार-बार यह एहसास कराया जाना जरुरी होता है कि उनका उत्पाद सबसे उत्तम है। इसलिए पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के सामने आने के बाद से वो एक कंपनी के सीईओ की तरह नरेन्द्र मोदी की ब्रांड चमकाने में जुट गए हैं।

हम अमित शाह के दावे को पहले वर्तमान में पांच राज्यों के नतीजों के सन्दर्भ में देखें।

इन पांच राज्यों में नतीजों पर अगर कोई एक मापदंड लागू होता है, तो वो है: सत्ताधारी दल के खिलाफ भारी असंतोष। इस असंतोष के चलते उ. प्र., और उत्तराखंड में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में भाजपा ने और पंजाब में कांग्रेस ने भाजपा गठबंधन के खिलाफ लगभग तीन चौथाई सीटें प्राप्त कीं।

गोवा में तो भाजपा के नतीजे उ. प्र. और पंजाब से बुरे रहे हैं; यहाँ  मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर सहित आठ में 6 मंत्री चुनाव हार गए, और यह तब हुआ जब रक्षा मंत्री मनोहर पारिकर पिछले दो माह से गोवा में चुनाव की कमान संभाले हुए थे। अगर वहां कांग्रेस चुनाव पूर्व गठबंधन कर लेती, तो शायद वहां भाजपा 2-3 सीटों पर ही सिमट जाती। यह अलग बात है, उन्होंने हर-तरह के जुगाड़-तुगाड़ कर वहां रक्षा मंत्री मनहोर पारिकर को दोबारा वहां का मुख्यमंत्री बनवा दिया।

अगर हम 2014 के बाद से देश में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें, तो हमें यह समझ आएगा ज्यादा राज्यों में राज्य में सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ एक सत्ता विरोधी लहर के चलते भाजपा ने सरकार जरूर बनाई; अनेक जगह अपना मत प्रतिशत पहले के मुकाबले बेहतर भी किया। लेकिन वो मोदी लहर और केंद्र में सशक्त और लोकप्रिय सरकार के चलते कहीं भी कोई ऐसा बड़ा जनादेश नहीं पा पाई, जिससे हम यह कह सकें जैसा अमित शाह ने कहा: “पूरे देश में मोदी लहर है और, वो आजादी के बाद के देश के सबसे बड़े नेता हैं”।

         इसके लिए हम मोदी के केंद्र में सत्ता में आने की बाद के विधानसभा चुनाव को देखते है और यह आकलन करते है कि वहां मोदी लहर थी या नहीं?

लोकसभा में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले अक्टूबर-नवम्बर 2014 में महाराष्ट्र, हरयाणा, झारखंड और जम्मू-काश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए थे।

हम पहले महाराष्ट्र के नतीजों को देखे; यहाँ  बड़े मतों से चुनाव जीतने के लिए भाजपा के लिए हर तरह से अनुकूल परीस्थिति थी। जैसे: बीते 15 सालों से कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (रांकाप) की सरकार सत्ता में थी, इसलिए वहां एक सत्ता विरोधी लहर थी; दूसरा, कांग्रेस और रांकाप अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे। तीसरा, केंद्र की कांग्रेस सरकार से नाराजगी ताज़ी थी और भाजपा को केंद्र में लोकप्रिय सरकार और नेता होने का फायदा भी था। करोड़ों रुपए की लागत से महाराष्ट्र के हर अखबार में मुख्य पृष्ठ पर पूरे पेज का मोदी की अपील वाला विज्ञापन तक दिया गया था, क्योंकि स्वभाविक रूप से चुनाव लड़ने की आर्थिक ताकत का फायदा भी भाजपा के पक्ष में था और कांग्रेस और रांकापा के अलग-अलग चुनाव लड़ने के बावजूद भाजपा को 288 में से122 सीटें ही मिली।

      चुनाव आयोग पार्टी को प्राप्त मतों को दो तरह से देता है: एक, प्रदेश में गिरे कुल मतों के साथ उनका प्रतिशत। और दूसरा, जिन सीटों पर पार्टी ने चुनाव लड़ा है, वहां उसका मत प्रतिशत; मैंने अपने लेख में इस दूसरे प्रतिशत का ही उपयोग किया है। क्योंकि, पार्टियों ने कभी गठबंधन में आधी सीटों पर ही चुनाव लड़ा और कभी अकेले सभी सीटों पर।             

हरियाणा में भी पिछले दस सालों से भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार होने से एक सत्ता विरोधी लहर थी। जिसके चलते यहाँ जरूर भाजपा का वोट प्रतिशत 9 से बढ़कर 33 हुआ; लेकिन उसे सीटे 90 में से 47 ही मिलीं। झारखंड में भाजपा का मत प्रतिशत 2009 में 24.44 था जो आल इण्डिया झारखण्ड स्टूडेंट्स युनियन के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन और सत्ता विरोधी लहर के चलते  2014 में यह  बढकर 35.16 हो गया। जम्मू और कश्मीर में जरुर भाजपा ने जम्मू क्षेत्र में सभी सीटें जीतीं, लेकिन उसके पीछे के कारण और भी हैं।

           अब अगर हम इसके बाद फरवरी 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजें देखें तो यह निकलकर आएगा कि मोदी लहर अरविन्द केजरीवाल के सामने बुरी तरह परास्त हो गई। इतना भारी जनमत तो मोदीजी को उ. प्र. में भी नहीं मिला। यहाँ भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नाम में वोट मांगे थे; वोट मांगते हर अख़बार में उनका प्रमुख पेज पर विज्ञापन भी था। और साथ ही, सारा केन्द्रीय मंत्रिमंडल चुनाव प्रचार में था। यहाँ 2013 में 70 सीट की विधानसभा में भाजपा की 31 सीटें थी; वो 2015 में घटकर मात्र 3 रह गईं।

           इसके बाद, नवम्बर 2015 में बिहार चुनाव हुए। यहाँ भी मोदीजी ने अपने नाम में ही वोट मांगे और चुनाव में गौ-वध से लेकर मतों का ध्रुवीकरण करने के लिए सारे मुद्दे उठाए। वहां तो 2005 से नितीश कुमार के साथ भाजपा सरकार में थी; सत्ता विरोधी लहर भुनाई जा सकती थी, लेकिन वहां उनकी सीट 91 से गिरकर 53 ही रह गई। यहाँ वो अन्य पार्टियों के गठबंधन में चुनाव लड़ी थी, इसे मिलाकर भी कुल 56 सीटें ही मिलीं। वहीं, इस मुकाबले में जद (यू), राजद और कांग्रेस के गठबंधन ने लगभग तीन चौथाई सीटे पाई।

             इसके बाद  अप्रेल-मई 2016 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु पौण्डिचेरी, आसाम, केरला मे हुए चुनाव नतीजों पर एक नज़र डालें। इसमें भाजपा को हिन्दूवाद और सत्ता विरोधी लहर के आलावा, सी बी आई व्दारा तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की जांच से भी फायदे की उम्मीद थी। लेकिन पश्चिम बंगाल में बिहार की ही तरह ममता के काम का डंका था, इसलिए सत्ता विरोधी और मोदी लहर वहां भी काम नहीं कर पाई और तृणमूल कांग्रेस ने तीन चौथाई सीटों पर विजय पाई – 293 में से 211। यहाँ भाजपा ने तीन सीटें जरूर जीतीं और वोट में उसकी हिस्सेदारी 4.14 से बढ़कर 10.28% हो गई। तमिलनाडु में जे. जय ललिता की ए. आई. ए. डीम. के. ने फिर से सत्ता हासिल की; यहाँ भाजपा की वोट हिस्सेदारी 2.55 से बढ़कर 3.57% भर हुई। केरला में सत्ता विरोधी लहर भाजपा ने नहीं बल्कि लेफ्ट गठबंधन ने भुनाई; हालांकि, भाजपा ने पहली बार एक सीट जीती। 2009 में उसने 140 में से 138 पर चुनाव लड़ा था, तब उसका मत प्रतिशत 6 था; 2016 में उसने एन डी ए गठबंधन में सिर्फ 90 सीटों पर चुनाव लड़ा तो उसका मत प्रतिशत बढ़कर 15 हो गया।  पौण्डिचेरी में वो कोई सीट नहीं जीत पाए।

आसाम में भाजपा गठबंधन ने जरूर 126 में से 86 सीटें पाई, लेकिन की जीत भी मोदी लहर नहीं बल्कि: एक तो, कांग्रेस व्दारा आल इण्डिया डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ समझौता नहीं कर पाने के कारण; और दूसरा, भाजपा व्दारा असम गण परिषद और बोडो पीपल्स फ्रंट के साथ समझौता था। बोडो पीपल्स फ्रंट पहले कांग्रेस के साथ थी, लेकिन 2014 में दिल्ली में सरकार बदलने के साथ भाजपा ने बोडो ट्राइबल कोंसिल को 1000 करोड़ के पैकेज के साथ सब उल्टा पलटा हो गया। 

ऊपर के आंकड़े हमें यह बताते हैं कि देश में मोदी लहर नहीं है। उल्टा  2019 के चुनाव में सत्ता विरोधी लहर की प्रवृत्ति का डर है। इसलिए  देश में लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले राज्य उ. प्र. में मोदी-शाह कोई गलती नहीं करना चाहते। यहाँ उन्हें योगी जैसे तेजतर्रार कट्टरवादी नेता के कंधों पर ज्यादा भरोसा है;  इन कंधों को अगड़ों और पिछड़ों के टेके से मजबूत भी कर दिया है।  

अनुराग मोदी, राष्ट्रीय सचिव, समाजवादी जन परिषद

 

 

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