गर्भ चीरने वाले बन गए, मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता

सन 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों में हिन्दू श्रेष्ठवादियों ने मुस्लिम महिलाओं के विरूद्ध घिनौनी यौन हिंसा की थी। उन्होंने गर्भवती मुस्लिम महिलाओं के पेट चीर कर गर्भस्थ शिशु को मारा तक था...

Irfan Engineer

-इरफान इंजीनियर

तीन तलाक के मुद्दे पर मीडिया में जो कुछ प्रकाशित व प्रसारित हो रहा है और इस मसले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो कह रहे हैं, उससे मुस्लिम समुदाय के अंदर लैंगिक न्याय का संघर्ष कमज़ोर हो रहा है।

मीडिया, तीन तलाक की पीड़िताओं का तमाशा बना रही है। टीवी चैनल कहीं से भी एक मौलवी को पकड़ लाते हैं और उससे ऊलजलूल बातें कहलवाकर पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करते हैं। मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक न्याय स्वयं के संघर्ष से ही प्राप्त हो सकेगा। हां, उन्हें प्रजातांत्रिक संस्थाओं से मदद की ज़रूरत पड़ेगी। इस मुद्दे के राजनीतिकरण से मुस्लिम महिलाओं के हितों को नुकसान पहुंचेगा।

मुस्लिम महिलाओं के लिए जो ज़रूरी है वह यह है कि वे एकजुट हों और स्त्रीवादी आंदोलन और उदारवादी प्रजातांत्रिक शक्तियों का सहयोग और समर्थन हासिल करें।

एक बार में तीन बार ‘तलाक‘ शब्द का उच्चारण कर, वैवाहिक संबंध तोड़ने की प्रथा इन दिनों इसलिए चर्चा में है क्योंकि उच्चतम न्यायालय इस मुद्दे पर सायरा बानो नामक महिला द्वारा दायर याचिका की सुनवाई कर रहा है। इस तरह के तलाक को ‘तलाक-ए-बिदत‘ ( तलाक की वह विधि जो धर्मशास्त्र की दृष्टि में गलत परंतु वैध है) कहा जाता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे तीन तलाक कहा जा रहा है।

उलेमा का कहना है कि तीन तलाक तब भी वैध है जब वह गुस्से में या नशे में दिया गया हो या फोन, एसएमएस या डाक के ज़रिए भेजा गया हो। इस विधि से जिस महिला को तलाक दिया जाता है, उसे तुरंत अपना वैवाहिक निवास छोड़ना पड़ता है। उसे आगे फिर कभी अपने पति के घर आने की इजाज़त नहीं होती और ना ही उसे अपने बच्चों से मिलने दिया जाता है।

तलाक की यह प्रथा घोर निंदनीय और घिनौनी है और इसका किसी भी तरह से बचाव नहीं किया जा सकता। इसके बाद भी, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय में दाखिल अपने शपथपत्र में तीन तलाक को शरिया कानून का हिस्सा बताया है।

बोर्ड का कहना है कि शरिया कानून, दैवीय है और मुसलमानों को उसका पालन करने का संवैधानिक अधिकार है। हम कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि तीन तलाक असंवैधानिक तो है ही, वह कुरान के भी खिलाफ है।

मुस्लिम महिलाओं के रक्षक

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मुद्दे पर भुवनेश्वर में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में 16 अप्रैल, 2017 को टिप्पणी करते हुए कहा,

‘‘हमारी मुस्लिम बहनों के साथ न्याय होना चाहिए। उनके साथ अन्याय नहीं होना चाहिए...अगर कोई सामाजिक बुराई है तो समाज को जागना चाहिए और न्याय प्रदान करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए’’।

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके अगले दिन, 17 अप्रैल, 2017 को, कहा,

‘‘जो लोग इस ज्वलंत मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं वे अपराधियों जैसे हैं’’। उन्होंने तीन तलाक की तुलना द्रोपदी के चीरहरण से की और समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की मांग की।

प्रधानमंत्री और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री, दोनों मुसलमान महिलाओं के रक्षक बन रहे हैं। वे उन्हें अमानवीय मुस्लिम पर्सनल लॉ के चंगुल से निकालने का दंभ भर रहे हैं। परंतु उन्हें उनके अतीत से जुड़े कई प्रश्नों का उत्तर देने की ज़रूरत है।

जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उस समय (2002) राज्य में हुए दंगों में मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अमानवीय यौन हिंसा हुई थी। उस समय दोनों में से किसी ने भी इस पर दुःख या पछतावा व्यक्त नहीं किया था और ना ही मुस्लिम महिलाओं के साथ हुए अन्याय के दोषियों को सज़ा दिलवाने की बात कही थी। उस समय उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह दी थी।

तत्कालीन गुजरात सरकार ने सांप्रदायिक दंगों के डेढ़ लाख से अधिक पीड़ितों, जो विभिन्न राहत शिविरों में बहुत बदहाली में अपने दिन बिता रहे थे, की किसी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया था।

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने एक समय यह कहा था कि अगर एक हिन्दू महिला की मुसलमान से शादी कर उसका धर्मपरिवर्तन करवाया जाता है तो सौ मुस्लिम महिलाओं की हिन्दू पुरूषों से शादी करवाकर उन्हें हिन्दू बनाया जाएगा!

गर्भ को चीरने वाले बने मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता

सन 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों में हिन्दू श्रेष्ठवादियों ने मुस्लिम महिलाओं के विरूद्ध घिनौनी यौन हिंसा की थी। उन्होंने गर्भवती मुस्लिम महिलाओं के पेट चीर कर गर्भस्थ शिशु को मारा तक था। अब वही लोग मुस्लिम महिलाओं की उनके पुरूषों के दमन से रक्षा करने का दावा कर रहे हैं।

मोदी ने गुजरात की हिंसा को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उसे क्रिया की प्रतिक्रिया बताया था। उन्होंने कभी इस बात पर अफसोस जाहिर नहीं किया कि उनकी नाक के नीचे वीभत्स हिंसा हुई। जिन लोगों पर बलात्कार और हिंसा के आरोप थे, वे लगातार बरी होते जा रहे थे। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष जांच दल का गठन किया। बिलकीस बानो बलात्कार कांड का मुकदमा मुंबई की एक अदालत में हस्तांतरित किया गया। इसके बाद ही कुछ आरोपियों को सज़ा मिल सकी।

मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलवाने के भाजपा के तथाकथित अभियान के राजनीतिक लक्ष्य हैं। जब मोदी प्रधानमंत्री और आदित्यनाथ मुख्यमंत्री नहीं थे, तब वे अत्यंत भद्दी भाषा में मुस्लिम समुदाय को कलंकित करते थे। गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी ने गौरव यात्रा निकाली।

इस यात्रा के दौरान सभाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि दंगा पीड़ितों के लिए स्थापित राहत शिविर बच्चे पैदा करने की फैक्ट्रियां बन गए हैं।

दंगों के बाद गुजरात में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी ने अपने भाषणों में ‘मियां मुशर्रफ मानसिकता’ पर निशाना साधा। संदेश यह था कि मुसलमान पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और उन्हें सबक सिखाने की ज़रूरत है।

अब, मुस्लिम महिलाओं के रक्षक का भेस धरकर मोदी और आदित्यनाथ वही कर रहे हैं - अर्थात मुस्लिम समुदाय को यह कहकर बदनाम करना कि उसकी परंपराएं महिलाओं के प्रति अन्यायपूर्ण हैं और यह कि मुसलमान महिलाओं का चीरहरण हो रहा है।

हिन्दू महासभा की महासचिव पूजा शकुन पांडे ने एक कदम और आगे जाकर यह कहा कि तीन तलाक की पीड़ित सभी मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू बन जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे ऐसी महिलाओं का विवाह करवाएंगी और उनका कन्यादान करेंगी। स्पष्टतः, हिन्दू श्रेष्ठतावादी, मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू बनाकर उन्हें हिन्दू पुरूषों को भेंट कर देना चाहते हैं ताकि हिन्दुओं की आबादी बढ़ सके और मुसलमानों की कम हो। वे मुस्लिम महिलाओं को अन्याय से मुक्ति दिलवाकर उन्हें हिन्दू पुरूषों की सम्पत्ति बनाना चाहते हैं।

हिन्दू श्रेष्ठतावादियों ने सन 1950 के दशक में डॉ. बी.आर अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए हिन्दू कोड बिल का जबरदस्त विरोध किया था। यह बिल हिन्दू महिलाओं को लैंगिक न्याय उपलब्ध करवाने के लिए बनाया गया था।

हिन्दू श्रेष्ठतावादियों को दहेज़ प्रथा, बालविवाह, कन्याभ्रूण हत्या इत्यादि से कोई समस्या नहीं है। उन्हें इस बात से भी कोई समस्या नहीं है कि महिलाएं किससे विवाह करें या न करें, इसका निर्णय उनके माता-पिता लेते हैं। उन्होंने कभी ‘ऑनर किलिंग’ का विरोध नहीं किया। रोमियो स्क्वाड और लव जिहाद जैसे अभियानों का मूल उद्देश्य यही है कि हिन्दू महिलाओं के उनका जीवनसाथी चुनने और अपनी मर्जी से कपड़े पहनने के अधिकार से वंचित किया जा सके। इस सरकार के कई मंत्री महिलाओं को यह सलाह दे चुके हैं कि उन्हें यौन हमलों से बचने के लिए उपयुक्त (अर्थात पारंपरिक) वस्त्र पहनने चाहिए। भाजपा सांसद साक्षी महाराज और आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिन्दू महिलाओं का आव्हान किया है कि वे कम से कम चार बच्चे पैदा करें। ऐसा लगता है कि वे यह मानते हैं कि महिलाएं अपने पतियों और अपने समुदाय के लिए बच्चे पैदा करने की मशीनें हैं।

जहां तक महिलाओं की भूमिका और उनकी स्थिति का प्रश्न है, हिन्दू श्रेष्ठतावादियों और मुस्लिम राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के बीच कोई विशेष अंतर नहीं है। दोनों ही महिलाओं को पुरूषों की संपत्ति मानते हैं और उन्हें पुरूषों के संपूर्ण नियंत्रण में रखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि महिलाएं केवल घर का काम करें, बच्चे पैदा करें और उन्हें पालें-पोसें। और अगर पुरूषों को उनकी आय की जरूरत हो तो घर से बाहर निकलकर भी मेहनत करें।

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धर्म का इस्तेमाल महिलाओं को गुलाम बनाए रखने के लिए किया जाता है। महिलाओं के दमन के लिए मुस्लिम पुरूषों के हाथों में तीन तलाक का अस्त्र है तो हिन्दू पुरूषों के पास खाप पंचायतें और घरेलू हिंसा है।

रणनीतियों और तरीकों में कुछ फर्क के बावजूद दोनों का उद्देश्य यही है कि महिलाओं को गुलाम बनाकर रखा जाए और वे केवल यौन आनंद की पूर्ति और वंश को आगे बढ़ाने का उपकरण बनी रहें।

मीडिया और मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने की कोशिश

मीडिया को जब भी मौका मिलता है, वह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसे किसी भी मुददे को उछालना शुरू कर देती है जिससे मुस्लिम समुदाय को कलंकित किया जा सके।

कुछ वर्ष पहले, टीवी चैनलों ने उस फतवे का व्यापक कवरेज किया था जिसमें यह कहा गया था कि इमराना, जिसके साथ उसके ससुर ने बलात्कार किया था, अपने पति की पत्नी नहीं रह गई है।

इसी तरह एक टीवी चैनल ने कई घंटों का कार्यक्रम प्रसारित किया था जिसका शीर्षक था ‘गुड़िया किसकी‘।

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गुड़िया एक मुस्लिम महिला थी, जिसने अपने सैनिक पति के लंबे समय तक लापता रहने के बाद एक दूसरे पुरूष से शादी कर ली थी। यह मान लिया गया था कि उसका पति मर चुका है। परंतु कुछ वर्षों बाद वह पाकिस्तान की एक जेल से रिहा होकर घर वापिस पहुंच गया। चैनल ने गुड़िया के अनेक रिश्तेदारों, कुछ मौलवियों, दूसरे पति और पूर्व पति को स्टूडियों में इकटठा कर लिया और गुड़िया की जिंदगी का तमाशा बनाया।

अधिकांश टीवी चैनल तीन तलाक के मुद्दे पर भी यही कर रहे हैं। वे कुछ मौलवियों को बुला लेते हैं जो अपने बेवकूफाना और भड़काऊ वक्तव्यों से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।

शो में त्रासदी का तड़का लगाने के लिए तीन तलाक की कुछ पीड़िताओं को बुला लिया जाता है जो अपनी करूण गाथा रूंधे गले और आंसू भरी आंखों के साथ सुनाती हैं। इसके बाद सभी प्रतिभागी एकसाथ चिल्लाने लगते हैं और एंकर उनके बीच युद्धविराम करवाने के असफल प्रयास में जुटा रहता है। जो इस्लामिक विद्वान तीन तलाक का समर्थन नहीं करते उनके लिए स्टूडियो के दरवाजे बंद रहते हैं।

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पीड़िताओं और मौलवियों के बीच बहस जितनी तीखी और कटु होती है दर्शकों का उतना ही मनोरंजन होता है। बीच-बीच में भाजपा के प्रवक्ता दर्शकों को याद दिलाते रहते हैं कि मोदी और योगी मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति के लिए आकाश से उतरे देवदूत हैं।

इस मुद्दे को उठाकर मोदी और योगी जैसे लोग मुस्लिम समुदाय को कलंकित करना तो चाहते ही हैं वे मुसलमानों को लैंगिक आधार पर विभाजित भी करना चाहते हैं। वे शियाओं और सूफियों के एक तबके को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास भी कर रहे हैं। जैसा कि सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा, भाजपा का लक्ष्य है मुस्लिम समुदाय को बांटना और हिन्दू समुदाय को एकजुट करना ताकि हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की राह प्रशस्त हो सके।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पहले तीन तलाक का बचाव कर और उसे दैवीय शरिया कानून का अविभाज्य हिस्सा बताकर स्वयं को हंसी का पात्र बना लिया। बाद में मीडिया की तीखी आलोचना से परेशान होकर उसने एक नया शोशा छोड़ा।

बोर्ड ने 16 अप्रैल को एक आचार संहिता जारी कर कहा कि जो लोग शरिया में दिए गए कारणों के अतिरिक्त किसी कारण से तलाक देंगे, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। सामाजिक बहिष्कार की यह बात केवल मीडिया के लिए कही जा रही है और इसका उद्देश्य तीन तलाक की अधम प्रवृत्ति को समाप्त करना नहीं है।

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यह आश्चर्यजनक है कि बोर्ड को सामाजिक बहिष्कार करने का विचार मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का सत्तर साल तक विरोध करने के बाद सूझा। इस अवधि में उसे कभी तीन तलाक की पीड़िताओं का ख्याल नहीं आया। बोर्ड इतना प्रभावशाली तो है कि वह दमन की शिकार महिलाओं को चुप कर सके और उन्हें अल्लाह के शाप का डर दिखा सके। परंतु वह इतना भी शक्तिशाली नहीं है कि वह प्रभावशाली लोगों का सामाजिक बहिष्कार सुनिश्चित कर सके। इसके अलावा, किसी का सामाजिक बहिष्कार करना महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में गैर-कानूनी है।

वैसे भी तीन तलाक देने वाले पुरूष का सामाजिक बहिष्कार होने से उस महिला को क्या मिलेगा जिसे खड़े-खड़े अपने पति के घर से बेदखल कर दिया गया हो। और अगर पुरूष ने नशे में या क्रोध के आवेश में ऐसा कर दिया हो और अगली सुबह वह पछताए तो उसे अकारण ही सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा।

आगे का रास्ता

इन परिस्थितियों में जो एकमात्र रास्ता उपलब्ध है वह है मुस्लिम महिलाओं और पुरूषों को शिक्षित और जागृत करना। उन्हें यह बताना होगा कि कुरान में यह कहा गया है कि मेलमिलाप के प्रयासों के बगैर तलाक देना गलत है।

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बोर्ड को मुस्लिम पर्सनल लॉ को कुरान की शिक्षाओं और लैंगिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप संहिताबद्ध करना चाहिए। इसके लिए सभी इस्लामिक विधिशास्त्रों में से अच्छी बातें ली जानी चाहिए। इस संहिता को संसद के समक्ष प्रस्तुत कर उसे कानून का स्वरूप दिया जाना चाहिए।

जब तक ऐसा नहीं होता तब तक भारतीय अदालतों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे मुस्लिम महिलाओ को न्याय दिलवाएं और उनके समानता के अधिकार की रक्षा करें। अदालतों को यह अधिकार भी है कि वे हनाफी, हनबली, मलिकी, एहल-ए-हदीद और शिया सहित विभिन्न इस्लामिक विधिशास्त्रों की इस तरह से व्याख्या करें जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हो।

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अगर राजनीतिक दल इस मुददे का किसी भी आधार पर राजनीतिकरण करेंगे तो वे देश और मुस्लिम समुदाय दोनों को हानि पहुंचाएंगे। शांति और न्याय उदात्त लक्ष्य हैं और इनकी तुलना किसी चुनाव को जीतने या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लाभ उठाने से नहीं की जा सकती। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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