स्कूली शिक्षा का मूल्यांकन जरूरी

शिक्षण के मूल्यांकन के लिए परीक्षाओं की एक सीमित भूमिका ही होनी चाहिए...

शिक्षण के मूल्यांकन के लिए परीक्षाओं की एक सीमित भूमिका ही होनी चाहिए

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीआई द्वारा आयोजित परीक्षाओं में से 10वीं के गणित और 12वीं के अर्थशास्त्र का प्रश्न पत्र लीक होना चिंताजनक है. इससे न सिर्फ लाखों छात्रों और उनके परिजनों को परेशानी होती है बल्कि यह भी पता चलता है कि पूरे तंत्र में किस तरह का भ्रष्टाचार व्याप्त है. पिछले कई हफ्तों से बोर्ड सवालों के घेरे में है. यह बोर्ड की जिम्मेदारी है कि वह प्रश्न पत्रों की गोपनीयता बनाए रखे और यह परीक्षा हाॅल में छात्रों के पास पहुंचने से पहले किसी और के हाथ न लगे.

इन परीक्षाओं को काफी अहमियत दी जाती है. माना जाता है कि अच्छे कॉलेज में दाखिले के लिए और भविष्य की राह आसान करने के लिए इनमें अच्छा अंक पाना पहली सीढ़ी है. हालांकि, यह एक अलग विषय है कि इन परीक्षाओं में हासिल अंक किसी छात्र की क्षमताओं और सोच के बारे में कुछ नहीं बताते. इस परीक्षा को तूल देने का काम बेहतर भविष्य की चाह में छात्र करते हैं, बच्चों और अपनी भविष्य की चिंता से परेशान अभिभावक करते हैं, अपनी जवाबदेही पूरा करने के चक्कर में शिक्षक करते हैं और अच्छा परिणाम देकर और छात्रों को आकर्षित करने के लिए स्कूल करते हैं. बोर्ड परीक्षाओं को लेकर बना यह माहौल एक पूरे उद्योग को बढ़ाने का काम करता है. ऐसे में प्रश्न पत्र लीक होना यह बताता है कि कैस स्कूल, कोचिंग सेंटर और सीबीएसई अधिकारियों की सांठगांठ चल रही है.

इस मामले को लेकर अब तक चर्चा दोषियों को पकड़ने, जिम्मेदारी तय करने और भविष्य में बेहतर प्रश्न पत्र प्रबंधन तक सीमित रही है. सीबीएसई के निदेशक और मानव संसाधन विकास मंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठी है. कई जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं. इन्हें अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि फिर से परीक्षा लेने के बारे में निर्णय लेने का अधिकार सीबीआई को है. बोर्ड को प्रभावित छात्रों को राहत देने और फिर से विश्वास हासिल करने के लिए काम करना होगा. लेकिन यह मामला हमें इस बात पर भी विचार करने का अवसर देता है कि इन परीक्षाओं को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है? तब भी जब ये बेहतर जीवन दे पाने में नाकाम हैं.

इन परीक्षाओं की आलोचना सालों से इस बात को लेकर होती रही है कि ये व्यापक शिक्षण को बढ़ावा नहीं देते. फिर भी यह सोच बनी हुई है कि चीजों को याद करना ही पढ़ाई करना है और ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत पाठ्यपुस्तक हैं. यह भी माना जाता है कि परीक्षाओं में अच्छा अंक हासिल करना ही भविष्य तय करता है.

कई शिक्षाविदों और सरकारी समितियों ने हमारे शिक्षा तंत्र की इस खामी को उजागर किया है. इसलिए एक वैकल्पिक सोच की आवश्यकता है. हमें ऐसे लोकतांत्रिक जगह बनाने की जरूरत है जहां चिंतनशील, संवेदनशील और विवेकशील युवाओं को तैयार किया जा सके न कि उन्हें परीक्षा पास करने का प्रशिक्षण दिया जाए. इसके लिए यह जरूरी है कि परीक्षाओं को लेकर जिस तरह की गंभीरता अभी बनी हुई है, उसे तोड़ा जाए.

यह काम करने के लिए हमें शिक्षण की प्रकृति और उद्देश्य को समझना होगा. साथ ही छात्रों और शिक्षकों की भूमिका को भी समझने की जरूरत है. स्कूलों में जिस तरह से शिक्षा दी जाती है और जिस तरह से इसे प्रमाणित किया जाता है, उसमें और बाहर की शिक्षा में भारी फर्क है. बाहर की दुनिया में बच्चों को लगातार चुनौतियों का सामना करते हुए सीखना पड़ता है. इसलिए शिक्षण को पाठ्यपुस्तकों से अलग करके इसे आम जीवन से जोड़ने की जरूरत है. शिक्षकों को इस प्रक्रिया में मददगार बनना चाहिए.

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मूल्यांकन की प्रक्रिया बदलनी होगी. यशपाल समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया राष्ट्रीय पाठ्यक्रम फ्रेमवर्क, 2005 और शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 लगातार चलने वाले व्यापक मूल्यांकन प्रक्रिया की वकालत करते हैं. इस पर ध्यान देना चाहिए.

हम परीक्षाएं अब भी इसलिए लेते हैं ताकि गैरबराबरी वाले इस समाज में ‘योग्यता’ के आधार पर लोगों की वरीयता तय की जा सके. सिर्फ प्रश्न पत्र लीक कराने के कसूरवारों को पकड़ने और भ्रष्ट लोगों को सजा दिलाने की कोशिशों के अलावा हमें यह प्रयास भी करना चाहिए कि शिक्षण प्रक्रिया तनावरहित हो और मूल्यांकन के लिए परीक्षाओं पर बहुत निर्भरता नहीं हो. हमारे बच्चों को सिर्फ परीक्षा में अच्छे अंक लाने और एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा का प्रशिक्षण नहीं मिलना चाहिए बल्कि एक बुद्धिमतापूर्ण, सार्थक, रचनात्मक और प्रसन्न जीवन जीने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए.

Economic & Political Weekly EPW

वर्षः 53, अंकः 14, 7 अप्रैल, 2018

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