अटल जी मैं शोक में नहीं हूँ, आपके मुक्तिगान की लय ढूंढ रहा हूँ

प्रधानमंत्री के द्वारा "राजधर्म" की नसीहत के खिलाफ "मुखौटा" चिपकाने वाले महान हिंदूपुत्र-गोविंदाचार्य जी के शब्दकोश में क्या वर्तमान प्रधानमंत्री के लिए एक भी "मुखौटा" शेष नहीं है?...

अतिथि लेखक
अटल जी मैं शोक में नहीं हूँ, आपके मुक्तिगान की लय ढूंढ रहा हूँ

पुष्पराज

आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी,

आप तो वर्षों से अचेतन थे। यह अचेतन-काया तो वर्षों से भूख, दर्द, सुख को महसूस करने की क्षमता खो चुकी थी। आपकी इस अचेतन काया को एक पूर्व-प्रधानमंत्री और एक भारत रत्न की काया जानकर कृतज्ञ राष्ट्र ने आपकी आखिरी साँस तक राष्ट्र की पूरी ताकत को आपके चरणों में समर्पित रखा। आपके वंदे-मातरम भारत में अभी भी करोड़ों लोग बेघर हैं, करोड़ों लोगों के पास अपने हिस्से की 2 गज जमीन मयस्सर नहीं है। करोड़ों लोग आपकी मौत की पूर्व-संध्या मादरे-वतन की आजादी के दिन भी एक वक्त भूखे ही सो गए। आपके मादरे-वतन में करोड़ों लोग बेहतर ईलाज के बिना तड़प-तड़प कर मरने के लिए अभिशप्त हैं। आपकी अचेतन काया के सम्मान में हर वर्ष आपके वतन का करोड़ों रूपया खर्च होता रहा।

आप तो पुनर्जन्म में यकीन रखते थे। संभव है कि मृत्यु उपरांत पुर्नजन्म से पूर्व आपकी आत्मा दिल्ली के लुटियन के टीले पर मँडरा रही हो। जिस तरह वर्षों अचेतावस्था में रहते हुए आपकी आत्मा को आपकी काया के साथ बेवजह बाँध कर रखा गया,जरूर आज आप उस बंधन से मुक्ति का मुक्तिगान लिख रहे होंगे।

आपकी आत्मा से संवाद करते हुए मैं आपके मुक्तिगान के लिए लय ढूंढ रहा हूँ। आपको कितना विचित्र लग रहा है कि आप "मुक्तिपर्व" का "मुक्तिगान" रच रहे हैं और आपका कृतज्ञ राष्ट्र शोक मना रहा है। एक कवि को मृत्यु उपरांत "मृत्यु उपत्य" की बजाय शोक के भँवर में धकेला जाए, यह आपकी अंतरात्मा को अगर अनुचित प्रतीत हो रहा है तो मैं  कृतज्ञ राष्ट्र के कृतज्ञ नागरिक की हैसियत से आपसे क्षमावन्दन चाहता हूँ लेकिन इस "उपसंहार-शोक" के लिए कहीं-न-कहीं आप भी जिम्मेवार हैं।

आपके प्रधानमंत्री-मुख पर आपके अपने "हिन्दूपुत्र" का दिया हुआ "मुखौटा" अगर तब चिपक गया था तो आपके उस "मुखौटा-मुख" से निकला "राजधर्म" आपके मुख से निकली अमरवाणी की तरह इतिहास में दर्ज हो गई है। 16 वर्ष पूर्व आपके प्रधानमंत्री-मुख से निकले उस "राजधर्म" का पालन आपकी मृत-काया की अंत्येष्टि आदि में जिस तरह किया जा रहा है, यह आपको कैसा लग रहा है, आप अपने पुनर्जन्म से पूर्व की कविता में जरूर प्रकट करेंगे।

16 वर्ष पूर्व आपके "राजधर्म" की नसीहत को हास्य में बदलने वाला विदूषक अब लाल किला की प्राचीर पर चढ़ कर खुद को राजाओं की तरह पेश करता है, तो जाहिर है कि वह 16 वर्ष पुराने "राजधर्म" को आज आपके श्राद्धकर्म के साथ क्षरित- विसर्जित कर रहा है।

मैं 16 वर्ष पुराने आपके उस "राजधर्म" का आपकी मौत के उपरांत जिस तरह क्रियान्वयन देख रहा हूँ, यह मेरे लिए असह्य है। प्रधानमंत्री के द्वारा "राजधर्म" की नसीहत के खिलाफ "मुखौटा" चिपकाने वाले महान हिंदूपुत्र-गोविंदाचार्य जी के शब्दकोश में क्या वर्तमान प्रधानमंत्री के लिए एक भी "मुखौटा" शेष नहीं है?

सादर अलविदा-पुष्पराज।।।

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