मोदी के उदय के साथ-साथ अटल जी अस्त होते चले गए और मोदी की ताजपोशी के साथ ही गुमनाम हो गए

भारत में दक्षिणपंथी राजनीति का सबसे अधिक समय तक नेतृत्व किया और खुद को उसके उदार चेहरे के रूप में स्थापित कर सकने में सफल रहे। ...

अतिथि लेखक
मोदी के उदय के साथ-साथ अटल जी अस्त होते चले गए और मोदी की ताजपोशी के साथ ही गुमनाम हो गए

मधुवन दत्त चतुर्वेदी

अटल जी नहीं रहे !

उन्होंने भारत में दक्षिणपंथी राजनीति का सबसे अधिक समय तक नेतृत्व किया और खुद को उसके उदार चेहरे के रूप में स्थापित कर सकने में सफल रहे। स्वतंत्रता संग्राम में अपनी नकारात्मक भूमिका के बाबजूद आजाद भारत के संसदीय व्यवहार में उन्होंने खुद को समायोजित किया। निःसंदेह सभी दक्षिणपंथियों की तरह वह भी असत्य-सेवक थे और संघ के स्वयंसेवक के रूप में उन्होंने भी साम्प्रदायिक वैमनस्य, विचारों में पुरातनता और पूंजी-परस्ती को आगे बढ़ाया था। वे व्यवहार में नम्र, ओजस्वी वक्ता, कवि-हृदय और भंगड़ी व्यक्ति थे।

वस्तुतः संघ के पास उनसे बेहतर चेहरा कोई था भी नहीं जिसे आगे रखकर संघ संसदीय राजनीति में हस्तक्षेप कर सके

नरेंद्र मोदी के उदय के साथ साथ वे अस्त होते चले गए और मोदी की ताजपोशी के साथ ही गुमनाम हो गए। वे बहुत दिन याद किये जायेंगे।

मथुरा से उनका अनुभव अच्छा नही रहा। यहां उनकी जमानत जब्त हुई थी। मैं श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को युद्ध की समाप्ति पर दिए उस उपदेश को याद कर रहा हूँ कि जीवन के अंत के साथ शत्रुता समाप्त हो जाती है, अतः अटल जी को मेरी श्रद्धांजलि !

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।