अटलजी के अंतिम संस्कार का प्रसारण : टीवी की मानक प्रसारण संहिता का उल्लंघन किया डीडी न्यूज़ ने

इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के समय डीडी न्यूज ने व्यापक कवरेज दिया और उस समय के प्रसारण और उसके प्रभाव को इंदिरा गांधी की हत्या और बाद में हुए सिख जनसंहार की जांच पर बने रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने ...

जगदीश्वर चतुर्वेदी
Updated on : 2018-08-18 09:46:19

अंतिम संस्कार और टीवी फंडामेंटलिज्म

जगदीश्वर चतुर्वेदी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम संस्कार के व्यापक टीवी कवरेज ने अनेक सवाल खड़े किए हैं। खासकर डीडी न्यूज ने जिस तरह कवरेज दिया, वह अपने आपमें विचारणीय है।

टीवी के लाइव प्रसारण के समय हमें बेहद सावधानी बरतने की जरूरत है, इसमें कवरेज हो लेकिन धर्म और कर्मकांड प्रसारण न हो। चूंकि यह दृश्य माध्यम है इसलिए इसमें प्रसारण के बाद चीजें वैसी नहीं रहतीं जैसी दिखती हैं। सतह पर यह बात तार्किक लगती है कि सामने जो घट रहा है, उसे ज्यों का त्यों दिखा दिया जाए, लेकिन यदि उसके प्रभाव के बारे में सतर्कता न बरती जाय तो स्थितियां खतरनाक शक्ल ले सकती हैं।

अटलजी के अंतिम संस्कार का प्रसारण और डीडी न्यूज

कल जब डीडी न्यूज अटलजी के अंतिम संस्कार का प्रसारण कर रहा था तो वह कई काम कर रहा था, एक तरफ सामने जो दिख रहा था उसे दिखा रहा था, वहीं समानान्तर हिन्दूधर्म के तमाम पिछड़े अंधविश्वासों को भी पेश कर रहा था। इन अंधविश्वासों में से एक है पुनर्जन्म। अटलजी की आत्मा नए रूप में फिर जन्म लेगी, इस बात को एनाउंसर ने कई बार रेखांकित किया। वहीं दूसरे चैनल अटलजी के व्यक्तित्व विवेचन में मशगूल थे।

इस समूचे प्रसारण में कई चीजें नई आईं, मसलन्, अटलजी की दत्तक पुत्री द्वारा मुखाग्नि दिए जाने को दिखाया गया। लड़की का अपने पिता को मुखाग्नि देते हुए दिखाया जाना, वह भी इतने व्यापक स्तर पर स्वयं में नई बात थी। यह अंतिम संस्कार करने में लड़की की भूमिका को व्यापक जनमानस में ले जाने वाली नई परिघटना थी। शास्त्रों में इसका प्रावधान है, लेकिन टीवी पर यह चीज पहली बार दर्शायी गयी। यह चीज भविष्य में अनेक नई बहसों को जन्म देगी।

दूसरी चीज घटी कि अंतिम संस्कार के मंत्रों का लाउडस्पीकर से अंत्येष्टि स्थल पर प्रसारण और फिर उसका साथ ही साथ टीवी चैनल से अबाधित प्रसारण, जबकि अन्य चैनलों ने बहुत कम समय इस क्षण को सीधे दिखाया।

अंत्येष्टि के प्रसारण के प्रभाव काफी खतरनाक हो सकते हैं। ऐसा नहीं है कि टीवी से पहलीबार अंत्येष्टि का लाइव प्रसारण हो रहा था, पहले भी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के अंत्येष्टि कार्यक्रम का लाइव प्रसारण हुआ है वहां पर वेदमंत्र भी पढ़े गए, लेकिन लाउडस्पीकर से प्रसारण नहीं था, वेदमंत्रों का टीवी कवरेज सुनाई नहीं दिया।

धार्मिक संस्कार के टीवी कवरेज से आम जनता में होता है साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण

सामान्य नियम है धर्म और धार्मिक संस्कार को यदि टीवी कवरेज के जरिए प्रसारित किया जाएगा तो प्रसारण के बाद वह अपना रूप बदल लेता है, वह फिर धर्म और धार्मिक संस्कार के कवरेज की बजाय साम्प्रदायिक इमेजों में अपने को रूपान्तरित कर लेता है। इससे आम जनता में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में मदद मिलती है। कल के अंतिम संस्कार के कवरेज ने प्रभाव स्वरूप यही काम किया है।

उल्लेखनीय है इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के समय डीडी न्यूज ने व्यापक कवरेज दिया और उस समय के प्रसारण और उसके प्रभाव को इंदिरा गांधी की हत्या और बाद में हुए सिख जनसंहार की जांच पर बने रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने विस्तार से अपनी रिपोर्ट में विश्लेषित किया था। रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गयी, लेकिन जो बातें मीडिया में छनकर सामने आईं उनमें यह तथ्य रेखांकित किया गया कि डीडी का कैमरा राजीव गांधी के कंधे पर केन्द्रित था, जिसमें उनके जनेऊ को बार-बार दिखाया गया,साथ ही आसपास नारे लग रहे थे खून का बदला खून से लेंगे। इस दृश्य का 30 मिनट तक प्रसारण होता रहा, जबकि कैमरे का एंगल नारेबाजों और राजीव गांधी के कंधे से हटाया जा सकता था।

टीवी की मानक प्रसारण संहिता का उल्लंघन

उस समय के प्रसारण की रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने गंभीर आलोचना की थी और इस तरह के प्रसारण को साम्प्रदायिक भावना पैदा करने के मुख्य कारकों में से एक माना था।

उस समय डीडी प्रमुख अधिकारी ने कमीशन के सामने दिए बयान में अपनी गलती को स्वीकारा भी था। अफसोस की बात है कि रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट की जानकारी होने के बावजूद मौजूदा डीडी अधिकारियों ने सावधानी नहीं बरती। लगातार अंतिम संस्कार के दृश्यों का लाइव प्रसारण किया, यह टीवी की मानक प्रसारण संहिता का उल्लंघन है।

टीवी का यह काम नहीं है कि वह प्रसारण के नाम पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करे। अंतिम संस्कार को दिखाना स्वयं में कर्म के नाम पर साम्प्रदायिक समाजीकरण है, इससे बचा जाना चाहिए। अंतिम संस्कार दिखाना टीवी का मकसद नहीं होना चाहिए, वह तो निजी कर्म है, वह राष्ट्रीय कर्म नहीं है, अंतिम संस्कार के सामाजिक-राजनीतिक आयाम को बताना और दर्शाना टीवी का काम है, लेकिन ज्योंही टीवी इस काम की बजाय हिंदूधर्म के सबसे दकियानूसी विचारों और अंतिम संस्कार के कर्मकांड का प्रसारण करने लगता है तो उससे समूचे प्रसारण का लक्ष्य ही बदल जाता है।

कल के प्रसारण में अंतिम संस्कार के क्षणों को दिखाने से बचने की जरूरत थी लेकिन यह सब न करके अंतिम संस्कार और उसके कर्मकांड को लाइव प्रसारित करके टीवी ने नए किस्म के फंडामेंटलिज्म को जन्म दिया है और उसके परिणाम हम भोगने के लिए अभिशप्त हैं।

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