युगपुरुष जी ! ऐसे होती है 'आम आदमी' की राजनीति!

आजकल बिना सिद्धांतों के और खांटी बुर्जुआ राजनीति करते हुए भी कम्युनिस्ट बने रहा जा सकता है!...

अतिथि लेखक
युगपुरुष जी ! ऐसे होती है 'आम आदमी' की राजनीति!

राजेश कुमार

-टीवी पत्रकार

खर्चीली राजनीति और महंगे चुनाव प्रचार को चित्रित करने वाले पोस्टर्स और होर्डिंग्स को अमूमन मैं देखता नहीं। लेकिन पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के लक्ष्मी नगर इलाक़े में एक पोस्टर पर नज़र गई तो पांव ठिठक गए। पोस्टर आम आदमी पार्टी का था और पोस्टर पर फोटो थी आतिशी मर्लेना की। पोस्टर में इलाके के निवासियों को रक्षाबंधन और जन्माष्टमी की बधाई दी गई है। आतिशी मर्लेना को पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र की प्रभारी लिखा गया है। धन की भाषा और उसका कंटेट बता रहा था कि आगामी  लोकसभा चुनाव के लिहाज से आतिशी मर्लेना ने आम आदमी पार्टी में अपनी उम्मीदवारी को पुख्ता करने के लिए ये पोस्टर लगाए हैं। अभी छोटे हैं लेकिन आगाज़ से लगता है आगे काफी फलेंगे-फूलेंगे!

मैं लम्बे समय से इस इलाके में रहता हूँ। ज़ाहिर है मेरे पत्रकार मन में जिज्ञासा हुई कि हमें अचानक बधाई देने वाली आतिशी मर्लेना कौन है? हमने जानने की कोशिश की तो पता चला कि आतिशी मर्लेना आम आदमी पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बतौर सदस्य शामिल हैं। जिन्हें केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय की सिफारिश के बाद दिल्ली के उपमुख्यमंत्री के सलाहकार के पद से हटाया गया है।

अमेरिका पलट आतिशी मर्लेना दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक रहे अति वामपंथ के झंडाबरदार तृप्ता वाही और विजय सिंह की पुत्री है। विश्वविद्यालय में दोनों अपने साथियों के बीच स्टालिन के कट्टर समर्थक के तौर पर भी जाने जाते थे। माता-पिता के वामपंथी मन ने मार्क्स और लेनिन को जोड़कर आतिशी के लिए मर्लेना सरनेम का सृजन किया था। हमें मिल पाई जानकारी के मुताबिक आतिशी शुरु से ही कम्युनिस्ट रही है। आजकल बिना सिद्धांतों के और खांटी बुर्जुआ राजनीति करते हुए भी कम्युनिस्ट बने रहा जा सकता है!

यह आम आदमी पार्टी का अंदरूनी मसला है कि वह किसे अपना लोकसभा उम्मीदवार बना कर प्रचारित करती है। लेकिन पूर्वी दिल्ली क्षेत्र का मतदाता होने के नाते एक उम्मीदवार के तौर पर आतिशी मर्लेना को इलाके की जनता की कसौटियों पर कसना एक पत्रकार और वोटर के नाते हमारा फर्ज है।

क्या आतिशी मर्लेना पूर्वी दिल्ली लोकसभा संसदीय क्षेत्र की बनावट और समस्याओं से तनिक भी वाकिफ हैं? उनका इस 'खिचड़ी' इलाके में लोगों के लिए काम करने का कोई अनुभव है? हमने इस या इसके पहले के पोस्टर के अलावा उन्हें कभी नहीं देखा। फिर उनकी दावेदारी का क्या आधार है?

हालांकि पिछले चुनाव में पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से राजमोहन गांधी को उम्मीदवार बनाने और महात्मा गांधी के नाम का ग़लत इस्तेमाल कर आम आदमी पार्टी ने साबित कर दिया है कि उसका जनसरोकार और जनतांत्रिक मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन क्या लोकतंत्र में लोगों के बीच से उम्मीदवार बनाने की जिम्मेदारी का पालन अब कोई भी दल नहीं करेगा? और क्या इस बार के चुनाव में गांधी के साथ-साथ मार्क्स और लेनिन की भी कॉर्पोरेट राजनीति के झंडे तले सिसकने को मजबूर होना पड़ेगा?

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