सुभाष चन्द्र कुशवाहा की पुस्तक ‘अवध का किसान विद्रोह’ यानी गांधीवाद की एक और शव परीक्षा !

गाँधी तो महात्मा बन गए लेकिन जिन लोगों ने ज़मींदारों के सामंतवादी और जातिवादी  शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की उनके इतिहास को शोध और शब्दों की बाजीगरी के इस्तेमाल से गायब कर दिया.

Vidya Bhushan Rawat
Updated on : 2018-03-26 12:04:47

उत्तर प्रदेश के दलित बहुजन समाज के क्रन्तिकारी आन्दोलन का दस्तावेज

विद्या भूषण रावत

भारत की राजनीति में गाँधी को महात्मा और अहिंसा का पुजारी बनाने वाली तीन महत्वपूर्ण घटनाएं हैं, जो उत्तर प्रदेश और बिहार में हुई और गाँधी-भक्त इतिहासकारों ने उनका इतना महिमंडन कर दिया कि लोग गाँधी की जय-जयकार करने के फेर में दलित बहुजन समाज की कुर्बानियों और क्रन्तिकारी घटनाओं को बिलकुल भुला दिया गया. उससे ज्यादा ये कि गाँधी महात्म्य के चलते लोगों को ये भी नहीं पता कि आखिर इन आन्दोलनों और कुर्बानियों का हुआ क्या ? आज जो इतिहास के साथ संघी छेड़छाड़ हो रही है उसके लिए मुख्यधारा का तथाकथित ब्राह्मणवादी इतिहासकार भी कम जिम्मेवार नहीं है, जिन्होंने इन पूरे घटनाक्रमों में दलित पिछड़ी जातियों के साथ हुए अन्याय को छुपाया और इतिहास की जगह हमें गाँधीपुराण पकड़ा दिया. हमारे देश के इतिहास की ये तीन प्रमुख घटनाएं हैं चंपारण आन्दोलन, 1918, चौरी-चौरा का विद्रोह और अवध का किसान आन्दोलन, जिन्होंने गाँधी को महात्मा बनाया. भक्त इतिहासकारों ने लोगों को ये कभी नहीं बताया कि गाँधी ने किस तरीके से इन तीनो स्थानों पर दलित पिछड़ों के मुद्दों को गायब कर, उनके नेतृत्व को ख़त्म कर कांग्रेस का ब्राह्मणवादी ज़मींदारी नेतृत्व उत्पीड़ित लोगों पर लादा.

श्री सुभाष चन्द्र कुशवाहा हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं, लेकिन उनके दो महत्वपूर्ण कार्यों से मैं उनको उन प्रतिष्ठित इतिहासकारों की श्रेणी में रखूँगा, जिन्होंने दलित पिछड़े समाज को जानबूझकर दबाये इतिहास को खंगाला और उसको जनता के समक्ष रखा. उनकी पहली पुस्तक ‘चौरी चौरा : विद्रोह और स्वाधीनता आन्दोलन’ ने इस महान आन्दोलन की पीछे की पूरी पृष्ठभूमि का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया और उसमें दलित-पिछड़े-गरीब और सीमान्त किसानों में उपजे असंतोष और उनकी कुर्बानियों को बौद्धिक ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया गया है.

श्री कुशवाहा की दूसरी पुस्तक अवध किसान विद्रोह : 1920-1922 में उन्होंने चौरीचौरा के बाद की घटनाओं का न केवल क्रमबद्ध संकलन किया है जिसमें घटनाओं को मूल दस्तावेजों का विश्लेषण भी शामिल है, अपितु उनके वर्त्तमान स्थितियों को भी जोड़ा है. ये दोनों पुस्तकें देश भर में उन सभी लोगों के लिए जानना जरूरी हैं, जो ये शिकायत करते हैं कि इतिहास के आइने में दलित पिछड़े कहां हैं और दूसरे ये कि उत्तर भारत में सामाजिक राजनीतिक क्रांति क्यों नहीं हुई ?

ये मेरा सौभाग्य है कि इन तीनों क्षेत्रों को मुझे नज़दीक से जानने और समझने का अवसर मिला. पिछले दो दशको में मुझे चंपारण से लेकर चौरी-चौरा और अवध किसान आन्दोलन के केंद्र रूरे गाँव तक जाने के कई अवसर मिले और वहा के हालात और घटनाक्रमों को देखते हुए मुझे हमेशा ये सवाल कचोटते रहे कि आखिर इतने बड़े क्रन्तिकारी आन्दोलनों का ऐसा हश्र क्यों हुआ और क्यों लोग आसानी से ये कह देते है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रगतिशील आन्दोलन खड़ा नहीं हुआ ?

गाँधी के महात्म्य के पीछे के कटु सत्य को जनता से हमेशा छुपाया गया क्योंकि इतिहासकार गाँधी के महात्म्य के इतने दीवाने थे कि उनसे सवाल पूछना तो दूर की बात, उन्होंने दलित पिछड़ों के क्रान्तिकारी नेतृत्व को कैसे ध्वस्त किया और किस तरीके से स्थानीय सवर्ण जमींदारों को उनके ऊपर थोपा इसकी भनक भी उन्होंने लोगों को नहीं दी, लिहाजा गाँधी तो महात्मा बन गए लेकिन जिन लोगों ने ज़मींदारों के सामंतवादी और जातिवादी शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की उनके इतिहास को शोध और शब्दों की बाजीगरी के इस्तेमाल से गायब कर दिया.

ये सवाल मुझे हमेशा आश्चर्य में डालता कि जिन आन्दोलनों के बारे में दुनिया में इतना महिमामंडन है उन स्थानों पर दलितों और पिछड़ों के हालत आज कैसे हैं और क्या गाँधी के इस तथाकथित किसान आन्दोलन से किसानों को कुछ भला भी हुआ या नहीं. मुझे लगता है कि हालाँकि सुभाष जी ने अपने गहन शोध से उन बातों को जनता के समक्ष रखने में कामयाबी प्राप्त की है जिसे इतिहासकारों ने छुपाया है इसलिए बहुजन आन्दोलन में दिलचस्पी रखने वालों के लिए भी ये पुस्तक उतनी ही जरूरी है जितना कि वामपंथी विचारकों के लिए और ये सवाल भी पूछने में हमें कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि आखिर उन्होंने दलित पिछड़ी जातियों के इतने बड़े आन्दोलन के इतिहास को जनता से क्यों छुपाया.

हिंदी में अमूमन गहन रूप से शोधपूर्ण पुस्तकों का अभाव है और उसके ऊपर बौद्धिकता ब्राह्मणवाद के चंगुल में रही, लिहाज़ा जो काउंटर नेरेटिव बहुजन लेखकों की तरफ से आये उनमें इमोशन ज्यादा और शोध कम है और अधिकांश प्रवचन शैली में होते हैं. सुभाष चन्द्र कुशवाहा जी के ये दो ऐतिहासिक दस्तावेज हिंदी क्षेत्र में बहुजन समाज के इतिहास को खंगालने में नए लेखकों और इतिहासकारों को लगके काम करने और तथ्यों पर आधारित शोध करने के लिए प्रेरित करेंगे. लेकिन मैं ये भी मानता हूँ कि इस शोध को केवल हिंदी तक सीमित नहीं कर दिया जाना चाहिए और इसलिए इन दोनों पुस्तकों का अंग्रेजी अनुवाद भी बेहद जरूरी है क्योंकि इन घटनाओं ने देश के जनमानस के ऊपर अमिट छाप छोड़ी है, लेकिन वो केवल गाँधी के महात्म्य के विषय में है। इसलिए देश के दलित बहुजन समाज को खासकर ये जानकारी होनी चाहिए कि कैसे किसानों ने अपनी लड़ाई लड़ी थी और स्वाधीनता आन्दोलन के समय भी मुद्दा मात्र अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई नहीं थी, अपितु जातीय उत्पीड़न, सामंतवाद, छुआछूत और किसानों के शोषण के प्रश्न उनके लिए किसी आज़ादी की लड़ाई से कम नहीं थे.

आज हम राष्ट्रवाद के जिस वीभत्स स्वरूप के देख रहे हैं उसकी नीव तो गाँधी की कांग्रेस ने उस वक़्त ही रख दी थी जब जमींदारो के आर्थिक और सामाजिक शोषण के विरुद्ध सीमान्त किसानों के विद्रोह को उन्होंने बड़ी चालाकी से राष्ट्रवाद की चाशनी में डाल कर उन्ही ज़मींदारों के राजनैतिक प्रतिनिधियों के हाथो में सौंप दिया जिसके विरुद्ध लोगों ने इतना बड़ा संघर्ष किया. मुख्यधारा की आज की राजनीति गाँधी की इसी राजनैतिक ‘कला’ के आधार पर चल रही है जिसको पहली चुनौती उत्तर प्रदेश में मान्यवर कांशीराम ने दी, जब वोट हमारा राज तुम्हारा का नारा पूरे प्रदेश में गूंज गया, हालाँकि आज उसे भी ब्राह्मणवादी ताकतों ने बड़ी चतुराई से अपने में समाहित कर दिया है.

इस पुस्तक में संयुक्त प्रान्त में किसानों के विद्रोह की न केवल भूमिका का चित्रण है अपितु अलग जनपदों में हुए इन आन्दोलनों को विस्तार से समझाया भी गया है. अवध क्षेत्र में प्रमुख स्थानों जैसे प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, फैजाबाद, रायबरेली, एटा और हरदोई जिलो में उपजे विद्रोह को गहनता से दिखाया गया है. पुस्तक की भाषा शैली आपको शुरू से लेकर अंत तक आपको बांधे रखती है और इसमें सुभाष जी की साहित्यिक पृष्ठभूमि उसमे चार चाँद लगा देती है.

इस पुस्तक में दो और महत्वपूर्ण जानकारियां हैं जिनके बारे में पहली बार इतने विस्तार से लिखा गया है. एक है बाबा रामचंद्र प्रसाद जो महाराष्ट्र से चलकर यहाँ आये थे और पूरे किसान आन्दोलन को उनके द्वारा बना दिखाया गया था, उनकी जाति के बारे में बहुत से सवाल है लेकिन जो ज्यादा महत्वपूर्ण है और जिससे मैं बिलकुल सहमत हूँ, कि उन्होंने पूरे आन्दोलन को गाँधी की गिरफ्त में लाने में पूरा योगदान दिया. हालंकि ये बात भी सही है कि उनके देहांत के बाद भी उनकी पत्नी जग्गी देवी को प्रदेश सरकार ने एक टूटा फूटा इंदिरा आवास दिया था और अब उनका कोई वारिस वहां नहीं है. लेकिन जो ज्यादा खतरनाक बात है वो ये कि बाबा रामचंद्र के नाम पर एक स्मारक रूरे गाँव के पास था, लेकिन अब उसका नाम बदलकर ठाकुर झिंगुरी सिंह बाबा रामचंद्र प्रसाद किसान स्मारक रख दिया गया जो जिसका नामकरन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने जून 2001 में किया.

घटनाओं के लिंक देखिये तो भाजपा का राष्ट्रवाद का ये प्रोजेक्ट पुराना है. मुझे इस आन्दोलन का नेतृत्व बड़े लोगों के हाथ में जाने की पूरी सम्भावनाएं इन स्थलों पर जाकर लोगों से मिलकर प्राप्त हुईं. ठाकुर झिंगुरी सिंह के परिवार के सदस्य से एक छोटी से बातचीत में मुझे पता चला कि वह जमींदार थे, हालाँकि बहुत चतुराई से जमींदार की जगह पर किसान शब्द का इस्तेमाल होता है. दरअसल जब अपने समाज में ताकत दिखानी हो तो ज़मींदारी का जिक्र होता है और जब दूसरे लोगों के वोट या समर्थन लेना है तो किसानी का दामन थाम लो. उनके पौत्र से ऐसे ही एक मुलाकात में उन्होंने अपनी जमीनों का जिक्र किया था, तब मुझे आभास हुआ कि किस प्रकार से ताकतवर जातियां अंतरविरोधों का इस्तेमाल कर लोगों का नेतृत्व हथिया लेती हैं. भारत के अन्दर राष्ट्रवाद वो आसान यंत्र है जो समाज के उपेक्षित तबको में जागृति और विद्रोह को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. श्री सुभाष चन्द्र कुशवाहा के इस शोध में बाबा रामचंद्र के पूरे चरित्र का बेहतरीन विश्लेषण किया गया है और साथ ही साथ उन्हें आगे करने वालो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है.

इस पुस्तक में दूसरी बड़ी बात है क्रान्तिकारी मदारी पासी और एका आन्दोलन जिसके विषय में बहुत जानकारी नहीं है. मदारी पासी हरदोई के रहने वाले थे और उनकी पैदाइश 1860 के बताई गयी है और उनके एका आन्दोलन में अहीर, गडरिया, तेली, पासी, चमार, मुराऊ, अरख जैसी उपेक्षित जातिया भाग ले रही थे और सभी का आन्दोलन जमीदारी उत्पीडन के विरुद्ध था. मदारी पासी के भगत सिंह से हरदोई जेल में मिलने की कई बातें भी बहुत से लेखकों ने की हैं, लेकिन इस पुस्तक में लेखक ने बहुत साफ़ तौर पे ये सिद्ध किया है कि इसकी कोई सम्भावना नहीं दिखती क्योंकि भगत सिंह कभी हरदोई जेल में आये ही नहीं और 1922 के आस पास तो भगत सिंह मात्र 15 वर्ष के रहे होंगे और राजनैतिक तौर पर इतना एक्टिव नहीं थे कि वह इतनी दूर आते. महत्वपूर्ण बात यह कि मदारी पासी बहुजन समाज में बहुत प्रचिलित व्यक्ति थे और उनके बारे में बहुत सी किवदंतिया बन गयी थीं जैसे ‘उई हमार पंचन के गांधी आंव’ हालाँकि गाँधी कभी भी ज़मींदारों के विरुद्ध नहीं थे और उन्होंने ‘किसानों’ से ज़मींदारों की यातनाओं को सहने की सलाह दी. मदारी पासी का आन्दोलन ज़मींदारों और सरकार के लिए सरदर्द बना गया था. 2000 से अधिक जवानों को उनकी तलाशी के लिए लगाया गया था और उनकी गिरफ्तारी न हो पाने के विरोध में ये मुद्दा विधान सभा में ठाकुर मशाल सिंह ने 2 मार्च 1922 को उठाया. ये दिखाता है कैसे ज़मींदारों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर छोटे किसानों के विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया और कैसे गाँधी अहिंसा के नाम पर उनके विद्रोही तेवरों को ख़त्म कर ज़मींदारों के प्रति उनके गुस्से को कम कर रहे थे. आज के दौर में हम इस प्रकार का पूरा खेल देख सकते हैं जब जन प्रतिरोध को दबाने के लिए एक तरफ पुलिस प्रशासन और मीडिया साथ साथ है वहीं ‘अध्यात्म’ की दूकान चलाने वाले भी गाँव-गाँव जाकर अपने शिष्य बनाकर उनके मूलभूत प्रश्नों से लोगों का ध्यान भटकाकर उनके आन्दोलनों को ख़त्म करने में गांधीवादी रणनीति का ही इस्तेमाल कर रहे हैं.

मदारी पासी की लोकप्रियता से सभी जमींदार परेशान थे. उनके भाषण का एक अंश देखिये : किसान भाइयों, जमीन हमारी, मेहनत हमारी, पैदावार हमारी, लेकिन ले जाता है कोई और, हम सब मिलकर ये शपथ लें कि आगे से ये अत्याचार सहन नहीं करेंगें. किसी को लगान न देंगें. अगर एक किसान जेल जाता है तो बाकी गाँव उसके घर परिवार और खेती की देखभाल करेंगें. अगर किसी एक किसान की सम्पति या ज़मीन नीलाम हो जाती है तो कोई दूसरा किसान उसे नहीं खरीदेगा’.

इस पुस्तक में सबसे महत्वपूर्ण बात ये भी है कि इसमें गाँधी की ‘किसानों’ के प्रति विचारों को अच्छे से रखा गया है, हालाँकि हम जानते हैं कि इतिहासकारों और अखबारों ने गाँधी की थोड़ी सी भी आलोचना को स्वीकार नहीं किया और उनको पोप की भूमिका दे दी. लेकिन लेखक ने इस पुस्तक में साफ बता दिया कि आखिर गाँधी ने किस प्रकार से ज़मींदारों की मदद की : 1922 में बारदोली की बैठक में ‘ज़मींदारों को आश्वस्त किया कि कांग्रेस की मंशा उनके कानूनी अधिकारों पर चोट करने की कतई नहीं है. किसानों द्वारा लगान न देना देशहित के लिए घातक है. उन्होंने असहयोग आन्दोलन के दौरान ज़मींदारों, ताल्लुकेदारों के विरुद्ध चले किसानों के विद्रोह के निंदा की. किसानों की हिंसा के खिलाफ गाँधी खूब चीखते-चिल्लाते थे, मगर भूस्वामियो की हिंसा को जो लम्बे समय से किसानों के विरुद्ध जारी थी, के बारे में एक शब्द भी कहने की ज़रूरत नहीं समझते थे. वह लगान न देना भी हिंसा मानते थे‘.

1934 में जब स्वामी सहजानंद सरस्वती किसानों के गंभीर हालात को लेकर गाँधी से मिले तो जवाब मिला : ज़मींदारो के अधिकांश मैनेजर तो कांग्रेस कार्यकर्त्ता हैं. वह कांग्रेस के स्तंभों के विरुद्ध संघर्ष नहीं कर सकते. जमींदार किसानों की तकलीफें और शिकायतें दूर कर देंगे. आन्दोलन की कोई ज़रूरत नहीं’.

ये पुस्तक बहुत मेहनत और लगन से लिखी गयी है. सबसे महत्वपूर्ण बात है लेखक की वैचारिक ईमानदारी क्योंकि सबूत तो पहले से ही मौजूद थे, लेकिन इतिहासकारों ने बजाये दलित बहुजन समाज के प्रतिरोध को न बताकर मात्र गाँधी का महिमंडन किया और उनकी आलोचना को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाए. सवाल केवल गाँधी का नहीं है. अब नए ‘इतिहास’ का ‘सृजन’ भी किया जा रहा है और जिस तरीके से ठाकुर झिंगुरी सिंह आज किसान आन्दोलन के नेता हो गए और उनके नाम पर पार्क बना दिए गए जबकि मदारी पासी के इतने बड़े आन्दोलन को छुपा दिया गया. हकीकत तो ये है, वह अन्दोलन तो बाबा रामचंद्र दास के आन्दोलन से बहुत बड़ा था. क्या आज हमारी इतिहास या समाजविज्ञानं की पुस्तकों में मदारी पासी कहीं है. आखिर उन्हें पासी समाज और बहुजन किसानों के नायक के तौर पर क्यों नहीं उठाया जाता ?

आज उत्तर प्रदेश में भूमि सुधारों की असफलता के लिए अगर कांग्रेस और गाँधी को दोषी न ठहराया जाय तो किसे क्योंकि 1952 में ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम आने के बावजूद भी स्थिति निराशाजनक ही है. जिस आन्दोलन का दुनिया भर में जिक्र करके इतिहासकारों ने गाँधी को महात्मा बनाया उन इलाको में एक चक्कर आज लगाकर अपने आप से पूछे कि आखिर दलित, पिछड़ी जातियां आज भी क्यों भूमिहीन है तो पता चल जाएगा कि आन्दोलन के जरिये कैसे गाँधी की ब्रांडिंग की गयी और उसमें भी ब्राह्मणवादी सामंतवादी शक्तियों ने पूरा स्पेस अपने कब्जे में लिए लिया. गाँधी जी की इस ‘नीति’ पर बहुत से राजनैतिक दल और सामाजिक आन्दोलन अभी भी चल रहे हैं लेकिन अगर कभी आत्मावलोकन करने का कभी अवसर मिलेगा तो उनको येही बात सुनाई देगी कि समाज के वंचित तबकों के अन्दर से यदि राजनैतिक और सामाजिक नेतृत्व नहीं निकला तो दलाली और शोषण करने वाले कभी उन्हें न्याय ने दे पायेंगें.

सुभाष चन्द्र कुशवाहा जी की ये पुस्तक मात्र किसान आन्दोलन के इतिहास के दृष्टिकोण से ही नहीं अपितु दलित बहुजन समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध विद्रोह का इतिहास ही भी है. चालबाज लोगों ने साहित्य के नाम पर श्रमिक और क्रियाशील समाज के नायको को अपने द्वारा रचित ‘पुराणों’ से गायब कर दिया ताकि इस वर्ग की सामाजिक चेतना ही ख़त्म हो जाए लेकिन ऐसे शोध लोगों में नयी आशा का संचार करते है और आने वाली पीढ़ी को भी संकेत देते है के इतिहास में नायक गढ़े गए है और विलन भी बनाए गए है जरुरत इस बात की है हम भी ऐसे शोधपूर्ण कार्य करे जो दलित बहुजन समाज के जिन क्रांतिकारियों के इतिहास को गायब किया गया है उनको दोबारा इतिहास के पन्नों पर दर्ज कर उनकी क्रांति को सलाम करें.

अवध का किसान विद्रोह : 1920 से 1922 तक

लेखक : सुभाष चन्द्र कुशवाहा

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

2018

पृष्ठ : 327

मूल्य : र 299

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