छोड़-छाड़कर विकास की गली भाजपा फिर मंदिर चली

सर्वेक्षणों में मोदी की लोकप्रियता में उल्लेखनीय गिरावट ही दिखाई देनी नहीं शुरू हो गयी है, अपने वर्तमान रूप में मोदी नेतृत्व वाले एनडीए के बहुमत से काफी पीछे रह जाने की भविष्यवाणियां भी शुरू हो गयी है...

2019 के आम चुनाव (The general elections of 2019) की बाजी हाथ से फिसलती देख रही भाजपा-आरएसएस (BJP-RSS) जोड़ी डूबने वाले के अंदाज में हाथ-पांव मार रही है। अयोध्या मामले (Ayodhya case) में केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में अचानक लगायी गयी ताजातरीन याचिका, हाथ-पांव मारने की ऐसी ही कोशिश है। केंद्र सरकार का कहना है कि वह अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद (Temple-Masjid dispute in Ayodhya) के सिलसिले में सरकार द्वारा अधिगृहीत 67 एकड़ जमीन में से, ‘विवादित’ 0.313 एकड़ जमीन को छोडक़र, शेष ‘गैरविवादित’ जमीन, अधिग्रहण से पहले के उसके स्वामियों को लौटाना चाहती है, जिनमें विश्व हिंदू परिषद (Vishwa Hindu Parishad) द्वारा संचालित रामजन्म भूमि न्यास (Ramjanm Bhoomi trust) मुख्य है। इसके लिए उसने सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना की है कि वह, 67 एकड़ के समूचे इलाके में ‘यथास्थिति बनाए रखने’ के अपने 2003 के फैसले में बदलाव करे, ताकि गैर-विवादित या फालतू जमीन, मंदिर बनाने के लिए उपलब्ध करायी जा सके।

राजेंद्र शर्मा

          बेशक, यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि मोदी सरकार की इस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय किस तरह का रुख अपनाता है। फिलहाल तो इस याचिका को, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार के लिए स्वीकार किए जाने की ही मंजिल पार करनी होगी। याचिका को अगर विचार के लिए स्वीकार भी कर लिया जाता है, तब भी इसकी कोई गारंटी नहीं है कि इसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्राथमिकता देकर या कम से कम अलग से सुना जाएगा और अदालत के सामने मौजूद विवाद का निपटारा होने के बाद निर्णय के लिए टाल नहीं दिया जाएगा।

भी कानून के जानकारों के अनुसार, इस तरह की याचिका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार किए जाने के आसार एक तरह से नहीं के बराबर हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय तो 1993 से लगाकर कम से कम तीन मौकों पर और अधिग्रहीत भूमि से संबंधित इस्माइल फारुखी प्रकरण में 2004 के अपने फैसले में साफ-साफ शब्दों में, पहले ही कह चुका था कि विवादित भूमि के स्वामित्व के विवाद के निपटारे के बाद और उसकी रौशनी में ही, अगर कोई जमीन ‘फालतू’ पायी जाती है तो, सरकार उसे उसके मूल स्वामियों को लौटाने पर कोई निर्णय ले सकती है।

यहां यह याद दिलाना भी जरूरी है कि मौजूदा अपील में मोदी सरकार द्वारा पेश की गयी सवा-चतुराई की दलील के विपरीत, सर्वोच्च न्यायालय ने अधिग्रहीत जमीन के ‘विवादित’ तथा कथित ‘गैरविवादित’ हिस्सों को अलग करने से ठीक इसी आधार पर इंकार किया था कि इन्हें अलग करने से विवादित भूमि के फैसले की सूरत में और खासतौर पर मुस्लिम पक्ष के हक में उसके फैसले की सूरत में, दी गयी जमीन तक पहुंच आदि हासिल न होने के चलते, संबंधित पक्ष के लिए इस निर्णय का लाभ पाना मुश्किल हो सकता है।

          बेशक, मोदी सरकार को भी इसका बखूबी पता है कि वह आसानी से अधिग्रहीत भूमि का कोई हिस्सा श्रीराम जन्मभूमि न्यास को नहीं दे सकती है और कम से कम आम चुनाव तक तो किसी भी तरह से नहीं ही दे सकती है। लेकिन, इससे उसे बहुत फर्क  नहीं पड़ता है। उसके लिए तो यह, अयोध्या में मंदिर निर्माण के मुद्दे को गरमाने के लिए, अध्यादेश लाने या कानून बनाने की, अपने संघ परिवार की ही मांग के बढ़ते दबाव को, दांए-बाएं करने का पैंतरा भर है।

मंदिर के मुद्दे के सहारे, संघ-भाजपा के परंपरागत समर्थन-आधार को पुख्ता करने में लगीं, आम तौर पर संघ के प्रति राजनीतिक रूप से वफादार हिंदुत्ववादी कतारों को संतुष्ट करने तथा वफादार बनाए रखने के लिए, इतना दिखाई देना ही काफी है कि मोदी सरकार, मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने के लिए, वह कुछ न कुछ और वास्तव में ‘नये कदम’ उठा रही है।

          ठीक आज के मुकाम पर इस तरह का अभिनय इसलिए और भी जरूरी है कि प्रयाग में अद्र्घ-कुंभ को धार्मिक आयोजन से बढक़र हिंदुत्ववादी राजनीति का तमाशा बनाने से जिस राजनीतिक लाभ की संघ परिवार उम्मीद लगाए है, वह इस मौके पर प्रयाग में आयोजित किए जा रहे साधु-संतों के जमावड़े को राम मंदिर के मुद्दे पर सरकार की भूमिका को लेकर ठीक-ठाक संतुष्ट न किए जाने पर, हाथ से फिसल भी सकता है। योगी आदित्यनाथ के कुंभ के मौके पर प्रयागराज में उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने, बैठक के बाद मंत्रिमंडल के कुंभ में डुबकी लगाने तथा मेरठ से प्रयाग तक के ‘‘गंगा एक्सप्रैस वे’’ के निर्माण के एलान जैसे उत्तर प्रदेश स्तर के टोटकों से, यह काम सधने वाला नहीं था। इसीलिए, मोदी सरकार ने एक नये पहलू से मंदिर के मुद्दे पर अपनी सक्रियता दिखाने का यह रास्ता अपनाया है।

          बेशक, इसके साथ ही अयोध्या विवाद में मंदिर की ‘आस्था’ के पक्ष में फैसला सुनाने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय पर दबाव भी बढ़ाया जा रहा होगा। यह कोई संयोग ही नहीं है कि जिस रोज, सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में ‘गैरविवादित’ भूमि को लौटाने के लिए उक्त याचिका लगायी गयी, उसी रोज केंद्रीय कानून मंत्री ने शीर्ष अदालत को एक तरह से निर्देश देते हुए कहा था कि अदालत को, मंदिर प्रकरण की सुनवाई अविलंब करनी चाहिए। ‘अयोध्या प्रकरण पिछले 70 साल से विचाराधीन है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला (2010 में) मंदिर के पक्ष में था, लेकिन अब उसे सर्वोच्च न्यायालय ने रोका हुआ है। इस मामले को जल्दी निपटाया जाना चाहिए।’

सभी जानते हैं कि आगामी आम चुनाव के लिए भाजपा की हिंदुत्ववादी छवि चमकाने के लिए, राम मंदिर के मुद्दे के उछाले जाने के ताजा सिलसिले की शुरूआत, आरएसएस प्रमुख भागवत के दशहरा भाषण में इसकी मांग किए जाने से हुई थी कि सरकार को, विवादित जगह पर मंदिर बनाने का रास्ता बनाने के लिए, फौरन कदम उठाने चाहिए। इसके साथ ही ‘हिंदुओं का धैर्य छूट रहा होने’ का प्रायोजित शोर और मोदी सरकार के राजनीतिक विरोधियों के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय को भी ‘राम मंदिर के निर्माण में बाधक’ खलनायक बनाकर पेश करने का, सांप्रदायिक राजनीतिक खेल तेज हो गया।

प्रधानमंत्री ने अपने नव-वर्ष साक्षात्कार में यह कहकर कि, ‘पहले अदालत अपना फैसला सुना दे, फिर सरकार अपना कर्तव्य करेगी’ कम से कम इतना इशारा तो कर ही दिया था कि उनकी सरकार, सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे किसी भी फैसले को लागू नहीं होने देगी, जो विवादित स्थल पर मंदिर के निर्माण के पक्ष में नहीं होगा। रामलीला मैदान में हुई भाजपा की कन्वेंशन में आए फीडबैक के बाद, अब मोदी सरकार मंदिर के मुद्दे को और सक्रिय रूप से इस्तेमाल करने के रास्ते पर चल पड़ी है।

          बेशक, यह संयोग हो सकता है कि अयोध्या के मामले में मोदी सरकार के ताजातरीन कदम का प्रकाश जावडेकर ने ठीक उसी दिन एलान किया, जिस रोज राहुल गांधी छत्तीसगढ़ में एक जनसभा में इसका एलान कर रहे थे कि अगर उनकी पार्टी सरकार में आयी तो, सभी गरीबों के लिए एक न्यूनतम गारंटीशुदा आय दिलाएगी। लेकिन, तारीखों का मिलना भले संयोग हो, मोदी सरकार के नये अयोध्या पैंतरे की टाइमिंग संयोग नहीं है। आम जनता के और खासतौर पर किसानों तथा रोजगार की तलाश में भटकते नौजवानों के, मोदी राज के पांच साल से बढ़ते मोहभंग को देखते हुए, संघ-भाजपा को मोदी की सचेत रूप से गढ़ी गयी छवि तथा आरएसएस के विशद ताने-बाने समेत अपने तमाम संसाधनों के बावजूद, मंदिर-शरणम् गच्छामि के सिवा दूसरा कोई रास्ता नजर ही नहीं आ रहा है। हां! मामला सिर्फ मंदिर शरणम् का ही नहीं है, जिसमें राम मंदिर के साथ-साथ अब अयप्पा मंदिर शरणम् को भी जोड़ दिया गया है। इसमें तीन तलाक शरणम्, नागरिकता (संशोधन) विधेयक शरणम्, गोरक्षा शरणम् और जाहिर है कि पाकिस्तान तथा कश्मीर के संबंध में छप्पन इंची छाती शरणम् आदि, आदि और सवर्ण आरक्षण शरणम् भी शामिल हैं।

यानी 2019 के चुनाव के लिए संघ-भाजपा ने एक पूरा सांप्रदायिक पैकेज गढ़ लिया है। जाहिर है कि इसके सहारे मोदी की भाजपा के विरोधियों को, हिंदूविरोधी साबित करने पर ही ज्यादा जोर लगाया जा रहा होगा, मोदी को ‘विकास पुरुष’ साबित करने पर कम। आखिरकार, सारे लक्षण तो इसी के हैं कि विपक्ष विकास के मोदी के मंच को छीनने में कामयाब हो रहा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के वृहद नमूना सर्वे पर आधारित, बेरोजगारी के ताजातरीन आंकड़ों के दबाए जाने के खिलाफ, राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के चार में से दो सदस्यों का इस्तीफा, आम जनता की दशा में सुधार लाने में मोदी राज की घोर विफलता को ही रेखांकित करता है।

          अचरज की बात नहीं है कि चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में मोदी की लोकप्रियता में उल्लेखनीय गिरावट ही दिखाई देनी नहीं शुरू  हो गयी है, अपने वर्तमान रूप में मोदी नेतृत्व वाले एनडीए के बहुमत से काफी पीछे रह जाने की भविष्यवाणियां भी आनी शुरू हो गयी हैं। इंडिया टुडे  का 10 जनवरी तक का सर्वे बताता है कि मोदी की लोकप्रियता, दो साल पहले, 2017 की जनवरी के यानी नोटबंदी के कुछ ही बाद के 69 फीसद के स्तर से गिरकर, 46 फीसद पर आ गयी थी, जबकि इन्हीं दो वर्षों में कांग्रेस अध्यक्ष, राहुल गांधी की लोकप्रियता 10 फीसद से बढ़क़र, 34 फीसद पर पहुंच गयी थी। इसी सर्वे के अनुसार, मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सीटें, 2014 के 336 के स्तर से घटकर, 2019 में बहुमत के आंकड़े से बहुत पीछे, 237 पर सिमट सकती हैं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे की सीटें 59 से बढक़र, 166 हो जाने वाली हैं। साफ है कि मोदी-शाह की भाजपा के समर्थन में भारी गिरावट का जो रुझान, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुए पांच राज्यों के विधानसभाई चुनावों में और खासतौर पर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में भाजपा की सरकारों की हार के रूप में सामने आया है, चुनाव के इस साल में और आगे ही बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-राष्ट्रीय लोकदल के घोषित गठबंधन और कांग्रेस के साथ उसके सीमित तालमेल ने, इस रुझान को और बहुत तेजी दे दी है। इस गठबंधन के 2014 के वोट से ही भाजपा, उस चुनाव में आयी अपनी 72 सीटों में से कम से कम आधी गंवा बैठेगी और अगर जनता की भाजपाविरोधी नाराजगी इस गठबंधन के वोट में बढ़ोतरी में तब्दील हुई तो, जानकारों के अनुसार भाजपा की सीटें दस-बारह की संख्या तक भी सिमट सकती हैं। अचरज की बात नहीं है कि बिहार में आरएसएलपी के नाता तोडऩे के बाद, अब उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के साथ गठबंधन में रहीं अपना दल और सुहेल समाज पार्टी ने, खूंटा तुड़ाने के लिए जोर दिखाना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि ये पार्टियां अगर भाजपा से नाता नहीं भी तोड़ेंगी तो उसके साथ बने रहने की अब ज्यादा कीमत वसूल करेंगी।

          वास्तव में ऐसा ही और भी दिलचस्प खेल, लोकसभा की सीटों की संख्या के हिसाब से देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य, महाराष्ट्र में चल रहा है। साल भर से चल रही खट-पट और कहा-सुनी के बाद, शिव सेना ने आने वाले चुनाव के लिए भाजपा के साथ गठजोड़ की बातचीत करने के लिए तैयार होने संकेत तो दिए हैं, लेकिन इसके लिए एक मुश्किल शर्त लगा दी है। शर्त यह है कि गठजोड़ में शिव सेना को ‘बड़े भाई’ की हैसियत हासिल होनी चाहिए। बेशक, शिव सेना इस शर्त को थोड़ा नरम करने के लिए भी तैयार हो सकती है और लोकसभा के स्तर पर बराबरी का बंटवारा भी स्वीकार कर सकती है, लेकिन उसे विधानसभा के स्तर पर गठबंधन का नेतृत्व और जाहिर है कि विधानसभा की सीटों का बड़ा हिस्सा चाहिए। इस तरह के समझौते के पैकेज के लागू होने के लिए वह लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी कराने की मांग कर रही है। इससे बचने के लिए भाजपा को बिहार की तरह, लोकसभा की सीटों के अपने हिस्से में कमी स्वीकार करनी पड़ सकती है। 2014 में भाजपा ने राज्य की 48 में से 26 सीटों पर चुनाव लड़ा था। कुछ खबरों के अनुसार, उसे अब 22 सीटें लडऩे पर ही संतोष करना पड़ सकता है।

          इन्हीं हालात में संघ-भाजपा अब खुलकर सांप्रदायिक धु्रवीकरण का दांव आजमाने की ओर बढ़ रहे हैं। यह अनुमान लगाना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए कि 2019 के चुनाव में जनता, संघ-भाजपा के हिंदुत्ववादी पैंतरे और जन-हितकारी विकास के विपक्ष के आश्वासन में से किसे चुनेगी।   

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