हिन्दू राष्ट्र की डिस्टोपियन दुनिया में आप का स्वागत है, जहां विचार ही अब द्रोह है

ऐसे फरमान इस बात पर भी आ रहे हैं कि वह अपने जीवन के अनुभवों को किस तरह देखते हैं, वह उस धर्म को किस तरह देखते हैं जिसने उन्हें मनुष्यता का दर्जा देने से भी इन्कार किया।...

हिन्दू राष्ट्र की डिस्टोपियन दुनिया में आप का स्वागत है, जहां विचार ही अब द्रोह है

विचार ही अब द्रोह बहुसंख्यकवादी जनतंत्र में

-सुभाष गाताडे

जिस हद तक धर्म ने झगड़ों को जन्म दिया है, सियासत को जटिल कर दिया है, सामाजिक विकास को बाधित किया है और दुनिया भर में मानवीय सम्बन्धों को हानि पहुंचायी है, इसके चलते अक्सर यह कहने का मन करता है कि धर्म मानवता का स्वाभाविक दुश्मन है, .. अब वक्त़ आ गया है कि दुनिया यह रूख तय करे कि वह मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए वह आईन्दा धर्म को एक स्वीकार्य औचित्य प्रदान करने का मौका नहीं देगी।

  • वोले सोयिन्का, नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक, (granta.com/New-Writing/Religion-Against-Humanity )  

 

किसी भी धर्म की पवित्र कही जाने वाली किताबों की - जिन्हें उसके तमाम अनुयायी पूजते हैं - आधुनिक समयों में आलोचना एक ऐसी कार्रवाई होती है जो तमाम द्वंदों से भरी होती है।

क्या कहें जब उसके पन्नों के पलटने पर ‘अधर्मियों’ या ‘ईशनिन्दकों’ को जिन्दा जलाए जाने के विवरण मिलते हैं, एक पुरूष कई स्त्रियों से शादी कर सकता है। यह बताया जाता है या शासकों को बताया जाता है कि अगर कोई खास तबके का व्यक्ति धार्मिक श्लोकों को सुने या दोहराए तो उसके कान में गरम शीशा डाले या उसकी जीभ काट दे या उन्हें प्रार्थनास्थलों से भी दूर रखने का आदेश दे ; इतना ही नहीं जिन्हें ‘‘देवता’ कहा जाता है वह अपनी ही बेटी के साथ यौन अत्याचार करते दिखें या महिलाओं को छेड़ते दिखें ?

क्या किसी स्वतंत्रमना बुद्धिजीवी को यूं दिखना चाहिए कि उसे कुछ नज़र ही नहीं आया और खामोशी ओढ़ लेनी चाहिए या ऐसी हरकतों को औचित्य प्रदान करने के लिए दिमागी कसरत करनी चाहिए ताकि उसकी आस्था पर कोई सवाल न खड़ा कर या चन्द बातें भले ही धीमी जुबां में कह देनी चाहिए कि पवित्र कही जानेवाली इन किताबों की यह बातें आधुनिक मूल्यों के साथ मेल नहीं खाती हैं !

और आधुनिक राज्य को - जो किसी भी आस्था पर आधारित होने का दावा नहीं करता - क्या करना चाहिए ? क्या धर्म या उसकी पवित्र कही जानेवाली किताबों की ऐसी समीक्षा को प्रोत्साहित करना चाहिए या आस्था के चन्द व्यापारी या विभिन्न छटाओं के अतिवादियों को ऐसी समीक्षा के अपराधीकरण का रास्ता खोल देना चाहिए, जहां आधुनिक राज्य के विधान ही उनके लिए रास्ता सुगम करते दिखते हों !

जिस दौर से हम गुजर रहे हैं - जिसे समाजशास्त्री धार्मिकता के विस्फोट के तौर पर देख रहे हैं - हम ऐसी आलोचनाओं के कलंकीकरण, अपराधीकरण का बढ़ता सिलसिला देखते हैं, जिसकी परिणति कहीं कहीं लेखकों, तर्कशीलों, सांस्क्रतिक कर्मियों की सुनियोजित हत्याओं में, सांस्क्रतिक महोत्सवों में बम विस्फोट कराने में यहां तक कि ऐसे प्रार्थनास्थल जो जनता की साझाी संस्कृति को आज भी संजोए हुए हैं, वहां पर आत्मघाती हमलों के रूप में भी होती देखते हैं।

दक्षिण एशिया का यह हिस्सा ऐसी घटनाओं के लिए लगातार /कु/ख्यात हो चला है।

इस सिलसिले में ताज़ी ख़बर जाने माने लेखक और सांस्कृतिक समीक्षक कुलदीप कुमार द्वारा ‘नेशनल हेराल्ड’ नामक अख़बार में लिखे एक लेख के बहाने आयी है। ख़बरों के मुताबिक सत्ताधारी पार्टी ने इस लेख पर ‘धार्मिक भावनाओं के आहत’’ करने का आरोप लगाया है। (https://www.dnaindia.com/delhi/report-delhi-bjp-lodges-complaint-against-national-herald-newspaper-for-hurting-hindu-sentiments-2689656)

प्रस्तुत लेख दरअसल भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय महाकाव्यात्मक आख्यानों की तथा स्त्रियों के प्रति उसके चन्द चरित्रों के समस्यापूर्ण व्यवहार की चर्चा करता है।

निस्सन्देह लेख की अन्तर्वस्तु पर असहमति स्वागतयोग्य है, और बेहतर यही होता है कि उस पर बहस चले ताकि संस्कृत के चर्चित सुभाषित का सहारा लेकर कहें तो ‘वादे वादे जायते तत्वबोधः’ अर्थात् इसी बहस मुबाहिसे से हम किसी नए तत्वबोध की तरफ बढ़ सकें।

प्रश्न उठता है ऐसी किसी वैकल्पिक व्याख्या का अपराधीकरण कहां तक उचित है।

शायद यह कहना अधिक मुनासिब होगा कि यह इस किस्म का पहला किस्सा नहीं है और केन्द्र में हिन्दुत्व वर्चस्ववादी ताकतों के हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में लेने के बाद ऐसी घटनाओं में गोया उछाल आया है।

चीजें अब इस मुक़ाम तक पहुंच चुकी हैं कि पिछले दिनों खुद आला अदालत को एक चेतावनी देनी पड़ी कि लोग ऐसे मामलों में थोड़ा संयम बरतना सीखें।

दरअसल जाने-माने क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धोनी की एक तस्वीर एक पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपी थी, जिसमें वह विष्णु के पोशाक में दिखाई दिए थे। उपरोक्त याचिका को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रमुख न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुआईवाली त्रिसदस्यीय पीठ को - जिसमें न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और एम एम शान्तनागोडार भी शामिल थे - कहना पड़ा:

"Insults to religion offered unwittingly or carelessly or without any deliberate or malicious intention to outrage the religious feelings of that class" should not be charged with hurting religious sentiments.

(https://www.huffingtonpost.in/2017/04/21/stop-misusing-law-against-hurting-religious-sentiments-says-sup_a_22050257/ )

यह अलग बात है कि ऐसी घटनाओं में कमी आना तो दूर इसमें बढ़ोत्तरी ही हो रही है। अब खुद सर्वोच्च न्यायालय भी उसकी चपेट में आता दिखता है जब उसके एक निर्णय पर संघ की तरफ से ‘‘हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का’’ आरोप लगाया है।

मालूम हो कि अयोध्या मामला जब पिछले दिनों आला अदालत के सामने आया था, तब उसकी तरफ से कहा गया कि हम उस पर जनवरी माह में सुनवाई करेंगे, क्योंकि उनके सामने ‘अधिक महत्वपूर्ण मुददे’ हैं।

संघ के एक वरिष्ठ नेता जनाब भैयाजी जोशी को यह कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दुओं का अपमान किया है। (https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/rss-general-secretary-says-supreme-court-has-hurt-the-sentiments-of-hindus/articleshow/66473840.cms)

सर्वोच्च न्यायालय ने जब सबरीमाला मामले में बहुमत के आधार पर निर्णय देकर एक प्रगतिशील निर्णय दिया तथा यह कहा कि ‘‘मासिकधर्म से गुजरनेवाली’’ स्त्रियों को मंदिर से दूर रखना संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं और सभी महिलाओं को मंदिर प्रवेश की अनुमति मिलनी चाहिए, तबभी ऐसी जमातों की तरफ से इसी किस्म की एकांगी प्रतिक्रिया दिखाई दी थी। (https://thewire.in/law/sabarimala-women-temple-entry-supreme-court-verdict)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों  से सम्बद्ध तमाम लोगों ने इस फैसले का विरोध किया था और कहा था कि अदालत को परम्पराओं का भी सम्मान करना चाहिए था।

काबिलेगौर है कि ‘‘आहत’’ या ‘‘अपमानित’’ होने की यह बातें महज बहुसंख्यक समुदाय तक सीमित नहीं हैं।

हाल ही में केरल से ख़बर आयी थी कि किस तरह कोजिकोड के एक स्कूल में हुए नाटक के एक दृश्य को लेकर वहां के मुस्लिम संगठनों ने जुलूस निकाला था और प्रदर्शन किए थे। यह नाटक - जिसे राज्य स्तर पर पुरस्कार भी मिले थे और काफी प्रशंसा भी हासिल हुई थी - मुस्लिम संगठनों को इस वजह से नागवार गुजरा था क्योंकि इसमें एक छात्रा को अज़ान सुनाते दिखाया गया था। इन संगठनों का कहना था कि इस नाटक ने ‘‘मुस्लिम जीवन के तरीके को अपमानित किया है’’ क्योंकि अज़ान को हमेशा पुरूष मुअज्जिन सुनाते हैं। (https://www.thequint.com/news/india/kerala-girl-azaan-controversy-school-play)

‘‘आहत भावनाओं की ब्रिगेड’’ के दलील का निचोड़ यही निकलता है कि अगर कोई - फिर भले वह व्यक्ति हो या सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्था हो - ऐसी कोई बात कहता है जो उनके हिसाब से सही नहीं है, तो उन्हें उसके नतीजे भुगतने पड़ेगे। विडम्बना ही है कि भावनाओं के कब आहत होंगी इसका कोई फार्मुला भी नहीं है। किसी फिल्म में महिला पात्रा के चित्रण को लेकर किसी समुदाय विशेष के लोग देश भर में हंगामा कर सकते हैं क्योंकि मध्ययुगीन उस चरित्रा का चित्राण उन्हें अपने समुदाय को अपमानित करता दिखे, मगर वही लोग हमारे वक्त़ में महिलाओं के आए दिन हो रहे अपमान और उनके अत्याचारों में लगातार आती तेजी पर बिल्कुल खामोश मिल सकते हैं।

फिलवक्त़ जैसा आलम है कि महाकाव्यों की आलोचना अब ऐसा दायरा बना दिखता है, जिसमें मौन रहना ही बेहतर है।

याद कर सकते हैं कि जिन दिनों ऐसी ताकतों ने केन्द्र में सत्ता हासिल नहीं की थी, उन दिनों भी वह अपने संगठन या हंगामा खड़ा करने की अपनी सलाहियत के चलते किताबों को पाठयक्रमों से बाहर करने में सफलता हासिल करते रहे हैं। ए के रामानुजन के मशहूर निबंध ‘‘थ्री हण्डेड रामायणाज’ को किस तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठयक्रम से बाहर करने में या  अमेरिकी विदुषी वेण्डी डोनिगर की चर्चित किताब ‘‘द हिन्दूज: एन एल्टरनेट हिस्टरी’’ किस तरह लुगदी बना देने की धमकी मिली थी और उसे प्रकाशक ने बाज़ार से हटा दिया था ।/ यह अलग बात है कि अब वह फिर बाज़ार में आ गयी है।/

और आज सत्ता की बागडोर हाथ में आने के बाद उनके इस जोश की कोई सीमा नहीं बची है। और अब बात महज महाकाव्यों की वैकल्पिक  व्याख्या तक ही सीमित नहीं रह गयी है, वंचित, उत्पीडि़त समुदाय के लोग अपने आप को किस तरह सम्बोधित करना चाहते हैं, यह भी वही तय करना चाहते हैं।

हम जानते हैं कि किस तरह सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने - उच्च न्यायालय के एक आदेश के बाद - 7 अगस्त को एक परिपत्र जारी किया था /मुंबई उच्च न्यायालय के एक आदेश के बाद/ जिसमें मीडिया को यह ‘सलाह’ दी गयी कि वह ‘दलित’ शब्द का प्रयोग न करे जब मामला अनुसूचित जातियों से सम्बधित हो। उसका यह कहना था कि वह संविधान में प्रयुक्त ‘‘अनुसूचित जाति’ शब्द का इस्तेमाल करें।

गनीमत समझी जाएगी कि संविधान की समानता की धारा 14, भेदभाव विरोध की धारा 15 तथा उसमें प्रदत्त अन्य आज़ादियों की धारा 19 आदि को चुनौती देने वाले इस ‘मनमाने, अतार्किक, भेदभावमूलक’ निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में तत्काल चुनौती दी गयी, मगर उसने सत्ता में बैठे लोगों की मानसिकता को उजागर किया जो सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित तबकों द्वारा अपनी पहचान के लिए स्वयं चुने हुए नाम से भी चिन्तित दिखे।

जाहिर है कि जनतंत्र की जिस बहुसंख्यकवादी धारणा की वह हिमायत करते हैं उसमें ऐसी अभिव्यक्तियों के लिए कोई स्थान नहीं है।

कौन तबका अपने आप को क्या कहे इसके बारे में फरमान जारी कर देने का यह सिलसिला महज दलितों तक सीमित नहीं रहा है। वह आदिवासियों और अन्य उत्पीडि़त श्रेणियों में भी पहुंचा है। इसके बजाय कि अधिक लोकप्रिय एवं सटीक शब्द आदिवासी का इस्तेमाल करें, वर्चस्वशाली विमर्श में उन्हें ‘वनवासी’ शब्द से सम्बोधित करने पर जोर रहता है।

ऐसे फरमान इस बात पर भी आ रहे हैं कि वह अपने जीवन के अनुभवों को किस तरह देखते हैं, वह उस धर्म को किस तरह देखते हैं जिसने उन्हें मनुष्यता का दर्जा देने से भी इन्कार किया।

और यह कोई संयोग नहीं कि ओमप्रकाश वाल्मिकी की बहुचर्चित आत्मकथा ‘जूठन’ को विश्वविद्यालय पाठयक्रम से बाहर करने की नाकाम कोशिशें हों या पेरूमल मुरूगन या सोवेन्द्र हांसदा शेखर की रचनाओं को प्रतिबंधित करने की कोशिशें हो या दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठयक्रम से चर्चित दलित बहुजन लेखक कांचा इलैया शेफर्ड की आत्मकथा ‘ व्हाय ए एम नाट ए हिन्दू’ या अन्य किताबों को हटाने का सवाल हों, लोगों को यही कहा जा रहा है कि अपने जीवन के अनुभवों को किस चश्मे से देखें।

यह पूरा सिलसिला हमें प्रोफेसर जयंत लेले के उस सूत्रीकरण को पुष्ट करता दिखता है जिसमें वह ‘‘हिन्दुत्व की तीन जरूरी खासियतों की बात करते हैं कि वह ‘वर्चस्वशाली है, समरूपकारी है और शिक्षामूलक है, (hegemonic, homogenising and pedagogic) सभी एक ही वक्त और बेहद जटिल तरीकों से एक दूसरे में उलझा हुआ।   ( Hindutva, The Emergence of the Right)

जैसे जैसे यह हुकूमत अपने आखिरी माह में पहुंच रही है, यह एहसास गहराता जा रहा है कि जार्ज ओरवेल ने अपने क्लासिकीय उपन्यास ‘नाइन्टीन एटी फोर’ में जिस डिस्टोपियाई दुनिया का जिक्र किया था उसमें हम पहुंच रहे हैं। यह उपन्यास भले ही अलग सन्दर्भ में और अलग वक्त़ में लिखा गया हो, मगर यही दिख रहा है आरवेल का यह उपन्यास जो अधिनायकवादी हुकूमतों को बेपर्द करता है, किसी अलसुबह हम सभी के लिए प्रासंगिक हुआ दिखता है।

इस उपन्यास ने जिस अवधारणा को बहुत चर्चित किया था उसका नाम था ‘‘थॉटक्राइम’’ अर्थात ‘‘विचारअपराध’’ - जो एक तरह से गैरकानूनी विचार को बयां करता है। विचारअपराध यह आपराधिक कार्य है जिसके तहत ऐसे अघोषित विश्वासों और सन्देहों को मानते रहते हैं, जो सत्ताधारी पार्टी को चुनौती देता है। उपन्यास इस बात की भी चर्चा करता है कि किस तरह सरकार अपनी प्रजा के विचारों को नियंत्रित करके भाषण और कार्रवाई पर भी लगाम कसना चाहती है।

हिन्दू राष्ट्र की डिस्टोपियाई दुनिया में आप का स्वागत है।

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