तुम्हारे धर्म की क्षय हो !!! धर्म को राजनीति से जोड़ने की कवायद का सिला भारत में तिलक को जाता है

धर्म जब भी घर ही हदें लांघ कर सड़क पर आता है, वह राजनीति बन जाता है। धर्म कितनी जहालत और अन्धकार की तरफ ले जा सकता है यह भाजपा के नेताओं के बयानों से जाहिर है। ...

शमशाद इलाही शम्स

धर्म जब भी घर ही हदें लांघ कर सड़क पर आता है, वह राजनीति बन जाता है। धर्म को राजनीति से जोड़ने की कवायत का सिला समकालीन भारत में गंगाधर तिलक को जाता है, जिन्होंने 1893 में गणेशोत्सव की शुरुआत की थी, यह सोच कर कि धर्म के नाम पर उमड़ी भीड़ का राजनीतिकरण कैसे करें ? गुलाम भारत की स्थिति में उनके इस प्रयोग को सफल माना जा सकता है, क्योंकि विदेशी अँगरेज़ शासन के खिलाफ जनमत तैयार करने में यह प्रयोग सफल था। लेकिन उस भीड़ पर तुम्हारा ही कब्ज़ा रहेगा यह बस में नहीं था। आज पूरा जमावड़ा संघियों के हाथ में है, क्योंकि धर्म नाम के जिन्न को बोतल से निकाल दिया गया था।

गणेश-उत्सव का प्रभाव यह हुआ कि दूसरे समुदाय भी सड़कों पर कब्ज़ा करने निकल पड़े, क्योंकि सड़क से ही राजनीति तय होती है। सड़क तादाद बताने का हथियार है और यही से वोट निकलते हैं।

सिद्धान्तः यह गलत था। यूरोप उस वक्त धर्म को सत्ता से अलग कर चुका था और भारतीय राजनेता धर्म का राजनीति में इस्तेमाल कर रहे थे। गांधी तो तमाम हदें पार कर मृत प्राय तुर्की की सल्तनत को अंग्रेजों द्वारा भंग कर दिए जाने पर उसकी वकालत और हिफाज़त में खिलाफत आन्दोलन तक चलाए। धर्म की दलदल से निकालने में भारत के किसी बड़े नेता का कोई योगदान नहीं। अबेडकर भी मरने से पहले बौद्ध धर्म की दलदल की सौगात अपने अनुयायियों को देकर उपकृत कर गए।

धर्म पर सबसे स्पष्ट और वैज्ञानिक विचार अगर किसी के थे तो वह राहुल सांस्कृत्यायन के थे, जिन्होंने तत्कालीन विश्व की तमाम प्रगतिशील धारणाओं को आत्मसात करते हुए इसे कूड़े की टोकरी में डालने की वकालत की।

हरियाणा में संघी लंपटों ने सार्वजानिक स्थान पर नमाज पढ़ रहे लोगों को खदेड़ा है, यह उस भारतीय राजनीति की स्वाभाविक और तार्किक परिणिति है जो आपके राष्ट्र नेता सौंप कर गए थे। धर्म का सड़क पर आना प्रतिक्रियावाद है और उसका जवाब दूसरा प्रतिक्रियावादी आज नहीं तो कल देगा ही। मोती युग में बंद हुआ यह ढक्कन अब खुल चुका है। सड़कों पर एक धर्म के लोग दूसरे धर्म की भीड़ से मुकाबले के लिए स्वतन्त्र हैं। सरकारी हिफाज़त में अब हिन्दू धर्म ही सड़कों पर बचेगा क्योंकि उसे दूसरे धर्मों का नाश करके अपनी रक्षा करनी है।

फिर रास्ता कौन सा बचा है ?

सही रास्ता वही है जिस पर चलकर दुनिया के दूसरे मुल्क प्रगति और शांति पथ पर सवार हुए हैं। उन्होंने धर्मों को राज्य सत्ता से अलग किया और समाजवाद की तरफ अग्रसर हुए। धर्म कितनी जहालत और अन्धकार की तरफ ले जा सकता है यह भाजपा के नेताओं के बयानों से जाहिर है। दूसरी तरफ तुर्की की एर्दोगन हुकूमत और उसके मंत्री भी यही भाषा इस्लाम के नाम पर बोल रहे हैं। इतिहास के इन क्षणों में मोती- एर्दोगन दोनों समकालीन हैं और दोनों मानवद्रोही।

जनमुक्ति का कोई भी रास्ता पूंजी के शोषण को समाप्त किये बिना नहीं होता और इंसान की मुक्ति धर्मों की सार्वजानिक अभिव्यक्ति का नाश किए बिना असंभव है।

तुम्हारे धर्म की क्षय हो !!!

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