बस्तरिया बटालियन : सरकार एक गंदा और खतरनाक खेल रही है

बस्तर में माओवादियों से लड़ने के लिए केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों ने स्थानीय आदिवासी बल तैयार किया है

इकाॅनोमिक ऐंड पाॅलिटिकल वीकली
Updated on : 2018-06-05 22:35:04

बस्तरिया बटालियन : सरकार एक गंदा और खतरनाक खेल रही है

बस्तरिया बटालियन : बस्तर में माओवादियों से लड़ने के लिए केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों ने स्थानीय आदिवासी बल तैयार किया है

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सीआरपीएफ के आदिवासी जवानों के पासिंग आउट परेड में 21 मई को हिस्सा लिया. इस बटालियन को इसलिए बनाया गया है कि ताकि बस्तर में सीआरपीएफ की कार्रवाई को एक नई ताकत मिले. इस ‘बटालियन 241’ को आम तौर पर ‘बस्तरिया बटालियन’ कहा जाता है. बहुत जल्द ही यह बटालियन सरगुजा जिले के अंबिकापुर प्रशिक्षण केंद्र से बस्तर पोस्टिंग के लिए जाएगी. 534 लोगों के इस बटालियन में 189 महिलाएं हैं. ये लोग छत्तीसगढ़ के उन जिलों के आदिवासी हैं जो नक्सलवाद से काफी ज्यादा प्रभावित हैं. ये जिले हैं- बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और सुकमा. इन्हें सीआरपीएफ के नागरिक कार्य कार्यक्रम से चुना गया है. यह अभियान आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को सूचना देने वाले के तौर पर इस्तेमाल करने के मकसद से चलता रहा है.

नक्सलियों से बदला लेने की भावना भर्ती का आधार

सीआरपीएफ स्थानीय आदिवासी जवानों का इस्तेमाल स्थानीय सूचनाओं को हासिल करने और उसके आधार पर अपना काम आसान करने के लिए करना चाहती है. विशेष पुलिस अधिकारी यानी एसपीओ की नियुक्ति के वक्त यह देखा जाता था कि सामने वाले में नक्सलियों से बदला लेने की भावना है या नहीं. इस बार भी अघोषित तौर पर यह एक पैमाना था. बस्तरिया बटालियन की एक महिला ने इंडिया टुडे संवाददाता को बताया कि उन्हें उनके परिवार के तीन लोगों की नक्सलियों द्वारा हत्या किए जाने का बदला लेने के लिए प्रशिक्षित किया गया है. इनके पिता की हत्या नक्सलियों ने इसलिए कर दी थी कि उन्हें शक था कि वे पुलिस के भेदिया हैं.

सरकार एक गंदा और खतरनाक खेल रही है - माओवादी

माओवादी सामान्यतः सलवा जुडुम के समय से इन एसपीओ से यह कह रहे हैं कि अपनी नौकरी छोड़ दें और जनता से माफी मांग लें. जून, 2005 से सरकार ने इन लोगों का इस्तेमाल स्थानीय कड़ी के तौर पर शुरू किया था. पीपल लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने जब 15 मार्च, 2007 को एक वैसे पुलिस कैंप पर हमला किया जिसमें एसपीओ भी थे तो उस वक्त यह बयान जारी किया, ‘सरकार एक गंदा और खतरनाक खेल रही है. आपको आगे करके अपने भाइयों, बहनों और मां-बाप को मारने को कह रही है. इसलिए हम आपसे यह नौकरी छोड़ने को कह रहे हैं.’

इन एसपीओ को 2010 से कोया कमांडो कहा जाने लगा. इन पर माओवादियों की अपील का असर भी हुआ और एक तिहाई लोगों ने नौकरी छोड़कर घर लौटने का निर्णय लिया. बाकी बचे हुए लोगों को 2011 के उच्चतम न्यायालय के 2011 के निर्णय के बाद इस बल को भंग करके सशस्त्र ऑक्जिलरी बल का नाम दे दिया गया. 2013 में इन्हें जिला रिजर्व गार्ड का नाम दिया गया और उन्हें खुद को माओवादी दिखाकर गांव वालों को या माओवादी अभियान से जुड़े लोगों को फंसाने का काम दिया गया.

उग्रवादी विरोधी कार्रवाइयों के जिन विशेषज्ञों ने यह तरीका निकाला था, उनका मानना है कि यह प्रयोग बेहद सफल रहा है. इन लोगांे का यह भी कहना है कि स्थानीय लोगों को सुरक्षा बलों के साथ लगाने का फायदा जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर में काफी ज्यादा हुआ है. इन दावों के बीच सच्चाई यह है कि बस्तर का अभियान दो आदिवासी-किसान संगठन चला रहे हैं. इनमें एक है दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संगठन और दूसरा है क्रातिकारी आदिवासी महिला संघ. इन्हें पीएलजीए और माओवादी पार्टी का समर्थन हासिल है. जिस तरह सलाव जुडुम ने पहले छह-आठ महीने में सुरक्षा बलों की मदद की थी वैसे ही बस्तरिया बटालियन से भी कुछ फायदा सुरक्षा बलों को मिल सकता है लेकिन अंततः एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित होगी.

पिछले तीन दशक से प्रदेश सुरक्षा बल के साथ केंद्रीय सुरक्षा बल भी बस्तर में तैनात है. अब तो ड्रोन का इस्तेमाल करके माओवादियों की गतिविधियों की जानकारी भी जुटाई जा रही है. हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल सुरक्षाबलों को तुरंत किसी स्थान पर उतारने के लिए किया जा रहा है. बुलेटप्रूफ गाड़िया हैं और दूसरे आधुनिक सैन्य उपकरण हैं. इसके अलावा अब स्थानीय लोगों को अपने ही लोगों को मारने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है.

सरकार चुनावों के लिए पैसा जुटाने के बदले खनन के ठेके दे रही है. सत्ताधारी दल कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों को अनुकूल खबरों के प्रकाशन और प्रसारण के लिए पैसे देते हैं. यहां तक कि चुनाव भी उग्रवाद विरोधी अभियानों पर हो रहे हैं. लेकिन उग्रवाद विरोधी गतिविधि में एक चीज की कमी थी और उसे बस्तरिया बटालियन बनाकर पूरा कर दिया गया.

EPW Editorials, Economic & Political Weekly EPW, वर्षः 53, अंकः 22, 2 जून, 2018

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