भविष्य के भारत पर मोहन भागवत का भाषण : पपू अपने स्वयंसेवकों के मनोरोग को जानते हैं

भविष्य के भारत पर मोहन भागवत के भाषण का एक मनोवैज्ञानिक निरीक्षण...

भविष्य के भारत पर मोहन भागवत का भाषण : पपू अपने स्वयंसेवकों के मनोरोग को जानते हैं

भविष्य के भारत पर मोहन भागवत के भाषण का एक मनोवैज्ञानिक निरीक्षण

अरुण माहेश्वरी

मोहन भागवत ने अभी दिल्ली में आरएसएस के आयोजन में अपने तीन भाषणों की श्रृंखला के प्रारंभिक भाषण में गांधी जी का और स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस के ‘सर्वस्वत्यागी’ नेताओं का उल्लेख करके बहुतों को चौंका दिया होगा। ख़ास तौर पर संघ के कारख़ाने में बनाये जाने वाले ‘चरित्रवानों’ को तो उनकी बातें किसी असंभव और अबूझ पहेली की तरह या पागल के प्रलाप की तरह लगी होगी।

जो सारे तत्त्व जैसे जन्मजात गोडसे-पूजक होते हैं, आस्था और विश्वास के स्तर तक गांधी जी को आज के भारत की सारी समस्याओं के लिये मुख्य रूप से दोषी मानते हैं, वे अचानक जब अपने ही मुखिया से गांधी जी की प्रशंसा के शब्द सुनेंगे या हिंदुत्व के एकात्म राज्य के बजाय वैविध्यमय भारत को स्वीकारने और वैविध्य का उत्सव मनाने की तरह की बात सुनेंगे तो क्या ऐसी पूरी बिरादरी को उनकी बात का एक अक्षर भी समझ में आ सकता है ?

इस सवाल पर विचार करने पर हमें लगता है कि संभवत: मोहन भागवत भी इस बात को अच्छी तरह जानते होंगे। इसीलिये जब वे ऐसी बातें कहते हैं वे उनकी अपनी संघ बिरादरी को संबोधित नहीं होती है। वे जानते हैं कि यह बिरादरी तो इतनी चिकनी है कि उनकी इन बहकी हुई बातों की एक बूँद भी उन पर ठहरने वाली नहीं है। संघ की तरह के सात पर्दों के पीछे से काम करने वाले एक रहस्यपूर्ण संगठन के मुखिया के नाते वे सचेत रूप में इन बातों से अपने सच पर एक और पर्दा भर डालने का दायित्व भर निभा रहे थे।

गांधी -आरएसएस के संबंध

दरअसल, गांधी जी के साथ आरएसएस के संबंध पर जब भी हम सोचते हैं, किसी भी मनोरोगी के मनोजगत में उसके पिता की जो स्थिति होती है, यह बिल्कुल वैसी ही स्थिति है। मनोचिकित्सकों ने अपने गहरे पर्यवेक्षणों से इस बात को नोट किया है कि किसी भी मनोरोगी के मनोजगत में उसके पिता के लिये कोई स्थान नहीं होता है। ( The name of the father is simply absent from the mental universe of the psychotic patient - Jacques Lacan) फ्रायड की शब्दावली में, उसका दमन नहीं, बल्कि उसे ख़ारिज करके पूरी तरह से काट कर फेंक दिया जाता है। Foreclosed कर दिया जाता है। When an element is repressed, it can return in one’s speech, in the signifying chain, the symbolic. But when the element is foreclosed, it can’t return in the symbolic, for the very simple reason that it never existed there in the first place. It was rejected, banished.

( जब किसी तत्त्व को दबाया जाता है, वह आदमी की बातों में लौट आ सकता है, उसके विचारों की श्रृंखला में, चित्त में। लेकिन जब किसी तत्त्व को ख़ारिज कर दिया जाता है तो वह इस साधारण कारण से ही उसके चित्त में लौट कर नहीं आ सकता है, क्योंकि वह उसके शुरू में ही कहीं नहीं था, उसे ख़ारिज कर दिया गया था, निष्कासित।)

मोहन भागवत अपने संघी चरित्रों की इस मनोदशा को जानते हैं, इसीलिये दूसरों के सामने इधर-उधर की हाँकने से नहीं डरते हैं। उनके लिये उन्होंने अपने भाषण में जो एक वाक्य कहा, वही काफी था - ‘भारत हिंदू था, हिंदू है और हिंदू रहेगा’। बाकी गांधी जी, स्वतंत्रता आंदोलन, वैविध्यमय भारत आदि से जुड़ी सारी बातें संघ जगत के लिये बेमाने थी।

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