बाढ़नामा--अभी तो आगाज़ है

अगली बार बाढ़ और हमारे इंताजामात के बीच कोई नूरां कुश्ती नहीं, दंगल होगा यानी खुला खेल फर्रुखाबादी। जो मर गए उन्हें खुदा जन्नतनशीं करे और जो बच गए वे अगले बचाव की तैयारी में अभी से लग जाएं।...

हाइलाइट्स

बाढ़ ने मारे पांच-छह सौ तो महामारियां धोबन बन कई की गठरी पीठ पे लाद सी यू अगेन कह कर चलती बनेंगी। गांव-गोट के कई घर सांय-सांय करते दिखेंगे। कहीं विलाप के स्वर गूंजेंगे तो कहीं सिसकियां। सरकार और प्रशासन गाल बजाने के पुरातन चरित्र को कायम रखेंगे। ढोल भी पीटे जाएंगे कि देखा हम विनाश के भरपूर दाम ले आए।

 

मुजफ्फरपुर बाढ़नामा--4

राजीव मित्तल

अभी तो आगाज़ है

जब इतने दिल से बुलाया है तो ऐसे ही चली जाएगी क्या! हर साल आवभगत का खासा इंतजाम रहता है। किसी बार नखरे भी दिखाती है नेकबख्त कि बोर हो गयी एक ही धरती को बरबाद करते-करते, वही रस्ते, वही खेत, वही झोंपड़पट्टियां, वही गंदे शहर, वही चीथड़ा सड़कें, वही भिखारिन के सिर के बालों के गुच्छों जैसे लटकते बिजली के तार, वही बजबजाती नालियां। लाशों के वही स्याह चेहरे, वही अल्लनटप्पू किस्म की बयानबाजियां, वही सामान रहित राहत शिविर।

इस बार पता नहीं कैसे इनायत कर दी, जो इतना फैल कर पसर गयी। चौराहे-चौराहे पर स्वागतद्वार भी तो लगे हुए थे न इस बार। अगर देवी जी नहीं आतीं तो अकाल भैया को बुलावा भेजा जाता। पानी और सूखा दोनों के लिये फाइव स्टार वाले इंतजाम हैं यहां। चाहे जितना लीलो चाहे जितना छितराओ। तो साहेबान इस बार बाढ़ यहां भी है वहां भी। भरपूर।

ऐसी यादें छोड़ कर जाएगी कि दसियों साल भी दर्शन न दिये तो गम नहीं। कई साल उसकी थिरकनें याद बन सताती रहेंगी। बरबादी के निशां पीछे छोड़ बाढ़ खिसकेगी तो अगली अभी से सामने वाले पेड़ की शाख पर बैठी उल्लू और गिद्धों की तरह ताक रही हैं। उन्हें मालूम है कि दवाइयां इतनी ही होंगी कि एक खाए और छह सूंघें। सो महामारियों को भी चिंता करने की जरूरत नहीं।

बाढ़ ने मारे पांच-छह सौ तो महामारियां धोबन बन कई की गठरी पीठ पे लाद सी यू अगेन कह कर चलती बनेंगी। गांव-गोट के कई घर सांय-सांय करते दिखेंगे। कहीं विलाप के स्वर गूंजेंगे तो कहीं सिसकियां। सरकार और प्रशासन गाल बजाने के पुरातन चरित्र को कायम रखेंगे। ढोल भी पीटे जाएंगे कि देखा हम विनाश के भरपूर दाम ले आए।

अगली बार बाढ़ और हमारे इंताजामात के बीच कोई नूरां कुश्ती नहीं, दंगल होगा यानी खुला खेल फर्रुखाबादी। जो मर गए उन्हें खुदा जन्नतनशीं करे और जो बच गए वे अगले बचाव की तैयारी में अभी से लग जाएं।

हमने तो अपने हाथ 33 दिन पहले ही खड़े कर दिए थे और तब से नीचे नहीं गिराए हैं ताकि कोई बाद में दोष न दे सके।

सर-सर, राहत शिविर में बहुत हंगामा हो रहा है, वहां कोई सामान नहीं है। डीएम और मंत्रियों को बाढ़पीड़ितों¸ ने घेर रखा है। कपड़े तक फाड़ दिए हैं, सर उसके आगे तो आप जानते ही हैं। अरे बेवकूफ, इन लोगों को वहां जाने की जरूरत ही क्या थी। अब जल्दी से वहां बड़े पर्दे का टीवी लगवाओ, द्रविड़ की सेंचुरी उन्हें भीड़ से बचा लेगी। जरा ऊंचे पे रखवाना ताकि सबको दिखे। और खुद भी जोर-जोर से चिल्लाओ-एक छक्का और!!!

bihar flood      
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