जब बिपन चन्द्र ने कहा - हम लोग तो नेहरू तक को नहीं छोड़ते थे और आज सोनिया की तारीफ करनी पड़ रही है

जानें चार बातें जिनके कारण बिपन चन्द्र पर कांग्रेसी लेवल लगा दिया गया...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

उन्होंने कहा कि मेरे आज तक किसी वामपंथी मित्र से व्यक्तिगत सम्बन्ध खराब नहीं हुए, भले ही दिमागी रूप से हम अलग-अलग सोचने लगे हों।

आलोक वाजपेयी

बिपन चन्द्र और कांग्रेस।

एक बार बिपन से इस पर बात हुई। मैं भी उनसे मिलने से पहले समझता था कि बिपन की कांग्रेस में बहुत पैठ होगी, क्योंकि उनके लेख वगैरह पढ़े थे, जिनमें वो राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका रखते थे और समसामयिक लेखों में भी यह दिखता था। पर जब भी उनसे सामयिक राजनीति पर मेरी बात होती तो वो व्यक्तिगत रूप से कांग्रेस के लिए आलोचनात्मक रहते थे। एक बार उन्होंने हंसके कहा कि आज मेरे बहुत से पुराने साथी सोनिया गांधी में सकारात्मकता देखते हैं तो मैं उनसे हंसकर कहता हूं कि हम लोग तो नेहरू तक को नहीं छोड़ते थे और आज ये हालत हो गयी कि सोनिया की तारीफ करनी पड़ रही है। यह उन्होंने वामपंथी बुद्धिजीविता की दिशा हीनता पर joke के रूप में तंज करते हुए कहा था।

तो मैंने पूछा कि आपको अब दिल्ली के बहुत से इतिहासकार कांग्रेसी इतिहासकार मानते हैं तो ये क्या है।

इस पर उन्होंने विस्तार से बहुत सी बातें बतायीं कि क्यों, कब से और कैसे कम्युनिस्ट पार्टियों ने उन्हें isolate करना शुरू कर दिया। (वो फिर कभी)। फिर उन्होंने कहा कि मेरे कभी की किसी कांग्रेसी नेता से निजी सम्बन्ध नही रहे। कुछेक कांग्रेस के नेता अपने आप कभी मिलने या कोई चर्चा करने या गए तो आ गए। उन्होंने कुछेक नाम भी बताये जिन्हें लिखना जरूरी नहीं। ये बताया कि बस एक बार इंदिरा गांधी के बुलावे पर उनसे मिलने गया था सिख आतंकवाद के जमाने मे चर्चा के लिए।

उन्होंने कहा कि मेरे व्यक्तिगत दोस्त, जान परिचय, उठना बैठना हमेशा वामपंथी लोगों के साथ ही हुआ। फिर उन्होंने अपने कम्युनिस्ट मित्रों के नाम और उनके साथ के किस्से बताने शुरू किए। अजय घोष, ई एम एस नम्बूदरीपाद, रणदिवे, मोहित सेन, पीसी जोशी, डांगे,  और न जाने कितने राष्ट्रीय स्तर के कम्युनिस्ट नेता उनके व्यक्तिगत मित्र रहे।

उन्होंने कहा कि मेरे आज तक किसी वामपंथी मित्र से व्यक्तिगत सम्बन्ध खराब नहीं हुए, भले ही दिमागी रूप से हम अलग-अलग सोचने लगे हों।

फिर उन्होंने हंस के कहा था कि चार बातों के कारण मुझ पर कांग्रेसी लेवल लगा दिया गया।

1. गांधी के पुनर्मूल्यांकन का मेरा आग्रह जो RPD से अलग था।

2. राष्ट्रीय आंदोलन को केवल बुर्जुआजी का आंदोलन न मानना

3 वामपंथियों द्वारा सम्प्रदायिकता के मुद्दे की अनदेखी करना और मेरे द्वारा सम्प्रदायिकता को सबसे बड़ा मुद्दा मानना

4 कम्युनिस्ट पार्टियों की हर बात में हाँ में हाँ न मिलाना।

फिर बहुत आराम से सहज ढंग से उन्होंने कहा, मुझे कांग्रेस से क्या मतलब। एक मार्क्सवादी होने के नाते ही जो सही समझता हूँ कहता लिखता हूँ।

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