नागरनामा पर बिपिन तिवारी का दिलचस्प आलेख

बिपिन तिवारी जोशीले जवान लेखकों से दूर अध्ययन के आधार पर जो मूल्य पेश कर रहे हैं वह सराहने योग्य भी है और सीखने योग्य भी. ...

अतिथि लेखक

संजीव ‘मजदूर’ झा.

सामान्यतः आलेखों पर समीक्षा लिखने का चलन उस रूप में नहीं रहा है जिस रूप में अन्य विधाओं के साथ है. आलेखों पर प्रतिक्रिया और उसकी जांच-पड़ताल का सिलसिला का स्वरुप भी लगभग बदल चुका है. छपने और छापने की मज़बूरी जैसी पद्धतियों ने एक नुकसान यह भी किया है कि अध्ययन के क्षेत्र में ‘कंटेंट’ आधारित बहस को लगभग खत्म कर दिया गया है. ऐसे कई वजह हैं जिससे साहित्य को एक सीमा तक नुकसान पहुँचाया जा रहा है. साहित्य को बाजार के रूप में स्वीकारने और भेड़ चाल में ढलने से उनलोगों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है जो आज भी विशुद्ध रूप में अध्ययन को पहली नींव मानते हैं. ऐसे समय में लेखन में अच्छी भाषा और दिलचस्पी दोनों का अभाव बड़े पैमाने पर देखने को मिलता है.

‘बया’ पत्रिका के जनवरी-मार्च 2018 में ‘नागरनामा’ में युवा आलोचक बिपिन तिवारी का आलेख ‘अमृतलाल नागर : एक शख्सियत’ दिलचस्प भाषा के साथ प्रस्तुत किया गया है.

यह आलेख कई मायनों में विचारणीय है. सबसे पहले तो यह कि लेखक की भाषा विषय के प्रति अभिरुचि पैदा करने में सफ़ल है. ‘अभिरुचि’ के संदर्भ में कई विद्वानों को आपत्ति भी रही है इसलिए जरुरी है कि विषय और उसकी भाषा के आधार पर अभिरुचि को भी ठीक-ठीक समझने का प्रयास किया जाए.

अंतोनियो ग्राम्शी सौंदर्यशास्त्र पर विस्तार से विचार करते हुए कहते हैं कि –“जनाभिरुचि को प्रभावित करने या बदलने का काम कला के इतिहास से नहीं, संस्कृति के इतिहास से मतलब रखता है.”

इस आधार पर देखें तो पूरे आलेख में ‘नागरनामा’ की मूल संस्कृति को पहचानते हुए लेखक ने एक खास किस्म की अभिरुचि पैदा कर दी है. किसी भी आलेख के लिए इससे बड़ी बात और कुछ नहीं कि उसे पढ़ते हुए मूल विषय को जानने-पहचानने की इच्छा तीव्र हो उठे. बिपिन तिवारी के अधिकांश लेखों में इस बात को आसानी से महसूस किया जा सकता है.

नागर जी पर लिखते हुए गुरु-शिष्य प्रसंग जिस रूप में आया है वह रोचकता तो पैदा करती ही है साथ ही यह उस गंभीरता की ओर भी इशारा करता है कि आखिर वे कौन से कारण हैं कि यह परंपरा खत्म होने के कगार पर है.

मुझे लगता है इस क्रम में लेखक को वर्तमान परिस्तिथियों पर भी विचार करना चाहिए था. ऐसा इसलिए जरुरी था कि आलेख में इस विषय का एक पक्ष ही सामने आ पाया है. हालांकि उल्लेख किया गए प्रसंग की अवस्था भिन्न जरुर है. फिर भी यह एक गंभीर विषय तो है ही. नामवर सिंह जब कहते हैं कि  –

“गुरु की चिंतन परंपरा का सतत विकास उदारदायित्वपूर्ण अस्वीकार साहसी शिष्य ही कर सकता है,सतत स्वीकार का अन्धानुगामीधर्मभीरु सेवक नहीं, जबकि आज के गुररू चाहते हैं, शिष्य नहीं ।”

तो कहना न होगा कि नामवर सिंह की चिंता के केंद्र में शिष्य के साथ-साथ गुरु भी हैं। इसी संदर्भ में ब्रेख्त की पंक्ति की याद भी ताजा हो उठती है जिसमें वो कहते हैं कि—“अध्यापक अक्सर मत कहो कि तुम सही हो, छात्रों को महसूस कर लेने दो खुद-ब-खुद, सच को थोपो मत, यह ठीक नहीं है सच के हक में, बोलते हो जो उसे सुनो भी।”

इन विषयों पर नामवर सिंह तो फिर भी स्वयं में ही एक गंभीर समस्या रहे हैं लेकिन ब्रेख्त और इसी विषय पर राजेन्द्र यादव का ‘विश्वविद्यालय साहित्य के कब्रिस्तान हैं’ पर चर्चा की गुंजाईश थी.

आलेख में पृष्ठों की अपनी सीमा के बावजूद बिपिन तिवारी की भाषा गौतम सान्याल के चर्चित व्यंग्य ‘पीं.पीं – एच. डी, जो मैंने नहीं की’ की एंटी थीसिस के रूप में अपना प्रभाव तो जमाती ही है.

नागरनामा पर लिखते हुए जिन जरुरी संदर्भों का जिक्र बिपिन जी ने किया है, वह है नागर जी का लेखिका नूर जहीर के साथ ईद और होली के अदला-बदली का प्रसंग. यह प्रसंग दो कारणों से काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है. एक तो वर्तमान में धार्मिक असहिष्णुता जिस रफ़्तार से बढ़ी है वहां इस साझा संस्कृति को रेखांकित करना जरुरी हो जाता है और दूसरा यह कि नागर जी को जिस तरह हिन्दुवादी लेखक के रूप में देखने का चलन बढ़ा उसे इस आधार पर सिरे से ख़ारिज किया जा सकता है.

इस आलेख में लेखक के लिए जो सबसे कठिन बात है वह है नागरनामा की संस्कृति में शामिल नागर जी के कई गुरु, शरदचंद, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, रामविलास शर्मा, जयशंकर प्रसाद, निराला, रूपनारायण पांडे भगवतीचरण वर्मा जैसे दिग्गजों को एक आलेख में साधना.

कहने की आवश्यकता नहीं कि लेखन में खास किस्म की साधना स्पष्ट रूप में लक्षित होती है. लेकिन पढने के बाद ऐसा प्रतीत होता है मानो गुड़ बनाने की प्रक्रिया चाहे जितनी कठिन रही हो लेकिन उसका रस मन को तृप्त कर बैठा है.

पत्र-पत्रिका और संपादक मित्रों से सीखने की कला, निराला का शोषितों के पक्ष में खड़े होना और सरोज की शादी जैसे विविध प्रसंगों को भाषा के अपने खास कलेवर में एक साथ पेश करना वाकई दिलचस्पी पैदा करता है.

जगह- जगह पद्मावत पर हुई समस्याओं के साथ वर्तमान सामाजिक समस्याओं के अनेकों पक्षों से जोड़कर इस आलेख को तैयार करना यह भी स्पष्ट करता है कि हम अपने अतीत के साथ वर्तमान को कितना जी रहे हैं.

बिपिन तिवारी के आलेख और लेखन कला को समझना इसलिए भी जरुरी हो जाता है कि वे ‘सिर्फ बहस’ के लिए किसी विषय को नहीं उठाते. उनका यह स्वभाव सोशल साईटस पर सामाजिक विषयों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है.

संजीव ‘मजदूर’ झा
संजीव ‘मजदूर’ झा

जो बात शरदचंद ने नागर जी के लिए कही थी कि –‘जवानी के जोश में सभी लेखक बनते हैं, जो सारी जिंदगी लिखता है वही लेखक होता है’, इस बात का प्रभाव बिपिन जी पर भी देखने को मिलता है. जबकि आज फेसबुक के दौर में जोश वाले जवान लेखकों की कमी नहीं है. उनके पास न तो ठीक-ठीक अध्ययन ही है और न ही विश्लेषण करने की क्षमता. वे सिर्फ आपके लिखे में ‘और अच्छा हो सकता था’ या टी.वी शो के जज़ की भांति सिर्फ़ यह कह भर सकने में सक्षम हैं कि –‘बस बीच में जो लय टूट गया था, उसे संभाल लें. बाकि सब ठीक है’. ये अलग बात है कि महोदय को गीत-राग़ समझ में शायद ही पड़े.

इस जड़ होती अध्ययन परंपरा में इस तरह का लेख-विचार-भाषा एक उम्मीद जगाती है. ‘जड़ होती अध्ययन परंपरा’ मैंने इसलिए कहा क्योंकि जिस जोश से आज कल बाबा नागार्जुन की कविता ‘अकाल और उसके बाद’ को कॉपी करते हुए ‘बालात्कार और उसके बाद’ लिखते हुए कहा गया कि –‘बाबा तुम ख़ुशनसीब थे कि ‘अकाल और उसके बाद लिखना पड़ा’, ‘बालात्कार और उसके बाद नहीं’. अब ऐसा कहना किस कोटि की मूर्खता है इसका विश्लेषण करना भी कठिन है. अकाल में मनुष्यता के बालात्कार के चरम रूप के इतिहास को नहीं जानने वाला जोशीला जवान लेखक ही बाबा नागार्जुन को यह सलाह दे सकता है.

बिपिन तिवारी इन जोशीले जवान लेखकों से दूर अध्ययन के आधार पर जो मूल्य पेश कर रहे हैं वह सराहने योग्य भी है और सीखने योग्य भी. 

इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए आपको और बया पत्रिका परिवार को बधाई.

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