मोदी मंत्र : जब गठबंधन मुकाबिल हो तो सीबीआई निकालो !

खत्म हो रही है भाजपा की खुशफहमी... सपा-बसपा के मुकाबले भाजपा-सीबीआई... कुल मिलाकर भाजपा इस वक्त चौतरफा घिरी नजर आ रही है और इसलिए उस पर आरोप लग रहे हैं कि उसने सीबीआई का इस्तेमाल करने की कोशिश की है...

देशबन्धु

उत्तर प्रदेश की राजनीति (Politics of Uttar Pradesh) में इस वक्त सीबीआई के कारण हलचल मची हुई है, और इसका असर राष्ट्रीय स्तर तक महसूस किया जा सकता है। दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के आदेश के तहत सीबीआई (CBI) शामली, हमीरपुर, फतेहपुर, देवरिया और सिद्धार्थ नगर इन पांच जिलों में अवैध रेत खनन (Illegal sand mining) के मामलों की जांच कर रही है। अदालत ने यह आदेश पहले दिया था, लेकिन सपा (Samajwadi Party) और बसपा (Bahujan samaj party,) के बीच आम चुनावों के लिए गठबंधन (alliance) तय होने की खबर सामने आने के बाद जिस तरह से जांच में तेजी देखने को मिली है, उसे देखते हुए इस जांच की टाइमिंग पर सवाल उठ रहे हैं। और इसमें सीधे भाजपा पर आरोप लग रहे हैं कि अपने राजनैतिक फायदे के लिए वह सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है। केंद्र की सत्ता में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) का क्या महत्व है, इसे राजनैतिक दल अच्छे से समझते हैं।

खत्म हो रही है भाजपा की खुशफहमी

भारत के 9 प्रधानमंत्री उत्तरप्रदेश से मिले हैं, जिनमें जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी यहां तक कि गुजरात से आने वाले नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं। उन्होंने 2014 में वडोदरा और वाराणसी दोनों जगहों से चुनाव लड़ा और जीता था, लेकिन बाद में वाराणसी को ही चुना। तब उत्तरप्रदेश से कुल 71 सीटें भाजपा ने जीती थीं, इसके अलावा ओमप्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल जैसे कई सहयोगी भी उसे उत्तरप्रदेश से मिले। फिर विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने 312 सीटें जीती थीं। इन बड़ी जीतों से भाजपा के हौसले बुलंद थे और कुछ और राज्यों की जीत या जोड़-तोड़ की सरकार बना कर उसने खुद को लगभग अजेय मानना शुरु कर दिया था। लेकिन अब भाजपा की यह खुशफहमी खत्म हो रही है।

सपा-बसपा के मुकाबले भाजपा-सीबीआई

BJP-CBI against SP-BSP

पांच विधानसभा चुनावों (Five assembly elections) में उसे हार मिली, और इससे पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश आदि कई जगहों पर उपचुनावों में भी उसे हार मिली। उत्तर प्रदेश में उपचुनावों में हार का जख्म भाजपा के लिए काफी गहरा रहा, क्योंकि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों की सीटें नहीं बचीं और इससे भी बड़ा झटका ये लगा कि अब तक धुर विरोधी रहीं सपा और बसपा ने मिलकर भाजपा को हरा दिया। इस जीत के बाद से उत्साहित अखिलेश यादव और मायावती दोनों ने पुरानी तमाम कड़वाहटों को भुलाते हुए गठबंधन जारी रखने की बात कही। समय-समय पर यह बात मीडिया के जरिए याद भी दिलाई जाती रही और यहां तक संकेत दे दिए कि भाजपा को हराने के लिए वे छोटे-बड़े त्याग करने तैयार हैं यानी सीटों का बंटवारा आपसी सहमति से होगा और इसमें कोई बाधा नहीं आने दी जाएगी।

अभी तीन-चार दिन पहले ये खबरें आने लगीं कि सपा-बसपा के बीच आम चुनावों को लेकर सारी बातें तय हो गई हैं और मुमकिन है कि 15 जनवरी तक गठबंधन का औपचारिक ऐलान हो जाए। इस खबर के आते ही भाजपा में अंदरूनी हलचल जरूर मची होगी, लेकिन बाहर यही नजर आया कि अवैध खनन मामले में सीबीआई ने जांच तेज कर दी है और इसमें पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी पूछताछ हो सकती है क्योंकि सपा सरकार में खनन मंत्रालय उनके पास था।

अपराध या गैरकानूनी काम कोई भी करे, कानून की नजर में सभी बराबर होते हैं, इसलिए मुख्यमंत्री हों या पूर्व मुख्यमंत्री या अधिकारी या उद्योगपति, जांच एजेंसी को बिना किसी दबाव के अपना काम करना चाहिए। इसलिए अखिलेश यादव पर कोई आरोप हो तो उसकी जांच में हर्ज नहीं है। लेकिन सवाल यही है कि सपा-बसपा गठबंधन पक्का होने की खबर आते ही सीबीआई जांच (CBI inquiry) में जो तेजी आई है, वह महज संयोग है या फिर इसके पीछे कोई राजनैतिक खेल है। यूं भी हाल ही में सीबीआई के भीतर जिस तरह रिश्वत के लेनदेन के आरोप लगे और जिसमें उसके बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच चल रही है, उससे इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी की विश्वसनीयता संदेह में आई है और यह धारणा भी पक्की हुई है कि सत्तारूढ़ दल अपने लाभ के लिए इसका दुरुपयोग कर सकती है।

भाजपा इस वक्त अपनी कमजोर होती स्थिति से वाकिफ है, उसने यह गणित भी देखा होगा कि 2014 में उसे मिले 42.6 वोटों के मुकाबले सपा को 22.3 फीसदी और बसपा को 20 फीसदी के करीब वोट मिले थे, लेकिन अब दोनों के वोट बैंक मिल जाएंगे तो उसे नुकसान ही उठाना पड़ेगा। इसके अलावा एनडीए के सहयोगियों की नाराजगी भी उसके लिए भारी पड़ सकती है। कांग्रेस अब तक तो सपा-बसपा गठबंधन से बाहर ही है, लेकिन जिस तरह राज्यसभा में कांग्रेस ने सपा का साथ दिया है, हो सकता चुनाव में भी ऐसी कोई संभावना बने।

The BJP seems to be surrounded all this time

कुल मिलाकर भाजपा इस वक्त चौतरफा घिरी नजर आ रही है और इसलिए उस पर आरोप लग रहे हैं कि उसने सीबीआई का इस्तेमाल करने की कोशिश की है। और ये आरोप निराधार नहीं लग रहे हैं। 25 साल पहले उत्तरप्रदेश में नारा लगा था मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम। अब मुलायम-कांशीराम की जगह नई पीढ़ी ने ले ली है, लेकिन मुकाबला एक बार फिर भाजपा से ही है।

(देशबन्धु का संपादकीय)

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