भाजपा की तो हैसियत क्या, देश के इतिहास से खुद कांग्रेस भी नेहरू और इंदिरा गांधी को बेदखल नहीं कर सकती

भाजपा आपातकाल के मरे हुए सांप को ज़िंदा कर जनता को भयभीत करना चाहती है सूत न कपास,जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठ...

भाजपा की तो हैसियत क्या, देश के इतिहास से खुद कांग्रेस भी नेहरू और इंदिरा गांधी को बेदखल नहीं कर सकती

भाजपा आपातकाल के मरे हुए सांप को ज़िंदा कर जनता को भयभीत करना चाहती है

सूत न कपास,जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठ

राकेश अचल

आपातकाल को गुजरे 43 साल हो गए लेकिन आज भी उसका रोना रोया जा रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा काला दिवस मना रही है और अपने काले-पीले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। भारत के सत्तर साल के लोकतांत्रिक इतिहास में आपातकाल एक काला अध्याय था, लेकिन देश की जनता ने उसे ढाई साल बाद ही एक दुःस्वप्न की तरह न सिर्फ भुला दिया था, बल्कि आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस को ही दोबारा सत्ता सौंप दी थी। जनता ने जिसे भुला दिया उसे भाजपा बार-बार याद दिला रही है ताकि कांग्रेस सत्ता में वापस न लौट आए। .

देश में आपातकाल के बाद कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़े थे, लेकिन रातों-रात एकजुट हुआ विपक्ष ढाई साल भी सत्ता को सम्हाल नहीं पाया, जनता ने आपातकाल की कसूरवार कांग्रेस को फिर चुना। जनता के सामने विकल्प ही न था। एक तरफ सांपनाथ दूसरी तरफ नागनाथ, जनता को कम विषैला विकल्प चुनना था सो उसने चुना और बार-बार चुना। जनता बार-बार गैर-कांग्रेसी दलों को आजमाती है और हर बार निराशा ही उसके हाथ लगती है, ऐसे में हर बार बिल्ली के भाग से छींका टूटता है।

आज देश में हालात 1975 के घोषित आपातकाल से कहीं ज्यादा खतरनाक

चार साल पहले लम्बी कोशिश के बाद कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बेदखल करने वाली भाजपा येन-केन-प्रकारेण सत्ता में तो आ गई लेकिन उसका असली चेहरा जल्द ही जनता के सामने आ गया। जनता को अगले साल फिर सांप और नाग में से एक को चुनना है, इसलिए भाजपा फिर से आपातकाल के मरे हुए सांप को ज़िंदा कर जनता को भयभीत करना चाहती है जबकि हकीकत ये है कि आज देश में हालात 1975 के घोषित आपातकाल से कहीं ज्यादा खतरनाक और भयावह हैं।

भाजपा आपातकाल के दुःस्वप्न को दिखा-दिखाकर जनता को ठगना चाहती है, शायद इसीलिए अब इस जमींदोज हो चुके विषय को पाठ्यक्रमों में शामिल करने की योजना बनाई जा रही है। इसमें हैरानी की बात भी नहीं है, क्योंकि बीते चार साल में भाजपा ऐसा एक भी नया काम नहीं कर पाई है जिसे पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया जा सके। नोटबंदी हो या जीएसटी, राममंदिर हो  या कश्मीर का मुद्दा, भाजपा हर मोर्चे पर नाकाम नजर आई है। भाजपा अपनी हर विफलता का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने में दक्ष है।

आने वाले आम चुनाव में बहुत कम समय शेष है, इतने कम समय में भाजपा अब न अपनी चाल बदल सकती है, न चरित्र, चेहरा बदलने का तो सवाल ही नहीं होता। भाजपा का चेहरा आज असहिष्णु और बजरंगी हो चुका है। भाजपा से देश की आम जनता ही नहीं उसके अपने नेता और कार्यकर्ता तक हताश हैं, लेकिन जॉकिटें बदल-बदल कर सियासत करने वाले भाजपा के युग-पुरुषों को हकीकत नजर ही नहीं आ रही। ऐसे में बेचारे स्वयं सेवक उसे कब तक और कैसे बचाये रख सकते हैं ?

मुझे ये मानने और कहने में कोई संकोच नहीं है कि भाजपा के मुकाबले खड़ी कांग्रेस के पास इस समय इस सदी का सबसे कमजोर और दिग्भ्रमित नेतृत्व है किन्तु मुझे लगता है कि भाजपा से हताश जनता विकल्प शून्यता के अभाव में एक बार फिर कांग्रेस की ओर ही रुख करेगी, भले ही उसे फिर निराश होना पड़े। कम से कम कांग्रेस के पास भाजपा जैसा टपोरी नेतृत्व तो नहीं है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने नेहरू और इंदिरा गांधी के परिवार को सियासत में जिस तरह से अछूत बनाने का प्रयास किया है वो ही अब उसके लिए सबसे बड़ी समस्या बनने वाला है। इस देश के इतिहास से भाजपा तो क्या खुद कांग्रेस भी नेहरू और इंदिरा गांधी को बेदखल नहीं कर सकती ऐसे में इन दोनों को गरिया कर राष्ट्रद्रोही बताकर भाजपा अगला आम चुनाव जीत लेगी मान लेना ठीक नहीं।

बहरहाल देश ने एक आपातकाल देखा है। बकौल अरुण जेटली हिटलर जैसे इंदिरा गांधी देखी है और नरेंद्र मोदी जैसा रूखा प्रधान भी देख लिया है। अब जनता को ही तय करना है कि उसे कैसा नेतृत्व चाहिए ? आपातकाल के दोषी तो कबके स्वर्ग सिधार गए लेकिन अघोषित आपातकाल के दोषी एक बार फिर मुखौटा बदलकर वोट की भिक्षा मांगने घर-घर पहुंचने वाले हैं, इसलिए जागते रहिये, ये समय सोने का नहीं है। सियासी जुलाहे बिना सूत और कपास के आपस में लठ्ठम-लठ्ठ भांजने में लगे हुए हैं।

राकेश अचल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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