गुजरात में भाजपा भारी हार की तरफ बढ़ रही

आज गुजरात में हूबहू, 2011 के बंगाल के चुनाव की पुनरावृत्ति होती दिखाई देती है। ...

अरुण माहेश्वरी

गुजरात के चुनाव अनायास ही आज फिर 2011 के पश्चिम बंगाल के चुनाव की याद दिला देते हैं। 2006 की भारी जीत के बाद हम लोगों के मन में एक ही सवाल था, वाम मोर्चा का वोट गिर कर भी आखिर कितना गिरेगा ? दुनिया की कोई भी ताकत वाममोर्चे के बहुमत को नहीं रोक पायेगी।

2006 में वाम मोर्चा को 233 सीटें मिली थी और एनडीए के घटक के रूप में तृणमूल कांग्रेस को सिर्फ 31 सीटें। 2011 के चुनाव में तृणमूल यूपीए के घटक के रूप में उतरी थी। इसके पहले पंचायत चुनावों में वाममोर्चे की हार के प्रमाण सामने आने लगे थे। लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था कि सिर्फ 30 सीटों वाली तृणमूल कांग्रेस कांग्रेस के साथ मिल कर 225 सीटों पर चली जायेगी।

काँटे की लड़ाई वाम मोर्चा के खिलाफ एक भारी तूफान साबित हुई।

आज गुजरात में हूबहू, 2011 के बंगाल के चुनाव की पुनरावृत्ति होती दिखाई देती है। भाजपा के नेता-कार्यकर्ता अपने समर्थन में गिरावट को तो देख पा रहे हैं, लेकिन 2014 में गुजरात में लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत के आँकड़ों को देख कर वे इस बात की कल्पना भी नहीं कर पा रहे है कि मामला उनकी बुरी हार तक भी पलट सकता है। वे कांग्रेस के लुंज-पुंज संगठन से परिचित रहे हैं और भाजपा के संगठन की अपराजेयता के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत। लेकिन वे इस ज़मीनी सचाई को नहीं देख पा रहे हैं कि समाज में सारे समीकरण उलट-पुलट चुके हैं। जैसे पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के लोग नहीं देख पा रहे थे।

इसीलिये, हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि गुजरात में इस बार भाजपा की जो हार होगी, उसका भाजपा के लोग ही नहीं, बाहरी पर्यवेक्षक भी अनुमान नहीं लगा सकते हैं।

इसमें सबसे बड़ा नुक़सान नरेन्द्र मोदी का निजी तौर पर होने वाला है। उन्होंने अहंकारवश इस चुनाव में अपनी निजी प्रतिष्ठा को दाव पर लगा दिया है। वैसे ही साढ़े तीन साल के शासन में उपलब्धि के नाम पर उनके पास शून्य है। नोटबंदी और जीएसटी ने उनकी छवि तुग़लक़ की तरह की बना दी है। ऊपर से गुजरात का यह धक्का उनके लिये एक ऐसा धक्का साबित होगा जिससे 2019 के पहले उबर पाने का उनके पास कोई उपाय नहीं है। जन-जीवन में वास्तव अर्थों में त्राहि-त्राहि मची हुई है।

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