मोदी-शाह जोड़ी के नेतृत्व में तेजी से नीचे खिसक रहा भाजपा का ग्राफ

अनुसूचित जातियों के सहयोगी पार्टियों के केंद्रीय मंत्रियों समेत, अनेक भाजपा सांसदों ने, मोदी-योगी राज मे वंचित तबकों के साथ अन्याय होने की खुलकर शिकायत की है

राजेंद्र शर्मा
Updated on : 2018-06-05 21:53:42

मोदी-शाह जोड़ी के नेतृत्व में तेजी से नीचे खिसक रहा भाजपा का ग्राफ

गुजरात, कर्नाटक के बाद उपचुनाव : भाजपा के लिए खतरे की घंटी

राजेंद्र शर्मा

मोदी लहर के बड़ी तेजी से उतर रहे होने में अगर गुजरात और कर्नाटक के विधानसभाई चुनाव के बाद भी किसी को शक रहा भी होगा, तो 28 मई को हुए चार लोकसभाई और दस विधानसभाई सीटों के उपचुनाव के नतीजों से दूर हो जाना चाहिए। देश के दस राज्यों में फैले होने से इन उपचुनावों ने एक तरह से मिनी-आम चुनाव का सा रूप ले लिया था। और इन उपचुनावों के नतीजों को चाहे किसी भी तरह से देखा जाए, वे जनता का फैसला मोदी की भाजपा के नेतृत्ववाले एनडीए के खिलाफ होने का ही संकेत करते हैं। सभी जानते हैं कि इस चुनाव में भाजपा, चार में से एक लोकसभा सीट और ग्यारह में से एक विधानसभाई सीट पर ही सिमट कर रह गयी। नगालैंड की लोकसभाई सीट को जोड़ लिया जाए, तब अपने सहयोगियों के साथ मिलकर भी उसके हिस्से में सिर्फ दो लोकसभा और एक विधानभाई सीट ही आयी हैं। इसके साथ ही भाजपा ने लोकसभा में अकेले बहुमत से भी दूर हो गयी है। लोकसभा की ये चारों सीटें भाजपा और उसके सहयोगियों के ही पास थीं। भाजपा से छीनी गयी लोकसभा की दोनों सीटों पर अगर कांग्रेस-इतर एनडीएविरोधी पार्टियों के उम्मीदवारों ने, जिन्हें कांग्रेस का भी समर्थन हासिल था, जीत दर्ज करायी है, तो विधानसभा की चार सीटों पर अगर कांगे्रस की जीत हुई है, तो छ: सीटें कांग्रेस-इतर एनडीए-विरोधी पार्टियों के हिस्से में आयी हैं। इसके भी अपने महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं, जिसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।

हॉट सीट बन गई थी कैराना की लोकसभा सीट

उप-चुनाव के इस चक्र में कैराना की लोकसभाई सीट पर अगर सबसे ज्यादा नजरें गढ़ी हुई थीं, तो यह स्वाभाविक ही था। बेशक, इसका संबंध सबसे बढक़र इस तथ्य से था कि इससे पहले उत्तर प्रदेश में ही गोरखपुर तथा फूलपुर की प्रतिष्ठïा की लोकसभाई सीटें उपचुनाव में भाजपा से छिनने के बाद, सभी राजनीतिक प्रेक्षक यह जानने के लिए उत्सुक थे कि विपक्षी एकता की जो पहल, सपा तथा बसपा की एकता के रूप में गोरखपुर तथा फूलपुर में देखने को मिली थी, आगे क्या दिशा लेने जा रही है? याद रहे कि गोरखपुर-फूलपुर की कामयाबी के बाद, सपा तथा बसपा ने इस एकता को बनाए रखने के ही संकेत नहीं दिए थे बल्कि इन संकेतों के आधार पर इसके अनुमान भी लगाए जाने लगे थे कि इस विपक्षी एकता के बल पर उत्तर प्रदेश, 2019 के आम चुनाव का पलड़ा निर्णायक रूप से भाजपा के खिलाफ झुकाने वाला राज्य साबित हो सकता है। 2017 के आरंभ में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभाई चुनाव में सपा-बसपा को पड़े वोट के योग के आधार पर इसके अनुमान लगाए गए जा रहे थे कि चुनाव में इस गठबंधन का सामना होने पर एनडीए को, 2014 के आम चुनाव में मिली 72 सीटों में से, पचास से ज्यादा सीटों का नुकसान हो सकता है।

विपक्षी एकता को आगे बढ़ाने के लिए सपा का लचीलापन

इस विपक्षी एकता के सूचकांक के आगे बढऩे या पीछे हटने के सवालों के अलावा, एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी था कि क्या यह एकता खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी वैसा ही असर दिखा सकती है, जैसा उसने पूर्वी उत्तर प्रदेश में दिखाया था। इस सवाल में दो ठोस मुद्दे छुपे हुए थे। पहला यह कि सपा और बसपा के साथ आने भर से, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिकांश विपक्षी स्पेस उस तरह कवर नहीं होता था, जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में होता था। इस क्षेत्र में इन दोनों ही पार्टियों के आधार की अपनी सीमाएं थीं और एक ओर चौधरी चरणसिंह के नाम से जुड़े राष्ट्रीय लोकदल की विरासत थी और दूसरी ओर कांग्रेस का भी कुछ आधार था। बहरहाल, विपक्षी एकता का इन दोनों को ही साथ में समेटने तक विस्तार, ज्यादा मुश्किल नहीं हुआ। उल्टे यहां मुख्य गठबंधन सपा और राष्ट्रीय लोकदल के बीच ही हुआ, जिसे एक ओर से बसपा तथा दूसरी ओर से कांग्रेस का समर्थन हासिल हुआ। वास्तव में, कैराना की लोकसभाई सीट लोकदल के निशान पर लड़े जाने का फैसला कर, एक प्रकार से गठबंधन के प्रमुख चेहरे के रूप में लोकदल को ही सामने रखा गया। इसीलिए, समाजवादी पार्टी ने पड़ौस में नूरपुर से विधानसभाई सीट पर अपने निशान पर उम्मीदवार खड़ा करने पर ही संतोष कर लिया, जबकि इन दोनों ही सीटों पर पिछले चुनाव में उसी के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे। विपक्षी एकता को आगे बढ़ाने के अलावा यह लचीलापन, इस क्षेत्र की एक विशेष चुनौती का सामना करने के लिए भी जरूरी था और अंतत: बहुत उपयोगी साबित हुआ।

काम न आया सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

इस विशेष चुनौती का संबंध इस क्षेत्र के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से था, जिसका मुजफ्फरनगर में 2013 के मध्य में हुए दंगे सबसे बड़ा हथियार बने थे। परंपरागत रूप से जाट और मुसलमान किसानों की सामाजिक एकता तथा किसान के नाते राजनीतिक व आर्थिक गोलबंदी की भी एकता का मजबूत गढ़ रहे इस क्षेत्र को, न सिर्फ सांप्रदायिक आधार पर पूरी तरह से बांट दिया गया था बल्कि इसी के सहारे भाजपा ने इसे अपने गढ़ में तब्दील कर लिया था। इस क्षेत्र की प्रमुख किसान जाति पर उसने इतना मजबूत शिकंजा कस लिया था कि राष्ट्रीय लोकदल जैसी परंपरागत रूप से जाटों की पार्टी खुद इस समुदाय से ही अलग-थलग पड़ गयी थी। इसी ध्रुवीकरण की पृष्ठïभूमि में 2014 के लोकसभा चुनाव में ही नहीं, 2017 के विधानसभाई चुनावों में भी भाजपा इस क्षेत्र में झाडूमार जीत हासिल करने में कामयाब रही थी। अचरज नहीं कि कैराना की सीट पर भाजपा के हुकुम सिंह ने, जिनके निधन से यह सीट खाली हुई थी, पचास फीसद से ज्यादा वोट लेकर और दो लाख 40 हजार वोट से ज्यादा के अंतर से जीत हासिल की थी। जैसाकि आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था, विपक्षी एकता की चुनौती की पृष्ठभूमि में, संघ-भाजपा इस क्षेत्र में चुनाव प्रचार में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा दे सकते थे और वास्तव में खुद मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ठीक ऐसा ही किया भी गया। मुख्यमंत्री न सिर्फ अपने ‘हिंदू-हितरक्षक’ होने की शेखी मारी बल्कि तथा मुजफ्फरनगर के हिंदू ‘शहीदों’ की याद दिलायी बल्कि सीधे ‘कैराना से हिंदुओं के पलायन’ के संघ परिवार के झूठ को आगे बढ़ाया, जिसका हुकुम सिंह ने ही सबसे ज्यादा प्रचार किया था। इसके बावजूद, अगर कैराना और नूरपुर दोनों में ही भाजपा को करारी हार का मुंह देखना पड़ा है, तो यह इसका भी संकेतक है कि विपक्षी एकता, संघ-भाजपा की सांप्रदायिक घेरेबंदी को भेदने में कामयाब रही है। गन्ना, जिन्ना पर भारी पड़ा। कैराना में संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार, तबस्सुम हुसैन का 51.2 फीसद वोट हासिल कर, 44,618 वोट से जीत दर्ज कराना इसी का इशारा करता है।

याद रहे कि 2014 के चुनाव के मुकाबले भाजपा के मत फीसद में गिरावट, एक आम रुझान की तरह सामने आती है। मिसाल के तौर पर महाराट्र में भंडारा-गोंदिया सीट पर ही नहीं, जो भाजपा ने एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार के हाथ खोयी है, पालघर की सीट पर भी जो भाजपा ने 2014 के मुकाबले बहुत घटे हुए अंतर से बनाए रखी है, उसके मत प्रतिशत में खासी कमी हुई है। इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी जरूरी है कि 2014 के आम चुनाव के मुकाबले भाजपा के समर्थन में गिरावट कोई हालिया उपचुनावों तक ही सीमित नहीं है। यह एक आम रुझान है जो इन चार सालों में अनेक राज्यों में विधानसभाई चुनावों में भाजपा के जीतने के बावजूद स्पष्टï रूप से देखा जा सकता था। वास्तव में यह भी कोई संयोग ही नहीं है कि 2014 के आम चुनाव के बाद से देश में हुए कुल 27 लोकसभा सीटों के उपचुनावों में, भाजपा सिर्फ पांच सीटें ही जीत पायी है, जबकि 2014 के आम चुनाव में इनमें से पूरी 13 सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी।

मोदी-शाह जोड़ी के नेतृत्व में तेजी से नीचे खिसक रहा भाजपा का ग्राफ

कैराना की ही तरह, मोदी-शाह जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा के ग्राफ के तेजी से नीचे खिसक रहे होने का संकेत, देश के दक्षिणी सिरे पर केरल से आया है। यहां सी पी आइ (एम) के नेतृत्व में एलडीएफ ने न सिर्फ चेन्गन्नेरी विधानसभाई सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा है, बल्कि त्रिपुरा के विधानसभाई चुनाव में अपनी अप्रत्याशित सफलता के बाद, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के केरल पर तथा इस सीट पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने की घोषणाएं करने के बावजूद, भाजपा काफी पीछे तीसरे स्थान पर ही बनी रही है। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इस चुनाव में एलडीएफ ने न सिर्फ करीब 21 हजार वोट के केरल के लिए रिकार्ड अंतर से जीत दर्ज करायी है बल्कि पिछले चुनाव के मुकाबले अपने वोट में भी उसने 14420 वोट की बढ़ोतरी दर्ज करायी है। यहां तक कि बढ़े हुए मत फीसद वाले इस चुनाव में, दूसरे स्थान पर रह गयी कांग्रेस के भी वोट में 2,450 वोट की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। दूसरी ओर, भाजपा को जोरदार झटका लगा है और 2016 के चुनाव के मुकाबले उसके वोट में पूरे 7,412 वोट की कमी दर्ज हुई है। संकेत साफ हैं। भाजपा और उसके नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन साफ तौर गिरावट पर है। और यह गिरावट साफ तौर पर बढ़ रही है। इस संदर्भ में उसके खिलाफ वोट का उल्लेखनीय हद तक एकजुट होना, 2019 में दोबारा सत्ता में आने के संघ और मोदी के मंसूबों पर आसानी से पानी फेर सकता है।

इस खतरे के सामने भाजपा की सहयोगी पार्टियों की बेचैनी छुपी नहीं रही है। तेलुगू देशम् के एनडीए से नाता तोडऩे और शिव सेना के नाता तोड़ने की कगार पर खड़े होने के अलावा, बिहार में तो इसने एनडीए में नये-नये आये जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व में, एनडीए के अंदर भाजपा-इतर मोर्चे का ही रूप ले लिया है। हालांकि कुशवाह ही आरएलएसपी तथा पासवान की लोजपा ही अब तक ज्यादा मुखर रही हैं, इस ग्रुप के दबाव में बुलायी गयी राज्य में एनडीए की पहली बैठक की पूर्व-संध्या में जदयू ने 2019 के चुनाव में बिहार में नितीश कुमार को ही एनडीए का मुख्य चेहरा बनाने की मांग उठाकर, तनाव बढ़ा दिया है। जाहिर है कि उपचुनावों के ताजातरीन चक्र में बिहार में जोकीहाट सीट पर राजद के 40 हजार से ज्यादा वोट के अंतर से कब्जा बनाए रखने ने, भाजपा को परेशान करने वाली इन आवाजों को और तेज कर दिया है। इससे पिछले चक्र में अररिया संसदीय सीट के उपचुनाव के बाद राजद की इस जीत को इसका संकेत माना जा रहा है कि नीतीश कुमार के पाला बदल के बावजूद, बिहार की जनता के बीच एनडीएविरोधी गठबंधन का ही पलड़ा भारी है।

याद रहे कि ऐसा ही तनावपूर्ण रिश्ता ओमप्रकाश राजभर की एसपीएसपी का योगी सरकार के साथ है। राजभर ने तो कैराना तथा नूरपुर में भाजपा की हार के बाद, बाकायदा योगी की जगह ओबीसी मुख्यमंत्री की मांग भी उठा दी है। उधर अनुसूचित जातियों के सहयोगी पार्टियों के केंद्रीय मंत्रियों समेत, अनेक भाजपा सांसदों ने, मोदी-योगी राज मे वंचित तबकों के साथ अन्याय होने की खुलकर शिकायत की है। संघ के कड़े बंधन के बावजूद, एनडीए गठबंधन की गांठें ढीली हो रही हैं। 2019 तक इस गठजोड़ में और टूट-फूट भी हो सकती है। कुशवाह ने सही कहा--भाजपा के लिए खतरे की घंटी बज गयी है।

संबंधित समाचार :