राम नवमी से राम मंदिर तक : सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के पुराने रास्ते पर भाजपा, चुनाव आ रहे हैं न !

संघ परिवार योजनाबद्ध तरीके से बिहार और पश्चिम बंगाल में राम भक्ति का माहौल बना रही है....

पूर्वी भारत में होने वाले टकराव चुनावों और उसके बाद के वक्त को ध्यान में रखते हुए ध्रुवीकरण की एक कोशिश है

2019 के आम चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी चुनावी लाभ के लिए अपने पुराने तरीके सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर वापस लौटते दिख रही है. बिहार और पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा से तो यही लगता है. राम नवमी पर उत्सव मनाने के मौके पर मुसलमानों पर इन दो राज्यों में हमले हुए. सोशल मीडिया और पार्टी के सांगठनिक ढांचे का इसमें बहुत अच्छे से इस्तेमाल किया गया.

इस साल राम नवमी पर निकले मोटरसाइकिल रैलियों में तलवार और भगवा झंडे लहराए गए. इस तरह का जुलूस आम तौर पर धार्मिक गीतों के साथ हिंदू बाहुल्य इलाकों से शुरू होकर योजनाबद्ध ढंग से मुस्लिम इलाकों में जाता है. वहां नारेबाजी सांप्रदायिक हो जाती है. कई ऐसी रैलियों का नेतृत्व स्थानीय संघ नेता और कार्यकर्ता करते हैं. इनमें झारखंड और उत्तर प्रदेश के संघ कार्यकर्ता भी शामिल हुए.

बिहार के अररिया में भाजपा उम्मीदवार की राष्ट्रीय जनता दल उम्मीदवार से हार के बाद जो सांप्रदायिक घटनाएं शुरू हुईं, वो राम नवमी तक चलीं. इनसे 10 जिले प्रभावित हुए, एक मौत हुई और करीब 65 लोग घायल हुए. पश्चिम बंगाल में राम नवमी पर हुई हिंसा में आसनसोल में चार लोगों की जान गई. पार्टी के राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के नेताओं ने प्रभावित इलाकों के दौरों पर राज्य सरकार द्वारा लगाई रोक को धता बताते हुए सिर्फ हिंदू इलाकों का दौरा किया. एक केंद्रीय मंत्री का बेटा बिहार में दंगा कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. जिस तरह की सूझबूझ की उम्मीद राजनीतिक नेतृत्व से की जा रही थी, वह हिंसा के शिकार युवक के मौलवी पिता इमादुल्ला रशिदी ने दिखाई. मीडिया से बातचीत में वे अपने बेटे की हत्या को लेकर बेहद गुस्से में दिखे लेकिन उन्होंने अपने समुदाय के लोगों से बदले की भावना त्यागकर शांति की अपील की.

पारंपरिक तौर पर बिहार और पश्चिम बंगाल क्रमशः लोहियावादी और वाम राजनीति के गढ़ रहे हैं. दक्षिण पंथी और अगड़ी जातियों को तवज्जो देने वाली भाजपा इन राज्यों में पैर नहीं जमा पाई है. बिहार में जनता दल यूनाइटेड से गठबंधन करने से भाजपा की स्थिति सुधरी है. दरअसल, दोनों राज्य भाजपा विरोध के केंद्र माने जाते रहे हैं. लंबे समय तक एक जगह राजद का शासन का रहा तो दूसरी जगह वामपंथी सरकार रही. लेकिन भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय स्तर की आक्रामक राजनीतिक तंत्र के जरिए न सिर्फ इन पार्टियों को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है बल्कि मौजूदा सत्ताधारी जदयू और तृणमूल कांग्रेस का भी यही हाल है.

इन दोनों पूर्वी राज्यों का इतिहास धार्मिक विविधता वाला रहा है. कई दशकों से यहां सांप्रदायिक तनाव नहीं देखा गया. राम नवमी तुलनात्मक तौर पर कम धूम-धड़ाके के साथ मनाया जाता रहा है. भाजपा के समर्थन से यह चीज बदल रही है और राम नवमी शक्ति प्रदर्शन का पर्व बनता जा रहा है. यह चीज कई और राज्यों में दिख रही है.

भाजपा राम को राजनीतिक लाभ के लिए एक मजबूत प्रतीक के तौर पर देखती है. उसे लगता है कि हिंदू राष्ट्र के लिए व्याकुल हिंदूओं का ध्रुवीकरण राम के नाम पर हो सकता है. यह सोच अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग से जुड़ी हुई है. इसलिए संघ परिवार योजनाबद्ध तरीके से बिहार और पश्चिम बंगाल में राम भक्ति का माहौल बना रही है. लव जिहाद का मुकाबला करने के लिए संघ ने ‘बेटी बचाओ, बहू लाओ’ अभियान चलाया है. मुस्लिम लड़कों को इस दौर के रावण और हिंदू लड़कियों को सीता के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि राम की तरह यह हर हिंदू का कर्तव्य है कि वह हिंदू लड़कियों की रक्षा करे.

2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा को बिहार में 29.9 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 17 फीसदी वोट मिले थे. 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में यह घटकर 24.4 फीसदी और 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में 10.2 फीसदी रह गया. कृषि संकट और जातिगत तनाव की वजह से सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ इन राज्यों में माहौल बन रहा है. पूर्वोत्तर में मिली कामयाबी के बाद भाजपा को उम्मीद है कि वह इन राज्यों में खुद को मजबूत कर सकती है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ आने से दो उपचुनावों में मिली हार के बाद भाजपा अपने पुराने फाॅर्मूले पर लौट रही है. बिहार में 17 फीसदी मुस्लिम आबादी है और पश्चिम बंगाल में 27 फीसदी है. इससे भाजपा को लगता है कि वह अल्पसंख्कों का डर पैदा करके धु्रवीकरण कर सकती है.

आबादी के मामले में बिहार और पश्चिम बंगाल तीसरे और चौथे स्थान पर हैं. दोनों राज्यों में देश के 16 फीसदी लोग रहते हैं. यह कम विकसित क्षेत्र हैं जहां अब भी औद्योगिकरण कम हुआ और गरीबी अधिक है. 2014 में भाजपा भ्रष्टाचार की वजह से उपजे गुस्से और विकास एवं रोजगार के वादे पर सत्ता में आई थी. लेकिन लोगों का जीवन स्तर सुधारने में नाकाम रहने के बाद भाजपा एक बार फिर जातियों और धर्म के आधार पर वैमनस्य फैलाने की कोशिश में है.

बिहार और बंगाल में आम लोगों ने इन हिंसक घटनाओं और सांप्रदायिक एजेंडे के खिलाफ अपनी बात रखी है. हालांकि, विपक्षी पार्टियां जैसे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस भाजपा के एजेंडे का मुकाबला करने के लिए खुद नरम हिंदुत्व अपनाती दिख रही हैं. जदयू गठबंधन की अपनी साथी भाजपा को काबू करने में नाकाम होकर चुपचाप बैठी है. अगर विपक्षी पार्टियां इस मौके को फायदा उठाकर एक वैकल्पिक चुनावी और सैद्धांतिक एजेंडा लोगों के सामने पेश करने में नाकाम रहते हैं तो यह देश का एक बड़ा नुकसान होगा.

Economic & Political Weekly EPW

वर्षः 53, अंकः 14, 7 अप्रैल, 2018

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