नोटबंदी देश के लिए ‘आर्थिक नसबंदी’, हवा में उड़ती सरकार भी अब जमीन पर

वास्तविक काला धन धारकों को निशाना बनाने के बजाए सरकार ने उन किसानों को निशाना बनाया, जिनके पास अपना कहने को ‘सफ़ेद’ भी नहीं है...

संजय पराते
हाइलाइट्स

नोटबंदी के कारण शहरों में रोजगार ख़त्म हुए हैं और गांवों में कामगार वापस लौटे हैं. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा है और अकेला कृषि क्षेत्र इस बोझ को वहन नहीं कर सकता.

नोटबंदी से भारतीय कृषि की नसबंदी

  • संजय पराते  

हर रिपोर्ट बता रही है कि नोटबंदी का देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है. विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, जिनके नुस्खों पर यह सरकार अपनी नीतियां तय करती हैं, का स्पष्ट मानना है कि जीडीपी वृद्धि दर में गिरावट आएगी. वैसे भी, वर्ष 2016-17 के पहले छःमाही के आंकड़े बता रहे हैं कि अर्थव्यस्था के सभी क्षेत्रों में गिरावट जारी है और ये आंकड़े ‘नोटबंदी’ के पहले के हैं.

औद्योगिक जगत कम उत्पादन, छंटनी और तालाबंदी का शिकार हुआ है और कम-से-कम 50 लाख मजदूर शहर छोड़कर गांवों की ओर लौटने को मजबूर हुए हैं, जहां पहले से ही काम की तंगी है.

इस ‘प्रतिकूल पलायन’ के कारण सरकार की शहरीकरण से जुड़ी तमाम योजनाएं ध्वस्त होने जा रही हैं.

इस प्रकार, नोटबंदी देश के लिए ‘आर्थिक नसबंदी’ साबित हुई है. हवा में उड़ती सरकार भी अब जमीन पर आती दिख रही है, इस बचाव के साथ कि इस कदम के कारण होने वाले नुकसान तो ‘अल्पकालिक’ है, लेकिन इसके ‘दीर्घकालीन फायदे’ होने जा रहे है और विकास के लिए ‘राष्ट्रभक्त नागरिकों’ को इतनी कुर्बानी तो देनी ही चाहिए. ‘राष्ट्रविरोधी तत्वों’ से वह अपने तरीके से निपट ही लेगी.

लेकिन इस ‘आर्थिक नसबंदी’ का भारतीय कृषि पर कितना प्रभाव पड़ा है, इसका समग्र आंकलन आने में अभी समय लगेगा. वैसे भी, खेतिहरों को छोड़कर किसी की भी दिलचस्पी कृषि में नहीं है –- सरकार की भी नहीं, क्योंकि देश के विकास का आंकलन तो जीडीपी से किया जाता है.

कृषि का देश की जीडीपी में योगदान 1950-51 में 53% था, जो आज 13-14% से ज्यादा नहीं है. इसलिए 60% जनता, जिसकी आजीविका कृषि से ही जुड़ी हुई है, आज हर लिहाज से अप्रासंगिक है, क्योंकि अब वे वैश्वीकृत बाजार का हिस्सा नहीं बन सकते. वैश्वीकरण का मूल मंत्र बाजार है. जिनका बाजार में योगदान नहीं, उन्हें जिंदा रहने का भी हक़ नहीं है. अतः चुनावों के दौरान भी खेती-किसानी और खेतिहर समाज की समस्यायें मुद्दा नहीं बन पाती.

लेकिन समस्या यही है कि सत्ता में बैठे लोग अपनी मनमर्जी की जनता नहीं चुन सकते. कृषि पर निर्भर 60% आबादी, जिनका वैश्वीकरण की बाजार-अर्थव्यवस्था में कोई ख़ास योगदान नहीं है, को आप नागरिकता से वंचित नहीं कर सकते. वे नागरिक हैं, मतदान करते हैं और कभी-कभी पलटकर तीखा वार भी करते हैं.

चुनाव के बाद सरकारों को कुछ समय तक संभलकर चलना भी पड़ता है, ताकि अधिकांश समय बिना किसी ताकतवर विरोध के कार्पोरेटों की सेवा कर सके.

लेकिन कृषि का जीडीपी में योगदान भले ही आठवां हिस्सा हो, इस पर 75 करोड़ जनता निर्भर है.

मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले वर्ष 2013-14 में कृषि विकास दर 4% थी और इन तीन सालों में इसमें भारी गिरावट आई है. इसका देश की समग्र अर्थव्यवस्था पर भले ही कोई ख़ास प्रभाव न पड़ा हो, खेतिहरों के जीवन पर इसका भारी नकारात्मक असर पड़ा है.

इस गिरावट का भी अधिकांश बोझ उन गरीबों को उठाना पड़ा है, जो खेतिहर आबादी का तो 87% है, लेकिन जिनकी मात्र 44% कृषि भूमि पर ही मिल्कियत है और इसके बावजूद वे कुल सब्जियों का 70% और कुल खाद्यान्न का 52% उत्पादन करते हैं. इसलिए अर्थव्यवस्था में किसी भी तरह की थोड़ी-सी भी गिरावट उनके जीवन में कहर ढाती है.

हम कहने के लिए तो यह दाव कर सकते हैं कि भारत का सालाना कृषि उत्पादन 28-29 लाख करोड़ रुपयों का है, लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही मौजूं है कि क्या ये पैसे वास्तविक किसानों के घर पर पहुंचते हैं या बिचौलियों का घर भरता है? हम अनाज उत्पादन मूल्य की गणना उत्पादन की मात्रा का समर्थन मूल्य से गुणा करके आसानी से निकाल सकते हैं, लेकिन किसान की जिंदगी सरल गणित नहीं होती, जिसमें धन और गुणा ही हो. उसकी जिंदगी में ऋण और भाग की ही प्रधानता होती है.

पहला ‘ऋण’ तो यही कि इस देश में रखरखाव के साधनों के अभाव में एक लाख करोड़ रुपयों की सब्जियां ही सड़ जाती है और यह ‘ऋण’ किसानों के हिस्से ही जमा होता है, किसी मुनाफा पीटने वाले बिचौलिए के खाते में नहीं. यह मार भी हर साल साधारण वक़्त की है.

नोटबंदी ने पूरे देश में जो ‘मुद्रा संकट’ पैदा किया, उसके कारण सब्जियों की कीमतों में भारी गिरावट आई और सब्जी उत्पादक किसान लागत मूल्य से भी वंचित हो गये. पूरे देश में उन्होंने सब्जियों को सड़कों पर फेंककर अपना विरोध जताया. टमाटर उत्पादक किसानों को पचास पैसे किलो का भाव भी नहीं मिला, जबकि इसी समय बिचौलियों ने बाजार में यह टमाटर पांच रूपये किलो के भाव से बेचा.

नोटबंदी के कारण सब्जियों की इस ‘अतिरिक्त’ बर्बादी का आंकलन आने में अभी समय लगेगा.

केन्द्रीय सत्ता में आने से पहले जिस भाजपा ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर लागत मूल्य का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में किसानों को देने का वादा किया था, सत्ता में आने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे दिया कि वह इतना ‘लाभकारी’ मूल्य देने के लिए तैयार नहीं है. उसने राज्यों को यह भी निर्देश दिया है कि उसके द्वारा घोषित समर्थन मूल्य पर किसी प्रकार का ‘बोनस’ किसानों को न दिया जाएं.

स्थिति यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य कृषि उत्पादों के न्यूनतम लागत की भी भरपाई नहीं करता. इसके ऊपर से सरकारी मंडियों में ही प्रबंधन इस बात को सुनिश्चित नहीं करता कि किसानों को यह न्यूनतम मूल्य भी मिले, क्योंकि बिचौलियों के साथ उसकी सांठगांठ रहती है.

नोटबंदी नवम्बर-दिसम्बर माह में आने वाली फसलों के लिए कहर बनकर आई. सभी जगहों की खबरें बता रही हैं कि 700-800 रूपये प्रति क्विंटल के भाव पर किसान अपना धान बेचने के लिए मजबूर हैं.

बाजार में फसल की कीमतों में इतनी भारी गिरावट पिछले पांच सालों में देखने को नहीं मिली. इसमें सहकारी बैंकों की पंगुता ने भी भारी योगदान दिया.

आज भी हमारे देश में सहकारिता कृषि क्षेत्र की रीढ़ है. ग्रामीण जनता और किसानों का काम-काज सहकारी बैंकों के जरिये ही चलता है. पुराने नोटों के लेन-देन पर पहले दिन से ही इन बैंकों पर रोक लगाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप्प हो गई.

वास्तविक काला धन धारकों को निशाना बनाने के बजाए सरकार ने उन किसानों को निशाना बनाया, जिनके पास अपना कहने को ‘सफ़ेद’ भी नहीं है.

सहकारी समितियां ‘लिंकिंग’ का धान काटने में ही व्यस्त रही, लेकिन किसानों के बकाया भुगतान के लिए ढाई माह बाद भी सक्षम नहीं हो पाई है.

भाजपा और कांग्रेस द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के दावे बढ़-चढ़कर किये जाते है, लेकिन वास्तविकता यह है कि पिछले 30 सालों में जिस कदर महंगाई बढ़ी है, उसके कारण कार्पोरेट मुनाफों में तो 1000% की वृद्धि हुई है और कर्मचारियों का वेतन सरकार को लगभग चार गुना बढ़ाना पड़ा है, लेकिन किसानों की आय में मात्र 19% की ही वृद्धि हुई है. वह सरकारी विभाग के एक अकुशल मजदूर को मिलने वाली मजदूरी तक से वंचित है.

क्या सरकार की नजर में कृषि कार्य एक अकुशल कार्य से भी निम्न स्तर का है? यदि नहीं, तो सरकार को इस तरह के उपाय करने चाहिए कि हर किसान परिवार की न्यूनतम कृषि आय न्यूनतम मजदूरी के बराबर हो सके, जैसा कि कई किसान संगठन और विशेषज्ञ यह मांग कर रहे हैं.

नोटबंदी का असर न केवल फसलों के विक्रय मूल्य पर पड़ा है, इसका असर आने वाली सीजन की फसलों पर भी पड़ने जा रहा है. निश्चित रूप से कृषि उत्पादन का रकबा प्रभावित होगा और इसका परिणाम हमें उत्पादन में गिरावट के रूप में दिखेगा. फसलों की बोनी की तैयारी के समय उसके हाथ कटे हुए थे. उसे सहकारी बैंकों से सहायता तो मिलनी नहीं थी, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी नोट गिनने में ही लगे थे. निजी बैंक तो खैर घोटालों में ही व्यस्त थे और अब प्रिंटिंग प्रेस से ही घोटालेबाजों तक सीधे नोट पहुंचने की कहानियां भी छनकर सामने आने लगी है. उसने जैसे-तैसे बोनी के लिए खेतों को तैयार किया भी, तो ‘नगद-नारायण’ के अभाव में उसके पास न बीज था, न खाद-दवाई.

खेतों की तैयारी में लगाए पैसे भी व्यर्थ हो गए और इससे या तो उसकी जमा-पूंजी को नुकसान हुआ या फिर महाजनी क़र्ज़ का फंदा और मजबूत हुआ. इसका असर फिर बारिश के मौसम में फसल की तैयारियों पर पड़ेगा.

इसका मतलब है कि वर्ष 2016-17 के साथ ही वर्ष 2017-18 में कृषि उत्पादन में गिरावट आयेगी.

इस गिरावट का मुकाबला आयात के जरिये किया जाएगा.

भारत आज भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खड़ा है गेहूं और दाल के आयात के लिए. जब भारत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कदम रखता है, तो बाजार की बांछे खिल जाती है, क्योंकि यह उसके लिए छप्पर-फाड़ मुनाफा कमाने का मौका देता है.

देश में इस वर्ष गेहूं का भरपूर उत्पादन हुआ, लेकिन इसके बावजूद हमने 35 लाख टन गेहूं का आयात किया और देश के किसानों को दिए जाने वाले भाव से 25% ऊंचे भाव पर आयात किया. फिर जनता को ‘सस्ता मिलने’ की दुहाई देकर आयात शुल्क शून्य प्रतिशत कर दिया.

दालों की भी यही कहानी है कि हर साल ऊंची कीमतों पर उसे आयात करते हैं जनता का पेट भरने के नाम पर. जनता को सस्ता मिले या न मिले, उसका पोषण हो या न हो, अनाज मगरमच्छों के पौ-बारह जरूर हो गए. नोटबंदी के एक कदम ने कितने बड़े-बड़े लोगों के लिए कितने बड़े-बड़े मुनाफे कमाने के मौके दिए हैं !!

देश में 75% से ज्यादा खेतिहरों के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है और इनमें से आधे लगभग भूमिहीनता की स्थिति में है. किसानी घाटे का सौदा है.

किसान परिवारों की औसत मासिक आय 6426 रूपये है, तो मासिक व्यय 6736 रूपये – औसत आय से 5% ज्यादा. लेकिन इन 75% खेतिहरों के लिए आय और व्यय का अंतर 25% से भी ज्यादा है.

इसीलिए औसत भारतीय किसान ऋणग्रस्त है और एनएसएसओ के सर्वे के अनुसार देश के 46% किसानों पर औसतन 47000 रुपयों का ऋण चढ़ा हुआ है. अधिकांश कर्ज ‘महाजनी’ है, क्योंकि बैंकों का कर्जा तो उद्योगपतियों को मिलता है, गरीब खेतिहरों को नहीं. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि उद्योगों को बैंक कृषि की तुलना में तीन गुना ज्यादा कर्ज दे रहे हैं. कृषि ऋण भी गरीब किसानों को नहीं, बल्कि कृषि से संबंधित गतिविधियों के लिए ग्रामीण धनिकों के हिस्से ही पहुंचता है.

यही करण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्राष्ट्रीय खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, भारत में हर रोज 2052 किसान खेती छोड़ रहे हैं और हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या कर रहा है.

एनएसएसओ के ही अनुसार, वर्ष 2014 में 5650 किसानों ने आत्महत्या की थी, जो मोदी राज में बढ़कर डेढ़ गुना हो गई है. निश्चित ही, नोटबंदी कृषि बर्बादी की इस प्रक्रिया को और तेज करेगी. इसका समुचित आंकलन करने के लिए एक वर्ष और इंतज़ार करना पड़ेगा.

तो नोटबंदी से खेती-किसानी को नुकसान पहुंचने का मुआवजा किसानों को मिलना ही चाहिए. एक तात्कालिक कदम तो यही हो सकता है कि उन पर चढ़े फसल ऋण के 60000 करोड़ रूपये तत्काल माफ़ किये जाएं.

यह हमारी कुल जीडीपी का 0.5% ही है और बैंकों के एनपीए और धनकुबेरों को हर वर्ष दी जा रही 6 लाख करोड़ रुपयों के कर-प्रोत्साहन की तुलना में तो ‘नगण्य’ ही है. उन्हें ‘महाजनी ऋण’ से मुक्त करने के लिए भी क़ानून बनाए जाने चाहिए. यह ऋण माफ़ी न केवल किसानों को राहत देगी, समूची कृषि के लिए भी ‘उत्प्रेरण’ का काम करेगी.

दूसरा तात्कालिक काम मनरेगा के जरिये ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का होना चाहिए. नोटबंदी के कारण शहरों में रोजगार ख़त्म हुए हैं और गांवों में कामगार वापस लौटे हैं. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा है और अकेला कृषि क्षेत्र इस बोझ को वहन नहीं कर सकता. इससे कृषि मजदूरों की दैनिक मजदूरी और आय में भयंकर गिरावट आएगी. इसे रोकने के लिए मनरेगा ही सहारा है.

नवम्बर के पहले सप्ताह में जहां 30 लाख लोग मनरेगा में काम मांग रहे थे, दो माह बाद जनवरी के पहले सप्ताह में इनकी संख्या बढ़कर 83 लाख हो गई. लेकिन दिक्कत यह है कि नोटबंदी का रोजगार गारंटी पर भी असर पड़ा है और नवम्बर माह में ही इसमें 55% की गिरावट दर्ज की गई है. काम मांगने वालों की संख्या बढ़ी, लेकिन रोजगार उपलब्धता में ही गिरावट आई. पूरे देश में आधे मजदूरों को देरी से भुगतान हो रहा है – और कुछ मामलों में तो दो वर्ष से मजदूरी भुगतान लंबित है. इसलिए ग्रामीण क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना होगा और सभी इच्छुकों को काम देकर सही समय पर भुगतान करना होगा, वरना भयंकर अफरा-तफरी और अराजकता का सामना सरकार को करना होगा.

नोट बंदी के बाद बैंकों को जो आय हुई है, उससे इन दोनों कामों को आसानी से अंजाम दिया जा सकता है.

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी ने नोटबंदी के बाद देश की अर्थव्यवस्था को 50 दिनों में 1.28 लाख करोड़ रुपयों का नुकसान होने क अनुमान लगाया है.

लेकिन इस अनुमान में कृषि व्यवस्था को होने वाले नुकसान की गणना शामिल नहीं है. चूंकि यह कृषि संकट लंबे समय तक जारी रहेग, संभावित नुकसन भी काफी बड़ा होगा. लेकिन इस नुकसान की समुचित गणना के लिए अभी एक लंबे समय तक इंतजार करना होगा.

  

 

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