इंसानी जीवन इतना सस्ता कि गरीब मजदूर की मौत होती है तो कहीं कोई गुस्सा नहीं दिखता

​​​​​​​संकट में मजदूर : ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर मजदूरों की सुरक्षा को नजरंदाज किया जा रहा है...

संकट में मजदूर : ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर मजदूरों की सुरक्षा को नजरंदाज किया जा रहा है

इंसानी जीवन सस्ता है. इतना सस्ता कि जब किसी गरीब मजदूर की मौत होती है तो कहीं कोई गुस्सा नहीं दिखता. मीडिया में गुस्सा कई दूसरे मौकों पर दिखती है लेकिन कभी भी लाचार लोगों के मामलों में यह गुस्सा नहीं दिखता. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार की एक बिजली कंपनी में हुई दुर्घटना में 32 मजदूरों की मौत और 100 मजदूरों के घायल होने पर गुस्सा नहीं दिखा. राज्य सरकार ने मुआवजे की घोषणा कर दी. जांच के आदेश जारी कर दिए गए और मामला एक तरह से खत्म हो गया. 1 नवंबर को नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन यानी एनटीपीसी की रायबरेली की इकाईं में हुई इस दुर्घटना ने मजदूरों की सुरक्षा और श्रम कानूनों के उल्लंघन को उजागर किया है.

वास्तव में क्या हुआ, यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा लेकिन कुछ तथ्य सामने आए हैं. छठी इकाईं में जो नया ब्वाॅयलर लगा था उसे मरम्मत के लिए बंद किया जाना था. इसके बावजूद इसे चलाया जा रहा था. मजदूरों से कहा गया कि वे बगैर मशीनी मदद के राख निकालें जो ब्वॉयलर के खराब होने से जमा हो गया था. जब ब्वाॅयलर में दबाव बढ़ा तो विस्फोट हुआ. उस वक्त 300 मजदूर काम कर रहे थे. अगर सुरक्षा के जरूरी उपाय किए गए होते तो इस दुर्घटना को टाला जा सकता था.

हमें यह याद रखना चाहिए कि यह दुर्घटना किसी ऐसी कंपनी में नहीं हुआ जो नियमन के दायरे से बाहर हो. यह भारत की सबसे बड़ी बिजली कंपनी एनटीपीसी की इकाई थी. एनटीपीसी देश भर में 48 बिजली घर चलाती है. हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यहां ज्यादातर ठेका मजदूर थे. इन्हें ठेकेदार यहां काम पर लेकर आए थे. यह मॉडल अधिकांश औद्योगिक समूहों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे नियोक्ताओं को यह सुविधा रहती है कि उनका खर्च कम हो जाता है और श्रम कानूनों के पालन से बच जाते हैं. इन मजदूरों का कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं होता. जब कोई दुर्घटना होती है तो ये खामियां सामने आती हैं.

यह संभव है कि जहां सभी मानकों का पालन किया जाए वहां भी दुर्घटना हो जाए. लेकिन अगर समय से मरम्मत का काम हो तो इनसे बचाव किया जा सकता है और इन्हें कम किया जा सकता है. भोपाल में 2 दिसंबर, 1984 को यूनियन कार्बाइड कारखाने में गैस लीक होने से जो त्रासदी हुई थी उसकी वजह भी यही थी कि समय से मरम्मत का काम नहीं किया गया था. उस दुर्घटना के बाद मजदूरों की सुरक्षा को लेकर कानूनों को मजबूत किया गया था.

आजकल ईज ऑफ डूइंग बिजनेस यानी कारोबार का माहौल आसान बनाने के नाम पर नरेंद्र मोदी सरकार ने जो पहल शुरू की है उसमें कई राज्यों ने श्रम कानूनों को लचर बनाने की शुरुआत की है. 2014 के बाद श्रम कानूनों में कई संशोधन प्रस्तावित हैं. इंडियन ब्वॉयलर रेगुलेशन, 1950 में भी संशोधन करके निरीक्षण की जगह स्वप्रमाणन का प्रावधान कर दिया गया है. इसके पीछे तर्क दिया जात है कि इंस्पेक्टर राज खत्म होना चाहिए. लेकिन सच यह है कि कोई भी ऐसी कोशिश नहीं दिख रही जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सुरक्षा मानकों के साथ कोई समझौता नहीं हो.

ठेका मजदूरी को जिस कानून के तहत नियमित किया जाता है, उसे भी लचर बनाने का प्रस्ताव है ताकि ऐसे मजदूरों का इस्तेमाल अधिक जोखिम वाले कामों में भी किया जा सके. जैसा एनटीपीसी की इस इकाईं में हो रहा था. मौजूदा नियमों के तहत एनटीपीसी को सभी मजदूरों स्थायी और ठेका वालों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. एशियाड मामले में सर्वोच्च अदालत ने भारत सरकार को प्रमुख नियोक्ता मानते हुए ऐसे मजदूरों के लिए उसकी जवाबदेही तय की थी. हमें यह भी समझना होगा कि सरकार द्वारा मुआवजा दे देने से मजदूरों के प्रति एनटीपीसी की जिम्मेदारी नहीं खत्म हो जाती. दुर्भाग्य से ठेका मजदूरों से संबंधित कानून में प्रस्तावित संशोधन अगर पारित हो जाते हैं तो इससे इनकी हालत और खराब होगी.

इस सरकार ने श्रम निरीक्षण को कम करने के लिए नियमों में बदलाव किए हैं. यह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के समझौते के अनुच्छेद-81 का उल्लंधन है. भारत ने भी इस पर दस्तखत किए हैं. सरकार ने श्रम सुविधा पोर्टल के तहत स्वप्रमाणन की सुविधा 16 केंद्रीय श्रम कानूनों के लिए नियोक्ताओं को दे दी है. पर्यावरणीय कानूनों के बारे में यह साबित हो चुका है कि स्वप्रमाणन की व्यवस्था फर्जी साबित हुई है. फिर श्रम कानूनों में यह व्यवस्था प्रभावी साबित होगी, इसकी क्या गारंटी है. मेक इन इंडिया और निवेश प्रोत्साहित करने के नाम पर सरकार मजदूरों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की अनदेखी कर रही है. खास तौर पर ठेका पर काम करने वाले मजदूरों का. एनटीपीसी में हुई दुर्घटना उन खतरों का संकेत दे रही है.

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली 

(Economic and Political Weekly, )

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