धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सीमाएं संघ परिवार तय करता है जिसे लांघकर कोई भी दल आत्महत्या नहीं करना चाहता

जब हम अलवर के पहलू खान की लाश के पास खड़े होकर देखते हैं तो पूरा भारत गुजरात में तब्दील हो चुका दिखता है जिसका श्रेय सिर्फ संघ परिवार और भाजपा को नहीं दिया जा सकता और इसीलिए ये ज्यादा खतरनाक है...

साम्प्रदायिकता ही तय करती है धर्मपिरपेक्षता की सीमा

कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सीमाएं संघ परिवार तय करता है जिसे लांघकर कोई भी दल राजनीतिक आत्महत्या नहीं करना चाहता

शाहनवाज आलम

मुसलमानों पर बढ़ती हिंसा की अन्य घटनाओं की तरह ही अलवर में डेयरी मालिक पहलू खान की स्वघोषित गौरक्षकों द्वारा हत्या के बाद एक बार फिर मुसलमानों की दहशतजदा जिंदगी, धर्मनिरपेक्षता का भविष्य और संघ परिवार की हिंसक प्रवृत्ति बहसों के केंद्र में है। इन बहसों में उठने वाली आवाजों को अगर वर्गीकृत किया जाए तो बहुत आसानी से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि इस बहस में हमलावर संघ परिवार और निरीह मुद्रा में खड़े मुसलमानों के अलावा कोई तीसरा पक्ष नहीं है। 

मसलन, अलवर में पहलू खान की हत्या के बाद कटघरे में खड़े संघ परिवार के मुखिया मोहन भागवत ने दो अहम बयान दिए। पहले में उन्होंने कहा कि पूरे देश में एक जैसा गौ हत्या विरोधी कानून बनना चाहिए। वहीं दूसरे बयान में उन्होंने कहा कि गौरक्षा के नाम पर हिंसा स्वीकार्य नहीं है। जहां पहले बयान पर विपक्ष यह कह सकने का साहस नहीं दिखा पाया कि पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण भारत और गोवा में गोमांस खाने का प्रचलन है, इसलिए ऐसा कोई भी कानून अखिल भारतीय स्तर पर बनाने की सोचना भी अव्यवहारिक और लोगों के अपने पसंद का खाना खाने के अधिकार पर हमला है। वहीं वह उनके दूसरे बयान पर भी यह सवाल नहीं उठा पाया कि उनके श्रीमुख से ऐसा बयान मजाक लगता है।

इस तरह संघ परिवार ने इस घटना का इस्तेमाल एक तरफ पूरे देश में अलवर जैसी घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करने के साथ ही ऐसी हत्याओं को संघ के अनुकूल कानून नहीं होने के कारण उत्पन्न हुई स्थितियों का परिणाम मानने की धमकी भरी नसीहत भी दे दी। इसके अलावा उसने अपने विरोधियों से ज्यादा कानून के रक्षक के बतौर अपने को पेश भी कर दिया।  

वहीं अगर हम दूसरी तरफ विपक्षी दलों को देखें तो उन्होंने सिर्फ घटना की निंदा की। किसी भी पार्टी के बड़े नेता ने पहलू खान के घर जाने की हिम्मत नहीं दिखाई। यहां हम किसी नेता पर पहलू खान के घर जाने की जहमत उठाने से भागने का आरोप नहीं लगा सकते क्योंकि वे किसी भी दलित के घर जाते, रूकते और खाते-पीते दिखते रहते हैं। लिहाजा उतनी ही जहमत वे पहलू खान के घर जाकर भी उठा सकने में सक्षम तो माने ही जा सकते हैं। लेकिन बावजूद इसके वे वहां नहीं गए तो सवाल उनके जहमत या कष्ट उठाने की क्षमता का नहीं बल्कि उनमें ऐसा करने की हिम्मत न होने का है।

यानी यह मामला चिंता या अकर्मण्यता से ज्यादा साहस का है।

लेकिन यह कोई पहली बार नहीं हुआ है बल्कि साम्प्रदायिक हिंसा के पीड़ित मुसलमानों के साथ खड़े होने की हिम्मत की कमी अब हमारे लोकतंत्र की सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है। इसीलिए कोई बड़ा नेता किसी अखलाक या झारखंड में मार कर पेड़ पर टांग दिए गए मुसलमानों के घर नहीं जाता।

जाहिर है ऐसा इसलिए है कि जैसे ही कोई नेता किसी मुसलमान पीड़ित के घर जाएगा, उसे हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त घोषित कर दिया जाएगा। उस पर मुसलमानों के तुष्टिकरण का आरोप लग जाएगा और सबसे अहम कि जनता के निणार्यक हिस्से में उसे सच मान लिया जाएगा।

इस तरह हम कह सकते है कि हमारी कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सीमाएं संघ परिवार तय करता है जिसे लांघकर कोई भी दल राजनीतिक आत्महत्या नहीं करना चाहता। यहां हम सच्चर कमेटी के इस निष्कर्ष को थोड़ा सन्शोधन के साथ रख सकते हैं- विपक्ष के लिए मुसलमानों की हैसियत दलितों से भी बदतर है।

इस तरह अलवर जैसी किसी भी घटना के बाद मुसलमानों के पास सिवाए संवैधानिक और प्रशासनिक अमले की तरफ देखने के कोई और विकल्प नहीं बचता। लेकिन यहां भी उसे अपने प्रति साम्प्रदायिक नफरत और हमलावरों के प्रति खुली पक्षधरता मिलती है। मसलन, जिस न्यायालय को वह अपने हितों का आखिरी मुहाफिज मानता है, वो पर्यावरण और किसी दुर्लभ वन्य जीव के खतरे में पड़ने की अखबारी रिपोर्ट पर तो स्वतः संज्ञान ले लेता है, लेकिन अलवर या झारखंड जैसी घटनाओं पर स्वतः संज्ञान नहीं ले पाता। उसे संविधान की सबसे अहम बुनियाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ के तेजी से विलुप्त होने पर कोई गम्भीर चिंता नहीं होती। ऐसे में जब कुछ सामाजिक संगठन या व्यक्ति अदालत में याचिका लगाते हैं तब वह कोई नोटिस भेज पाता है। वहीं बाबरी मस्जिद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि मामले को कोर्ट के बाहर समझौते से निपटाया जाए, भी न्यायतंत्र के प्रति उसे सशंकित करता है कि सर्वोच्च अदालत कैसे अपने संवैधानिक दायित्व से सिर्फ पीछे नहीं हट रही है बल्कि अपने न्याय करने के अधिकार को ही बहुसंख्यकवाद के हवाले करने का स्वयं रास्ता भी प्रशस्त कर रही है।

दूसरी तरफ प्रशासनिक स्तर पर पुलिस का रवैया जो पहले से ही मुस्लिम विरोधी रहा है, उसे और अलगाव में डाल देता है। जहां किसी भी पहलू खान को इंसाफ मिल पाने की उम्मीद इससे भी खत्म हो जाती है कि हमलावरों की तरफ से स्थानीय स्तर पर गांव और मोहल्लों के लोग बेगुनाहों को फंसाने का आरोप लगाते हुए पुलिस पर आरोपियों को छोड़ने या केस कमजोर करने का दबाव बनाने लगते हैं। जो कि गुनहगारों को बचाने की एक परखी हुई और सफल रणनीति बनती जा रही है। जिसे बहुत आसानी से दोषियों के पक्ष में मुजफ्फरनगर से लेकर अखलाक और अब अलवर तक में इस्तेमाल किया जाता हुआ देखा जा सकता है।

यानी सामूहिक तौर पर मुसलमानों पर होने वाले हमले हों या व्यक्तिग तौर पर, दोषी को सजा हो पाएगी, इसकी उम्मीद अब शायद ही किसी मुसलमान में रह गई हो।

आप कह सकते हैं कि मुसलमानों को देश के न्यायतंत्र पर भरोसा नहीं रह गया है। यह सच है।

इस तरह हर अलवर के बाद, मुसलमानों के समक्ष संघ परिवार और दैत्यकाय, विपक्ष पूरी तरह परिदृष्य से गायब और संवैधानिक संस्थाएं भीतरघात करने वाली साबित होती जाती हैं।

इस तरह ऐसी हर घटना के बाद मुसलमान पहले से कम ‘नागरिक’ होता जाता है। यानी हर ऐसी घटना से सत्ता पक्ष लोकतंत्र को बहुसंख्यकवाद में तब्दील कर दे रहा है और विपक्ष अल्पसंख्यकों से दूरी बढ़ा कर उसे उसके हाल पर छोड़ दे रहा है।

इस तरह विपक्ष सत्ता पक्ष का ही एजेंडा बढ़ा रहा है। जिसके कारण मुसलमान तेजी से नॉन स्टेट प्लेयर्स जैसे स्वयं सेवी संस्थाओं की तरफ देखने को अभिशप्त होता जा रहा है।

इस तरह मुसलमानों पर हमले तो राजनीतिक तत्वों द्वारा हो रहे हैं लेकिन अपना बचाव वह गैर राजनीतिक तत्वों के भरोसे छोड़ने को मजबूर होता जा रहा है।

यह स्थिति मुसलमानों को एक ऐसे दुष्चक्र में डालती जाती है जिसमें वो पिछले जख्मों को सहलाते हुए भविष्य में होने वाले हमलों का इंतजार करने के सिवा और कुछ भी नहीं कर पाता।

याद रखिए यही वह समय भी होता है जब वह किसी गैरराजनीतिक एनजीओ कार्यकर्ता या धार्मिक-सामाजिक तंजीम को अपना नेता मानने लगता है, जबकि उसी दरम्यान उसकी ही आर्थिक-सामाजिक हैसियत वाली दूसरी जमातें अपने अंदर से सामाजिक न्याय और अधिकारों के लिए राजनीतिक नेतृत्व भी पैदा कर रही होती हैं

कहने का मतलब यह कि मुसलमानों के साथ खड़ा न होकर विपक्ष सिर्फ किसी समुदाय या व्यक्ति को अलगाव में नहीं डाल रहा है बल्कि लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है, उसके नागरिक समूहों के बीच दो विरोधी और विपरीत तरह की गतिशीलता को बढ़ावा दे रहा है। सबसे अहम कि इससे बहुदलिय लोकतंत्र की वह विशेषता ही खत्म होती जा रही है जिसमें विभिन्न दलों के बीच विचारधारात्मक और सैद्धांतिक अंतर होता है।

आर्थिक उदारीकरण के बाद जब राजनीतिक दलों में आर्थिक मुद्दों पर कोई भी उल्लेखनीय अंतर नहीं रह गया हो तब मुसलमानों के साथ खड़े होने और उनके खिलाफ खड़े होने की घोषणाएं ही तो वह एकमात्र विभाजक बिंदु रह गई हैं जो दलों को मोटे तौर पर एक दूसरे से अलग दिखाती हैं। अब अगर यह विभाजन भी खत्म हो जाए और विपक्षी राजनीति भी सत्ता पक्ष की तरह मुसलमानों के खिलाफ खड़ी हो जाए तो कम से कम सैद्धांतिक तौर पर तो इसे अपने बहुदलीय लोकतंत्र के एकदलीय व्यवस्था में रूपांतरित होना ही माना जाएगा।

इसीलिए जब अलवर जैसी किसी घटना पर मुसलमान कहता है कि उसे किसी भी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं है, तब वह हमारे बहुदलीय लोकतंत्र को एक एकदलीय अधिनायकतंत्र में तब्दील होने की घोषणा कर रहा होता है। जिसे हमारा विपक्ष और एक बड़ी निर्णायक आबादी इसलिए अनसुना कर देना चाहती है क्योंकि इसे मुसलमान घोषित कर रहा है और सच्चाई तो यह भी है कि हमारा विपक्ष और जनमत का एक बड़ा हिस्सा मुसलमानों के लिए वास्तव में एक अधिनायकतंत्र ही चाहता है।

इसीलिए यहां विपक्ष से सवाल तो बनता है कि किसी मुकुल सिन्हा या तीस्ता सीतलवाड़ को क्यों सत्ताधरी दल की राजनीतिक हिंसा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है, विपक्षी दल खुद क्यों नहीं इन्हें अदालत में लड़ते? जबकि संघ और भाजपा तो अपने आदर्शों में यकीन रखने वाले कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए खुलेआम लीगल सेल बनाती है।

इस सवाल को ऐसे भी पूछा जा सकता है कि क्या विपक्ष कानूनी लड़ाई को राजनीतिक लड़ाई से अलग मानता है? और अगर ऐसा है तो क्या उसकी इस समझ को भारतीय लोकतंत्र के लिए उचित और परिपक्व माना जाना चाहिए? यह सवाल तब और अहम हो जाता है जब हम जान रहे होते हैं कि हम जिस लोकतंत्र पर गर्व करते हैं उसे पाने के संघर्ष में हमारे तमाम बड़े नेताओं ने अदालतों में भी राजनीतिक लड़ाईयां लड़ी हैं।

वहीं यह भी एक सच्चाई है कि पूरी दुनिया में न्यायपालिका का गठन ही इसलिए हुआ कि उससे पहले कमजोर और दमित तबकों को न्याय नहीं मिलता था। यानी पीड़ित के लिए राजनीतिक मंच के अलावा न्यायपालिका में भी उसकी लड़ाई लड़ना किसी भी ईमानदार विपक्ष की उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।

दूसरे शब्दों में जिस मतदाता वर्ग की लड़ाई विपक्ष चुनाव में लड़ने का दावा करता है उसे कानूनी संघर्ष में वो अकेले कैसे छोड़ सकता है? लेकिन क्या हम इन मानकों पर विपक्ष से खरा उतरने की उम्मीद भी कर सकते हैं?

दरअसल, साम्प्रदयिकता के जिस गुजरात मॉडल की बात होती है वह यही है। और इससे जो निष्कर्ष निकलता है वह ये कि गुजरात जैसे साम्प्रदायिक प्रयोगशाला सिर्फ अल्पसंख्यकों के जनसंहारों से नहीं बनते। वह बनते हैं विपक्षी दलों में अल्पसंख्यकों से साथ खड़े होने के साहस के क्षरण से, न्यायपालिका और कार्यपालिका के विपक्ष की निगरानी से मुक्त हो जाने से और एनजीओ के एकमात्र उम्मीद बनने से।

इसीलिए जब हम अलवर के पहलू खान की लाश के पास खड़े होकर देखते हैं तो पूरा भारत गुजरात में तब्दील हो चुका दिखता है। निश्चित तौर पर जिसका श्रेय सिर्फ संघ परिवार और भाजपा को नहीं दिया जा सकता और इसीलिए ये ज्यादा खतरनाक है।

(शाहनवाज आलम, स्वतंत्र लेखक, डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार)

 

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