पर आपको तो हिन्दू राष्ट्र चाहिए, श्मशान-कब्रिस्तान चाहिए

जो समाज का उच्च तबका है उसे सोचना होगा कि पंडित प्रिंस तिवारी जैसों का जो हत्यारा जेहन किसी रागिनी दुबे की निर्मम हत्या करता है, आखिर उसमें इतनी नफ़रत कहाँ से आई?...

अतिथि लेखक

 

राजीव यादव

हिंदू राष्ट्र में आपकी गहरी दिलचस्पी है. है न...

अगर नहीं तो जो भीड़ 'देखो-देखो कौन आया हिन्दू राष्ट्र का शेर आया' का नारा लगाती है वो 'देखो-देखो कौन आया हमारे बच्चों का हत्यारा आया' कहते हुए इस ढोंगी के चेहरे से नकाब उतार देती.

पर नहीं आपको हिन्दू राष्ट्र चाहिए, श्मशान-कब्रिस्तान चाहिए. आपको क्या मतलब कि मेरठ में कक्षा दो की बच्ची के साथ गैंग रेप होता है. आपको तो मतलब है लवजेहाद से!

आप कहते हो कि वो संत है महंत है. जब वही योगी गोरखपुर में एक नई परम्परा की बात करते हुए एक के बदले दस को मारो और एक हिन्दू लड़की के बदले सौ मुस्लिम लड़कियों को उठाने की बात करता हो और एक नई जाति का निर्माण की बात करता हो तो आप कहते हो जय योगी जी महाराज. क्योंकि आपको उन मासूमों से कोई मतलब नहीं जो आक्सीजन की कमी से मर गए.

आप कहोगे कि मालूम नहीं था. रोज उन्हीं अखबारों में सिंगल कालम की खबर में रोज मर रहे बच्चों की सूचना होती है. आप उन्हीं अखबारों को पढ़कर उस कातिल भीड़ का हिस्सा तो बन जाते हो पर अपने बच्चों के उसी कातिल के खिलाफ नहीं खड़े होते. दरअसल आपको भी उसने हिन्दू राष्ट्र के खून का स्वाद चखा दिया है.

आपको पता है बलिया की बेटी रागिनी का हत्यारोपी पंडित प्रिंस तिवारी कौन है?

राजीव यादव
राजीव यादव. लेखक स्वतंत्र पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता, ऑपरेशन अक्षरधाम के लेखक व राज्य प्रायोजित आतंकवाद के विशेषज्ञ हैं.

ये वही प्रिंस तिवारी है जिसे कट्टर हिंदू होने पर गर्व है और उसके बाप को भी और उसके हर उकसावे के पोस्ट को आप जैसे सैकड़ों लोग लाइक करते हो. जब संत आता है तो संस्कृति बदल जाती है... आज पूरे देश मे योगी योगी छाया है. जिस धर्म युद्ध की बात योगी करते हैं उसके लिए उसने हथियार रखे थे और फ़ेसबुक पर ऐलान करते हुए लिखा था कि हम वो भगवा शेर हैं जिसका शिकार करते हैं उसका जिस्म तो क्या रूह भी दम तोड़ देती है. और एक दिन उसकी शिकार हुई रागिनी जिसकी उसने निर्मम हत्या की. क्यों कि शेर तो निर्मम ही होता है न. और

जब संत आता है तो संस्कृति तो बदल ही जाती है...

कभी विधानसभा, तो कभी ट्रेन, तो कभी किसी संघी के यहाँ बम की अफवाह के नाम पूरे मुल्क में दहशत का माहौल कायम कर भीड़ को उकसाया जा रहा है एक समुदाय विशेष के खिलाफ. मुस्लिम लड़कों के रेडिक्लाइजेशन की बात करने वाली ख़ुफ़िया-सुरक्षा एजेंसियों को और उनको सुधारने का दावा कर फर्जी केसों में फसाने वाले एटीएस अधिकारी असीम अरुण को ये सैफरन टेररिस्ट नहीं दिखते? दिखते हैं पर ये तो हिन्दू राष्ट्र के शेर हैं. जिनका जन्म नहीं अवतार हुआ है और इनका बाल बांका करने की किसकी हिम्मत क्योंकि इनके सरदार के सब चाकर हैं.

ये सब घटनाएं एक दूसरे से जुड़ी हैं. क्यों कि इसके मूल में मूल सवाल से भटकना है. अगर मुगलसराय का नाम दीन दयाल रखने से उन बच्चों को आक्सीजन मिल जाती तो जनाब आप रख लीजिए. इनकी बम की अफवाह, गोमांस की, वंदेमातरम की फर्जी राजनीत के बंद हुए बिना कुछ नहीं होगा.

क्योंकि उन्हें आपकी जेहनियत पर भरोसा है. घटनाओं का क्या रोज होती हैं. वे जानते हैं की आपको चंडीगढ़ की वर्णिका कुंडू हो या फिर बलिया की रागिनी हो या फिर आक्सीजन की कमी से मरते बच्चों की बिलखती माताएं, याद नहीं रह जाएंगी. अखलाक, पहलू, जुनैद की बात ही छोड़िए. क्योंकि की जिस हिंदू राष्ट्र की चासनी में आप हो वहां ये सब प्रकृति का नियम बताया जाता है.

पर एक बात आपको याद रह जाएगी. मुसलमान गाय खाते हैं. है न...

गाय आपकी माता है. ठीक बात है पर जो मासूम बच्चों की माताएं हैं, उनका क्या?

जो समाज का उच्च तबका है उसे सोचना होगा कि पंडित प्रिंस तिवारी जैसों का जो हत्यारा जेहन किसी रागिनी दुबे की निर्मम हत्या करता है, आखिर उसमें इतनी नफ़रत कहाँ से आई?

 जो बराबरी-भागीदारी के सवाल पर सताए गए हैं, उन्हें केशव प्रसाद मौर्या जैसे बजरंगियों से नहीं उन ओमप्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्या जैसों से पूछना होगा, यही है भागीदारी? जिसमें हमारे मासूम बच्चों को मौत में भागीदारी मिल रही है.

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