खेती पर बमबारी जारी : पूंजीवादी शासन सबसे पहले मनुष्यता की बलि लेता है

27 सितम्बर 2017 को प्रकाशित इस असाधारण गजट में केंद्रीय मोटर यान अधिनियम 1989 में, नियम 2 के उपनियम (ख) में "कृषि ट्रेक्टर एक परिवहनेत्तर वाहन है" को विलोपित करने की सूचना दी है...

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हाइलाइट्स

मुनाफे की पोर पोर गन्दगी और खून में लिथड़ी हुयी होती है - छप्परफाड़ मुनाफे का ग्राफ हमेशा भात के लिए तरसते हुए दम तोड़ गयी संतोषियों की देहों की सीढ़ी बनाकर ऊपर की ओर चढ़ता है। यह अतिश्योक्ति नहीं है - भारत का ताजा इतिहास इसकी पुष्टि के लिए मौजूद है। मगर क्या हुक्मरानो की इसकी परवाह है ? नहीं

बादल सरोज

अमूमन होता यह है कि जनता का जो तबका मुश्किल में आता है सरकार उसकी मुश्किलों को कम करने के रास्ते तलाशती है। कुछ अपना - जो असल में उसका नहीं, जनता का ही है - खजाना खोलती है तो कुछ उसकी जेब का बोझ कम करने के कदम उठाती है। मगर यह साधारण राजधर्म है - असाधारण लोग जब असामान्य तरीके से सत्ता में जा बैठते हैं तो इस तरह के स्वाभाविक काम करना अपनी तौहीन समझते हैं - उनका फलसफा शायद "मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझपै कि आसां हो गयीं।" होता है, बस इसमें मुझ की जगह तुझ पर पढ़ने की आदत डाल लीजिये और मान लीजिये कि आप में मौजूदा निज़ाम के हुक्मरान बनने की काबलियत नंबर एक आ गयी।

कुछ ऐसा ही उदाहरण पेश किया है भारत सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने और कृषि कार्य में इस्तेमाल किये जाने वाले ट्रैक्टर्स (एग्रीकल्चर ट्रैक्टर्स) को उसने परिवहन वाहन (ट्रांसपोर्ट व्हीकल्स) करार देने की मंशा बाकायदा गजट में छापकर जाहिर का दी है। 27 सितम्बर 2017 को प्रकाशित इस असाधारण गजट में केंद्रीय मोटर यान अधिनियम 1989 में, नियम 2 के उपनियम (ख) में "कृषि ट्रेक्टर एक परिवहनेत्तर वाहन है" को विलोपित करने की सूचना दी है। 30 दिन में इस पर आपत्तियां मंगाई गयीं है - उनके आने के बाद बस एक सील-मुहर और, और आया ट्रेक्टर सड़क पर।

हाल के दौर में भारत की खेती और किसानी के संकट अलग अलग तरीके से नुमायां हुए हैं। हर आधा घंटे में एक की दर से देश भर में किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं ने इसका अमानवीय त्रासद पहलू सामने लाया है। पिछली 12 वर्षों में आत्महत्या करने वाले किसानों की तादाद साढ़े तीन लाख की संख्या लांघ चुकी है। तो इधर मंदसौर से राजस्थान होते हुए महाराष्ट्र में लाखों किसानों की हड़तालों-आंदोलनों और उनमे लाखों की भागीदारी के जरिये मौजूदा हालात के प्रति विक्षोभ और आक्रोश का प्रदर्शन हुआ है। अब भारतीय किसानों की दुर्दशा समझने के लिए किसी का अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं बचा। एक सामान्य नागरिक भी खेती की लागत और किसानी की आमदनी के बीच बढ़ती गहरी होती हुयी खाई का अंदाज लगा सकता है।

बाादल सरोज, लेखक माकपा की मध्य प्रदेश इकाई के सचिव हैं।

सूखा या प्राकृतिक आपदा ही किसानों की आत्महत्या का एकमात्र कारण नहीं है। बम्पर फसल भी आत्महत्या के लिए मजबूर करने की आशंकाओं से भरी हुयी होती है। जैसे इस मई के महीने में प्याज की लागत थी 10 रुपया प्रति किलो, मगर किसान को दाम मिल रहे थे 2 से 3 रुपया प्रति किलो। किसान को लागत से डेढ़ गुना कीमत देने की राष्ट्रीय किसान आयोग ( आम पहचान में स्वामीनाथन आयोग) की सिफारिशों को आये दस साल हो गए मगर किसी सरकार के अजेंडे पर वे नहीं आईं। नतीजे में 1991 से लेकर अब तक कोई 2 करोड़ किसान खेती छोड़कर जा चुके हैं।

ज्यादा विस्तार में जाए बिना संक्षेप में सिर्फ इतना कि यह वह समय है जब खेती और किसानी दोनों को सार्वजनिक निवेश और मदद की जरूरत है। यह समय है जब उपज के लाभकारी दाम देने के साथ लागत घटाने की नीतियां लाई जानी चाहिए- प्रावधान किये जाने चाहिए। मगर सरकार इसका ठीक उलट कर रही है। भारतीय कृषि की समस्याओं को गिनाते हुए स्वामीनाथन आयोग ने कहा था कि "मशीनीकरण और आधुनिक यंत्रों के उपयोग की कमी" कृषि के अलाभकारी होने का एक प्रमुख कारण है। ट्रेक्टर खेती का एक जरूरी उपकरण है - जुताई और बाकी कामों के अलावा शेष अन्य कृषि उपकरणों का आधार भी ट्रेक्टर ही है। इसे परिवहन वाहन में बदल देने का सीधा अर्थ होगा ; ट्रेक्टर खरीदी में सेल्स टैक्स इत्यादि सहित कीमतों में 30 से 40 हजार रूपये की वृध्दि, रजिस्ट्रेशन शुल्क व्यावसायिक वाहनों की दर से - कोई 30 हजार की वृध्दि, हर साल रोड टैक्स से लेकर बकाया भुगतानों का नियमित खर्चा , फिटनेस से लेकर टाइम लिमिट तक के झंझटों का चक्रव्यूह शुरू , और ट्रैफिक के चालान और दीवान जी की निगाहे-करम अलग से !!

इस तरह के फैसले तुगलकी नहीं हैं। इनके पीछे एक ख़ास समझदारी है - खेती से किसान को धकेल बाहर कर उसमे भी कारपोरेट कंपनियों का साम्राज्य स्थापित करना। कहीं उनका यह मंसूबा कामयाब हो गया तो पक्का मानियेगा, इस देश की धरती सोना , हीरे, मोती तो उगलेगी ही उसके साथ विराट अकाल और दुर्भिक्ष भी उगलेगी। मुनाफे की पोर पोर गन्दगी और खून में लिथड़ी हुयी होती है - छप्परफाड़ मुनाफे का ग्राफ हमेशा भात के लिए तरसते हुए दम तोड़ गयी संतोषियों की देहों की सीढ़ी बनाकर ऊपर की ओर चढ़ता है। यह अतिश्योक्ति नहीं है - भारत का ताजा इतिहास इसकी पुष्टि के लिए मौजूद है। मगर क्या हुक्मरानो की इसकी परवाह है ? नहीं - प्रो. श्याम बौहरे Shyam Bohare के शब्दों में "ह्यूमैनिटी इज द फर्स्ट कैजुअल्टी ऑफ़ द कैपिटलिस्ट गवर्नेंस" पूंजीवादी शासन सबसे पहले मनुष्यता की बलि लेता है।

Humanity is the first casualty of the capitalist governance

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