योगीजी, मुस्लिम काल की निशानी मिटाने लगे तो देश खंडहर बन जाएगा

शहरों का नाम बदलना इतिहास को नकारना है.... हज़ारों करोड़ का बोझ जनता पर डालना कौन सी अकलमंदी है......

अतिथि लेखक
योगीजी, मुस्लिम काल की निशानी मिटाने लगे तो देश खंडहर बन जाएगा

शहरों का नाम बदलना इतिहास को नकारना है

हज़ारों करोड़ का बोझ जनता पर डालना कौन सी अकलमंदी है

उबैद उल्लाह नासिर

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ को नाम बदलने का शौक़ शुरू से ही रहा है। सब से पहले उन्होंने खुद अपना नाम बदला फिर गोरखपुर के उन मोहल्लों के नाम बदले जो उर्दू में थे। ऐतिहासिक उर्दू बाज़ार, हिंदी बाज़ार हो गया। मियां बाज़ार माया बाज़ार हो गया। अलीनगर, हरी नगर हो गया और अब उन्होंने प्रदेश में उर्दू नाम वाले शहरों जिलों, विशेषकर जिनका सम्बन्ध मुग़ल काल से रहा है, उनके नाम बदलने की मुहीम शुरू की है, इसका आगाज़ हुआ मुग़ल सराय रेलवे जंक्शन का नाम बदलने से जिसको जनसंघ के विचारक पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया है। इसका कारण यह बताया जाता है कि यहीं रेलवे ट्रैक पर उनकी लाश मिली थी।

योगी जी ने रेलवे जंक्शन का नाम तो स्व उपाध्याय जी के नाम पर कर दिया लेकिन उनकी मृत्यु या ह्त्या क्यों हुई, किसने कराई, इसकी जांच कराने का कष्ट नहीं किया। लगभग पचास वर्षों से स्व. उपाध्याय जी की मृत्यु एक रहस्य बनी हुई है। तब से देश और प्रदेश में भाजपा सत्ता में रही, लेकिन कभी किसी ने उस रहस्य का पता लगाने की कोशिश क्यों नहीं की। इस सवाल का जवाब भाजपा का कोई नेता नहीं देताI

Changing the name of cities is to negate history

मुग़ल सराय के बाद इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयाग राज कर दिया गया। इस शहर की गलती शायद यह थी कि इसे मुग़ल शहंशाह अकबर ने बसाया था। दूसरी बड़ी गलती संघ परिवार की नज़र में शायद यह है कि यहाँ जवाहर लाल नेहरु पैदा हुए थे और यह शहर स्वंत्रता संग्राम का केंद्र बिंदु था। ज़ाहिर है संघ परिवार के लिए यह दोनों गलतियाँ अक्षम्य हैं। इस लिए इस ऐतिहासिक शहर का नाम इतिहास के पन्नों में गुम कर देना ज़रूरी था और योगी जी ने यह महान कारनामा कर दिखाया। अब कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड कही जाने वाली इलाहबाद यूनिवर्सिटी, प्रयाग राज यूनिवर्सिटी हो जाएगी और ऐतिहासिक इलाहबाद हाई कोर्ट प्रयाग राज हाई कोर्ट हो जाएगा। अकबर इलाहबादी अकबर प्रयागराजी हो जाएँ तो किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए। दुनिया भर में मशहूर इलाहबादी सुर्ख अमरूद प्रयागराजी अमरुद कहे जाएंगे I

इलाहाबाद के बाद फैजाबाद पर मुसीबत

Faizabad in trouble after Allahabad

इलाहाबाद के बाद फैजाबाद का नम्बर आया। अब वह अयोध्या के नाम से जाना जाएगा। पहले अयोध्या फैजाबाद का हिस्सा थी, अब फैजाबाद अयोध्या का हिस्सा हो गया। इसके अलावा आगरा, अलीगढ़, आज़मगढ़, मुरादाबाद आदि उन तमाम शहरों और जिलों का नाम बदलने की भी बात चल रही है, जो उर्दू नाम वाले हैं।

संघ की विचारधारा के अनुसार भारत में मुस्लिम काल के सभी निशानियां मिटाई जानी चाहिएं क्योंकि यह भारत की साझा विरासत का हिस्सा मानी जाती हैं, जबकि संघ साझा विरासत को मानता ही नहीं। उसके विचार से सिर्फ देव मालाई भारतीय संस्कृति ही से भारत की पहचान होनी चाहिए, लेकिन एक हजार वर्ष के मुस्लिम दौर की इतनी निशानियाँ भारत की भूमि पर मौजूद हैं कि यदि उन्हें मिटाने लगें तो भारत खण्डहर बन जाएगा। क्या लाल किला, ताजमहल, क़ुतुबमीनार, लखनऊ के ऐतिहासिक इमामबाड़े, हैदरबाद की चारमीनार आदि को भी बाबरी मस्जिद वाली गति पर पहुंचाया जाएगा? कितने शहरों के नाम बदले जाएंगे और कितनी ऐतिहासिक इमारतों को गिराया जाएगा ?

यही नहीं संघ परिवार इतहास को देश के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत और गलत फहमी पैदा करने के लिए प्रयोग करता रहा है। महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज का मुग़ल बादशाहों से युद्ध को वह हिन्दू मुस्लिम युद्ध बना के पेश करता है, जबकि यह केवल सत्ता संघर्ष था। अगर यह हिन्दू मुस्लिम संघर्ष था तो अकबर की सेना की कमान राजा मानसिंह और महाराणा प्रताप की सेना की कमान हाकिम खान सूरी के हाथ में न होती। इसी प्रकार शिवाजी की सेना में लगभग 30% मुस्लिम सैनिक न होते, न औरंगजेब के कमांडर इन चीफ मिर्ज़ा राजा जय सिंह होते।

औरंगजेब की हुकूमत में सभी मुग़ल शासकों में सब से अधिक हिन्दू अमला था, यह बात इतिहास से क्यों छुपाई जाती है। पंडित बिशम्भर नाथ पाण्डेय ने अपनी पुस्तक में उन तमाम मंदिरों-मठों आदि के नाम लिखे हैं, जिनको औरंगजेब ने लाखों रूपये की माफ़ी और हजारों बीघा ज़मीन दी थी। अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले टीपू सुलतान को भी हिन्दू विरोधी घोषित कर दिया गया है।

पंडित बिशम्भर नाथ पाण्डेय ने उनके बारे में भी विस्तार पूर्वक लिखा है कि कितने मठों को उसने कितना कितना दान दिया था। यहाँ तक वह राम के नाम वाली अंगूठी पहनता था जो उसकी शहादत के बाद उसकी ऊँगली से निकाली गई थीI

दूसरी बात शहरों जिलों आदि के नाम बदलने की एक प्रक्रिया होती है रेलवे डाक आदि विभागों की संस्तुति लेनी होती है। बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यु दर असल यह काम करने के लिए अधिकारिक है, लेकिन यहां तो सत्ता का ऐसा नशा है कि किसी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। बस सीधे अध्यादेश जारी कर दिया गया। इसके खिलाफ अदालत में अपील हो चुकी है जिस पर सरकार को नोटिस जारी किया जा चुका है, लेकिन देश का जो समाजी और सियासी माहौल है उसमें अदालत क्या फैसला कर देगी, यह एक बड़ा सवाल बन चुका है I

नाम बदलने पर एक अनुमान के मुताबिक एक से डेढ़ हज़ार करोड़ तक का खर्च आता है, अर्थात तीन शहरों का नाम बदलने पर लगभग पांच हजार करोड़ का खर्च आ चुका है। सरकारी खजाने पर इतने भारी बोझ का क्या औचित्य है? इस पर भी सवाल उठाया जाना चाहिएI हीन भावना बदला और सत्ता के अहंकार से ग्रस्त संघ परिवार देश को कहाँ ले जा रहा है, यह गहरे विचार विमर्श का विषय बन गया है। इस 21वीं सदी में जब दुनिया चाँद पर कमंद डाल रही है भारत को देवमालाई युग में ले जाने की कोशिश मूर्खता नहीं तो और क्या है I

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

क्या यह ख़बर/ लेख आपको पसंद आया ? कृपया कमेंट बॉक्स में कमेंट भी करें और शेयर भी करें ताकि ज्यादा लोगों तक बात पहुंचे

कृपया हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

संबंधित - किस अनुच्छेद के अंतर्गत शहर का नाम बदला जा सकता है, उत्तर प्रदेश में किन किन जिले कस्बे तहसील और शहरों का नाम बदला गया, Yogiji, The mark of the Muslim period, the country will become ruins, change the names of cities,

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।