'जीप पर सवार इल्लियां : सरकारी भोंपू बने नीति आयोग के CEO ने BJP शासित राज्यों को पिछड़ा बताया ?

सत्ता पर सवार 'विकास यात्रा' जनता पिछले चार वर्षों से मोदी के 'अच्छे दिनों' को देख-देखकर ऊब चुकी है...

संजय पराते

सत्ता पर सवार 'विकास यात्रा'

जनता पिछले चार वर्षों से मोदी के 'अच्छे दिनों' को देख-देखकर ऊब चुकी है

  • संजय पराते

यह आलेख लिखते समय मुझे शरद जोशी का व्यंग्य 'जीप पर सवार इल्लियां' की याद आ रही है. भाजपा की मजबूरी है कि चुनावी वर्ष में वह गली-कूचे की ख़ाक छान रही है. पहले प्रशासन उतरा, फिर विधायक – और अब पूरी भाजपा ही सड़कों पर आने वाली है. उनकी मंशा आम जनता को प्रदेश के उस 'विकास' को दिखाना है, जिसकी पोल सरकारी आंकड़े खुद खोलते हैं और जिसके आधार पर ही सरकारी भोंपू बने नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने छत्तीसगढ़ को देश के पिछड़े हुए राज्यों में शुमार किया है. यह अलग बात है कि दो दिन बाद ही वे इससे पलटते नज़र आये.

छत्तीसगढ़ की जनता पिछले चार वर्षों से मोदी के 'अच्छे दिनों' को देख-देखकर ऊब चुकी है. भाजपा की 'विकास यात्रा' इस ऊब को दूर करेगी. वैसे ही, जैसे किसी बोर फिल्म में किसी अगली पिक्चर के ट्रेलर का मजा दर्शक लेते हैं – यह मालूम होते हुए भी कि आगामी फिल्म भी उनके जेब को चूना ही लगाएगी. इस 'विकास यात्रा' में ही लोग 'अच्छे दिनों' की झलक खोजेंगे और अपनी ऊब दूर करेंगे.

जो पार्टी जीडीपी वृद्धि दर को ही विकास का एकमात्र संकेतक मानती हो या चुनावी वर्ष में चप्पल, साइकिल, साड़ी और मोबाइल बांटने में यकीन करती हो, उस पार्टी की विकास यात्रा को आसानी से चुनौती दी जा सकती है. 'विकास' के जिस मॉडल को भाजपा ने छत्तीसगढ़ में पेश किया है, उसमें आम जनता के विकास के अलावा सब कुछ है. यहां कारोबारी सुगमता है, कॉर्पोरेट लूट है, समाज में बढ़ती असमानता है, सांप्रदायिक घृणा और नैतिक दरोगागिरी के आधार पर काम करने वाले संगठनों का फैलाव है और गले तक भ्रष्टाचार में डूबी सरकार है. भाजपा की कथित यात्रा इस मॉडल को बनाए रखने की जद्दोजहद ही है. इसलिए बुनियादी मानव सुविधाओं – शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, यातायात, आय आदि से जुड़े संकेतकों पर वे कोई बात नहीं करना चाहते. वे अपनी 'उपलब्धियों' के तौर पर कुछ अमूर्त दावे तो करते हैं, लेकिन इसका राज्य के मानव विकास सूचकांक पर क्या प्रभाव पड़ा, इस पर प्रायः मौन ही है.

भाजपा ने रोजगार देने का सपना बेरोजगारों को दिखाया था. लेकिन इस समय राज्य में 24 लाख से ज्यादा पंजीकृत बेरोजगार है और हर साल इनकी संख्या में 4.26 लाख से ज्यादा का इजाफा हो रहा है. लेकिन पिछले पांच सालों से सरकारी विभागों में डेढ़ लाख से ज्यादा छोटे-बड़े पद ज्यों-के-त्यों खाली हैं. इन पदों को भरने की घोषणायें कभी पूरी नहीं हुई – बल्कि आवेदन पत्रों के नाम पर हजारों करोड़ रूपये सरकार ने ही डकार लिए. पीएससी हमेशा विवादों में ही रही. निजी क्षेत्र की रुचि केवल 'हायर एंड फायर' में ही है, स्थायी रोजगार देने में नहीं. जरूरत है तो काम पर रखो, नहीं तो निकाल बाहर करो. न्यूनतम मजदूरी की भी कोई गारंटी नहीं. इन बेरोजगारों के लिए 'पकौड़ा रोजगार' भी नहीं बचता, क्योंकि आम जनता की हालत तो 'ठन-ठन गोपाल' ही है. प्रदेश के 40 लाख से ज्यादा परिवारों की मासिक आय 10000 रुपयों से कम है, जबकि रिपोर्टें कह रही हैं कि किसी परिवार को अपनी बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने तथा मानवीय गरिमा के साथ जिंदा रहने के लिए 21000 रूपये मासिक की जरूरत है.

70-80 हजार पद तो शिक्षाकर्मियों के ही खाली हैं, जो विकास की राह में 'नियमित शिक्षक' बनने का सपना पाले हुए हैं. युक्तियुक्तकरण के नाम पर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र की हजारों स्कूलों को बंद करने और लगभग एक लाख बच्चों को शिक्षा क्षेत्र से बाहर ढकेलने के बाद यदि प्रदेश में 5वीं का कोई बच्चा दूसरी का पाठ नहीं पढ़ पाता, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है. इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि प्रदेश का कोई भी संस्थान टॉप-20 की सूची में नहीं है. कैग ने ही बताया है कि आदिवासी और दलित छात्र-छात्राओं की छात्रवृत्ति को किस तरह दूसरे मदों में मोड़कर भ्रष्टाचार किया जाता है.

शिशु मृत्यु दर व बाल मृत्यु दर के आधार पर स्वास्थ्य के मामले में छत्तीसगढ़ देश में 12वें स्थान पर खड़ा है. प्रदेश के एक-तिहाई परिवार स्मार्ट कार्ड से वंचित हैं और जिन लोगों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच हैं, वे कॉर्पोरेट लूट के शिकार हैं. नसबंदी और आंखफोड़वा कांड के दाग अभी भी छत्तीसगढ़ से धुले नहीं है और रायपुर के प्रतिष्ठित एम्स में ही ऐसी घटनाएं हो रही हैं. मलेरिया से पीड़ित होने वाले और मरने वालों की संख्या में हर साल वृद्धि हो रही है. आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण और इससे होने वाली मौतें चिंता का विषय है. पिछले दो वर्षों में ही बस्तर संभाग में 56000 से ज्यादा बच्चे 'कुपोषित' के रूप में चिन्हित हुए हैं. लेकिन भाजपा की 'विकास यात्रा' के पथ पर यह मुद्दा रूकावट नहीं है.

रूकावट तो किसान आत्महत्या का मुद्दा भी नहीं है, जिसकी दर यहां देश में सबसे ज्यादा है. वादा तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर समर्थन मूल्य देने और क़र्ज़ मुक्ति का था, लेकिन हर चुनाव के समय केवल 'बोनस-बोनस' का ही खेल खेला गया. कृषि क्षेत्र में नोटबंदी और जीएसटी से हुई तबाही को छोड़ भी दिया जाए, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य से वंचित चना उत्पादक किसानों को इस साल ही 1620 करोड़ रुपयों का नुकसान उठाना पड़ा है. वे बैंकिंग और महाजनी दोनों प्रकार के कर्जों में फंसे हुए हैं. एनएसएसओ का आंकलन है कि प्रदेश के हर किसान परिवार पर औसतन 47000 रुपयों का क़र्ज़ है, जबकि उसकी वार्षिक आय 20000 रूपये भी नहीं है. यही कारण है कि हर साल औसतन 1550 किसान आत्महत्या कर रहे हैं. लेकिन भाजपा एनसीआरबी की इस रिपोर्ट को भी मानने के लिए तैयार नहीं है. इन आत्महत्याओं का प्रदेश के कृषि संकट से सीधा संबंध हैं.

किसान लाभकारी समर्थन मूल्य से, तो मजदूर भी न्यूनतम मजदूरी से वंचित है. यहां त्रिपक्षीय वार्ता में बनी सहमति को भी बदल दिया गया. ट्रेड यूनियनों और मालिकान से वार्ता के बाद 9620-11830 रूपये न्यूनतम मजदूरी की अधिसूचना जारी की गई थी, जिसे बाद में मालिकों के दबाव में 8320-10530 रूपये कर दिया गया. दैनिक मजदूरी में 1300 रूपये की कटौती छोटी नहीं होती. लेकिन भाजपा की नज़रों में यह पूंजीपतियों के लिए औद्योगिक प्रोत्साहन है, जबकि इन्हीं पूंजीपतियों को 238 करोड़ रुपयों की बिजली सब्सिडी भी दी गई है. भले ही मनरेगा मजदूरों की 300 करोड़ रुपयों की मजदूरी देना बकाया हो, लेकिन उन्हें इस सरकार को उसकी संवेदनशीलता के लिए बधाई देनी ही चाहिए कि उनकी मजदूरी में उसने 2 रूपये प्रतिदिन की वृद्धि की है!!

कॉर्पोरेटों के पक्ष में प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने का ही नतीजा है कि प्रदेश में कृषि व वनभूमि का रकबा घटा है. छत्तीसगढ़ गठन के समय वर्ष 2000 में किसानों की संख्या 45% थी, जो आज घटकर 33% रह गई. इतनी ही संख्या में खेत मजदूर बढ़े हैं. याने भाजपा राज में किसानों का दरिद्रीकरण और सर्वहाराकरण तेज हुआ है. जिन आदिवासियों को वनाधिकार के आधे-अधूरे पट्टे भी मिले हैं, उन्हें छीना जा रहा है. 7 लाख आदिवासियों के वनभूमि पर दावों के आवेदन निरस्त कर दिए गए हैं. आदिवासी क्षेत्रों में 5वीं अनुसूची व पेसा कानून के प्रावधान प्रायः निष्क्रिय ही हैं और इसके खिलाफ आदिवासियों की दो बड़ी जनलामबंदियां हो चुकी है. दलित संगठनों के आह्वान पर 2 अप्रैल का छत्तीसगढ़ बंद भी भाजपाई विकास की पोल खोलने के लिए काफी है.

हर सरकारी योजना भ्रष्टाचार के रोग से ग्रस्त है. फसल बीमा योजना में पिछले वर्ष प्रीमियम से निजी बीमा कंपनियों ने वसूले तो 9041 करोड़ रूपये, लेकिन सूखे के मौसम में भी भरपाई की केवल 570 करोड़ रुपयों की. चुनावी फायदे के लिए 2100 करोड़ रुपयों के मोबाइल वितरित किए जायेंगे और लेकिन इसके लिए निजी टेलिकॉम कंपनियों के मोबाइल टावर भी वित्त आयोग के पैसों से यह सरकार ही खर्च करेगी. चाहे आवास योजना हो, या सड़क-बांध निर्माण की योजना, पूरा विकास 'ऋण लेकर घी पीने जैसा' है, क्योंकि विकास के नाम पर पिछले चार सालों में रिज़र्व बैंक से ही 19600 करोड़ रुपयों का क़र्ज़ लिया गया है, जिसका भुगतान इस प्रदेश की आने वाली पीढ़ियों को ही करना है.

कानून-व्यवस्था की हालत यह है कि प्रदेश में हर रोज 5 बलात्कार हो रहे हैं और हर चार दिन में एक सामूहिक बलात्कार. 'हिन्दू राष्ट्र' के यज्ञ में सांप्रदायिक सद्भाव की आहूति दी जा रही है और सबसे बड़ी अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी की रोजी-रोटी पर हमले का कोई मौका नहीं छोड़ा गया है. चर्च भी हिन्दुत्ववादी संगठनों के हमलों से सुरक्षित नहीं है.

छत्तीसगढ़ का निर्माण आदिवासियों के नाम पर किया गया था. राज्य बनने के बाद लोग यह आशा कर रहे थे कि उनकी जिंदगी की रोजमर्रा की समस्याएं हल हो जाएगी. राज्य में पिछले 17 वर्षों में से 14 वर्षों से लगातार भाजपा सत्ता में है और उसकी नाकामियां जगजाहिर है. भाजपा की विकास यात्रा इन नाकामियों पर पर्दा डालने की ही यात्रा है. यह यात्रा सत्ता पर कार्पोरेटों के नियंत्रण को सुनिश्चित करने की यात्रा है. लेकिन दिक्कत यह है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस की भी उदारीकरण की नीतियों से कोई असहमति नहीं है. इसलिए आम जनता को इन नीतियों से उपजे दुष्परिणामों के खिलाफ आंदोलित करने के बजाये वह लालटेन लेकर 'विकास की चिड़िया' की खोज कर रही है. वह केवल आशा ही कर सकती है कि इस नाटक से 'सत्ता की चिड़िया' उसके हाथ में आ जाये और उसका वनवास ख़त्म हो. इसलिए यह यात्रा भाजपा को फायदा पहुंचाएगी या कांग्रेस की वापसी का रास्ता खोलेगी, यह देखना मनोरंजक होगा.

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