छत्तीसगढ़ बजट : राहत के छींटों पर सवार ईल्लियां

यह राहत ही है कि जब केंद्र में मोदी सरकार ने धान का लागत से भी नीचे समर्थन मूल्य घोषित किया है, राज्य में कांग्रेस सरकार 2500 रूपये प्रति क्विंटल के भाव से खरीद रही है,...

संजय पराते

बजट (Budget) केवल आय-व्यय का ब्यौरा (details of income-expenditure) भर नहीं होता, सरकार की नीतियों (government policies) और प्राथमिकताओं का दर्पण भी होता है. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में कांग्रेस 15 सालों बाद सत्ता में वापस लौटी है. जनता ने 'खलनायक' रमनसिंह (Raman Singh) की जगह भूपेश बघेल (Bhupesh Baghel) को 'नायक' बनाकर स्थापित किया है. नेता बदल गए, लेकिन नीतियां? नीतियां वहीँ पुरानी हैं – ढाई दशक पहले की उदारीकरण (liberalization) वाली! और जब नीतियां नहीं बदली, तो आम जनता की नियति (destiny of the general public) भी कैसे बदलेगी?

संजय पराते

उदारीकरण वाली नीतियां कहती हैं -- जनता का खून चूसो, उसके पसीने को मुनाफे में बदलकर धन्ना सेठों की तिजोरियों में जमा करो. जंगल हो या जमीन, जल हो या खनिज – सबको लूटो, निर्बाध! इस निर्बाध लूट में चुनाव बार-बार बाधा बनकर सामने आते हैं. ये चुनाव लड़े तो जाते हैं धन्नासेठों के पैसों से, लेकिन वोट तो जनता डालती है. ये वोट तभी मिलते हैं, उसीको मिलते हैं, जब जनता आश्वस्त होती है कि चुनाव-बाद आने वाली सरकार उसकी तकलीफों की अनदेखी नहीं करेगी, उसकी समस्याओं को हल करेगी.

  विधानसभा चुनाव के वादे थे, तो अब लोकसभा की वैतरणी भी पार करनी है. लोकतंत्र में ये चुनाव है ही ऐसी टुच्ची चीज कि बार-बार जनता को याद करना पड़ता है. इसीलिए भाजपा चाहती है कि यह झंझट ही ख़त्म हो. लेकिन छत्तीसगढ़ में जनता ने भाजपा के झंझट को ही ख़त्म कर दिया और उसे मिनी बस की सवारी करने लायक भी नहीं छोड़ा. इमरजेंसी में कांग्रेस ने भी यही कोशिश की थी और जनता ने उसे उसका हश्र दिखा दिया था. इसलिए राहत के छींटें मारना जरूरी था. लेकिन यदि चुनावी मजबूरी ही सही, राहत है, तो स्वागत तो होना ही चाहिए. आखिर 15 साल बाद राहत की कुछ बूंदें टपकी हैं.

यह राहत ही है कि जब केंद्र में मोदी सरकार ने धान का लागत से भी नीचे समर्थन मूल्य घोषित किया है, राज्य में कांग्रेस सरकार 2500 रूपये प्रति क्विंटल के भाव से खरीद रही है, आगे भी खरीदने की घोषणा की है.

यह राहत ही है कि किसानों पर बकाया सिंचाई कर माफ़ किया गया है और घरेलू उपभोक्ताओं के बिजली बिल 'हाफ' (आधे) किए गए हैं.

यह भी राहत की बात है कि किसानों पर सहकारी समितियों और ग्रामीण व व्यावसायिक बैंकों के चढ़े अल्पकालीन कृषि ऋण के 9500 करोड़ रूपये माफ़ किए गए हैं.

आदिवासियों के 15 वनोपज समर्थन मूल्य पर खरीदने की घोषणा पर जमीनी अमल होता है, तो यह उनके लिए बड़ी राहत होगी.

कचरे की टोकरी में फेंक दिए गए वनाधिकार कानून को ढूंढकर बाहर निकालना और वनाधिकार के निरस्त कर दिए गए दावों पर पुनर्विचार की घोषणा भी आदिवासियों के लिए राहत भरी है.

बंदूक की नोंक पर भाजपा सरकार द्वारा टाटा के लिए आदिवासियों से छीनी गई जमीन की वापसी भी एक बड़ी राहत है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विस्तार किए जाने की घोषणा का भी स्वागत किया जाना चाहिए.

निश्चित ही राहत के ये छींटें गरीबों के जीवन की दुश्वारियां कम करेंगे. लेकिन राहत के इन छींटों में नीतियां कहां हैं, जो इन समस्याओं का स्थायी निदान करने में मदद करें?

Why are the farmers committing suicide?

छत्तीसगढ़ में – और छत्तीसगढ़ ही क्यों, पूरे देश में – किसान आत्महत्या क्यों कर रहा हैं? इसीलिए न कि लाभकारी समर्थन मूल्य के अभाव में खेती-किसानी घाटे का सौदा हो गई है और गरीब किसान क़र्ज़ के फंदे में फंसा हुआ है. छत्तीसगढ़ भयानक कृषि संकट से गुजर रहा है और एनसीआरबी के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि यहां प्रति वर्ष एक लाख किसान परिवारों में 40-45 आत्महत्याएं हो रही हैं. किसान आत्महत्या की यह दर पूरे देश में सर्वाधिक है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट है कि प्रदेश के 17 लाख किसान परिवार गैर-संस्थागत स्रोतों से लिए गए कर्जों के मकड़जाल में फंसे हुए हैं और सूदखोर इनसे 60 से 240 प्रतिशत तक ब्याज वसूल रहे हैं. इन किसानों का काम राहत के कुछ छींटों से चलने वाला नहीं है, इन्हें भरपूर बारिश चाहिए. स्वामीनाथन आयोग की सी-2 लागत पर आधारित न्यूनतम समर्थन मूल्य और संपूर्ण क़र्ज़ मुक्ति की बारिश! लेकिन यही वह नीतिगत सवाल है, जिससे कांग्रेस आंख चुरा रही हैं.

वनाधिकार की भी यही स्थिति है. अव्वल तो प्रशासन में ऐसे लोग बैठे हैं, जो कॉर्पोरेटों को तो पूरा जंगल सौंपने के लिए एक पैर पर खड़े हैं, लेकिन उस पर काबिज आदिवासियों को जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं देना चाहते. कानून बनने के बाद भी उनकी बेदखली आज तक जारी है.

वनाधिकार कानून की मुख्य बातें (main points of the Forest Rights Act)

वनाधिकार कानून ऐसे आदिवासियों को भी चिन्हित करने की बात कहता है, जिनका वनभूमि पर 13 दिसम्बर 2005 से पहले भौतिक कब्ज़ा था और जिन्हें इस तिथि से पहले या बाद में बेदखल कर दिया गया है. वनाधिकार और पेसा एक्ट से वंचित करने के लिए बड़ी चालाकी से ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी निकायों में शामिल कर लिया गया.

पुरानी सरकार ने आदिवासियों को दावा-आवेदनों की कोई पावती नहीं दी और उनके उनके निरस्त दावों की भी कोई सूचना नहीं दी. इसीलिए निरस्त आवेदनों की कोई सही सूची भी प्रशासन के पास नहीं है. इसके बावजूद, आदिवासियों के आवेदनों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है. सरगुजा में तो बड़े पैमाने पर ऐसे प्रकरण सामने आये हैं, जिसमें आदिवासियों के वनाधिकार पट्टे ही छलपूर्वक प्रशासन ने छीन लिए हैं, क्योंकि इस वनभूमि पर कॉर्पोरेट परियोजनाएं आ रही हैं.

वनाधिकार कानून स्पष्ट कहता है कि पहले वन भूमि पर आदिवासियों का स्वामित्व स्थापित किया जाएगा, इसके बाद ही किसी परियोजना के लिए अधिग्रहण, विस्थापन और पुनर्वास की कार्यवाही होगी. दरअसल, यह मुद्दा एक दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की मांग करता है और कांग्रेस की वास्तविक परीक्षा अभी होनी है, क्योंकि सरकार और प्रशासन दोनों में 'कॉर्पोरेट लॉबी' काफी मजबूत है.

टाटा के लिए छीनी गई जमीन की वापसी की घोषणा के बाद भूमि-अधिग्रहण कानून के पालन के मामले में अब इस सरकार ने चुप्पी ओढ़ ली है, जबकि उसे यह नीतिगत घोषणा करनी चाहिए थी कि पूरे प्रदेश में समयबाह्य हो चुकी विभिन्न परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित, लेकिन अनुपयोगी भूमि को उनके मूल भूस्वामियों को लौटाया जाएगा. प्रदेश के किसान आंदोलन के लिए यह एक बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है और इसके साथ ही विस्थापन, पुनर्वास, मुआवजा और रोजगार के सवाल भी जुड़ेंगे. एक सर्वे का अनुमान है कि ऐसी 'वापसी-योग्य' जमीन का पूरे प्रदेश में रकबा एक लाख हेक्टेयर से ज्यादा होगा और लाखों किसान परिवार विस्थापन से जुड़ी समस्याओं से प्रभावित होंगे.

भाजपा सरकार का यह भी शर्मनाक रिकॉर्ड था कि वर्ष 2017-18 में प्रदेश में पंजीकृत 38 लाख परिवारों और 82 लाख मजदूरों में से 13 लाख परिवारों के 27 लाख मजदूरों को मनरेगा में एक भी दिन काम नहीं मिला. यह हालत तब थी, जब बजट में इसके लिए 2196 करोड़ रूपये आबंटित किए गए थे! आज इन ग्रामीण परिवारों को 100 दिन काम देने के लिए 6000 करोड़ रुपयों से अधिक की मजदूरी देने की व्यवस्था करनी होगी. लेकिन बजट आबंटन किया गया है केवल 1542 करोड़ रूपये ही! पिछले वर्ष की तुलना में हालांकि यह बजट आबंटन 121 करोड़ रूपये अधिक है, लेकिन यदि मुद्रास्फीति को गणना में लें, तो इस आबंटन से उतने श्रम-दिवसों का भी सृजन नहीं होगा, जितने भाजपा-राज में हुए थे. वैसे भी मजदूरी भुगतान के मामले में पूरे देश में छत्तीसगढ़ का 26वां स्थान है.

मनरेगा ग्रामीण ग़रीबों के लिए केवल रोजगार सृजन का ही कार्यक्रम नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने का कार्यक्रम है. Institute of Economic Growth की रिपोर्ट बताती है कि मनरेगा के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अनाज के उत्पादन में 11.5% तथा सब्जी के उत्पादन में 32.3% की वृद्धि हुई है और इसके कारण गरीब घरों की आय में 11% की वृद्धि हुई है. इस प्रकार यह योजना रोजगार सृजन, उत्पादन और आय में वृद्धि – इन तीनों का साधन है. इससे ग्रामीण ग़रीबों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत भी बढ़ी है. इसी कारण, गांवों में सामंती प्रभु-वर्ग इस योजना पर आंखें तरेर रहा है. कांग्रेस इस योजना को न उगल पा रही है, न निगल पा रही है. उदारीकरण की नीतियां उसे मनरेगा जैसे रोजगार गारंटी योजना की इजाजत नहीं देती. इसीलिए उसने बस भाजपा का अनुसरण करते हुए उसे चुपचाप मरने के लिए छोड़ दिया है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए मनरेगा का प्रभावी क्रियान्वयन करने के बजाए उसने 'सुराजी गांव योजना' शुरू करने की लफ्फाजी की है. लेकिन अभी तक इसका कोई स्पष्ट खाका सामने नहीं आया है.

          90910 करोड़ रूपये के कुल बजट में से 21597 करोड़ रूपये (22%) कृषि व संबंधित क्षेत्र के लिए आबंटित किए गए हैं, जिसमें 10000 करोड़ रूपये तो कृषि कर्जमाफी के ही हैं. यदि इस राशि को अलग कर दिया जाएं, तो कृषि संबंधित अन्य विकास कार्यों के लिए पिछले बजट से भी कम राशि ही उपलब्ध होगी. स्पष्ट है कि यह बजट कृषि व किसान केन्द्रित होने का केवल दिखावा करता है. इसका पता इसी बात से चलता है कि फसल बीमा प्रीमियम के लिए आबंटित राशि को भी 368 करोड़ रूपये से घटाकर 316 करोड़ रूपये कर दिया गया है. बीमा योजनाओं को निजी कंपनियों को सौंपकर उनकी तिजोरी भरने की कसरत की जाती रही है. इससे हटने की कोई कोशिश नहीं की गई है.

          शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र भी बड़े पैमाने पर निजीकरण का शिकार है. शिक्षा के निजीकरण ने मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए भी गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा पाना दूभर कर दिया है. भाजपा सरकार ने तो आउटसोर्सिंग के जरिये इस क्षेत्र के निजीकरण को एक नई ऊंचाई दी है. Public Health Resource Network की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश के स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में जा रहा है और 96% लोगों को अपने ईलाज के लिए औसतन 8-9 हजार रूपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं. केंद्र की आयुष्मान योजना को तो 'अलविदा' कह दिया गया है, लेकिन 300 करोड़ की यूनिवर्सल हेल्थ केयर अभी गर्भ में ही है. घोषणा के अनुसार, यदि यह योजना निजी खिलाडियों के साए से हटकर मरीजों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त ईलाज और दवा उपलब्ध कराती है, तो प्रदेश का स्वास्थ्य भी सुधर सकता है. निजीकरण के कारण इन दोनों क्षेत्रों में जनता की पहुंच कमजोर हुई है और जिसने पहुंच बनाने की हिमाकत की है, वह गरीबी की दलदल में फंसने को मजबूर हो गया है.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करने और प्रति व्यक्ति 7 किलो आबंटन के भाजपाई फार्मूले से हटकर, प्रति परिवार 35 किलो अनाज आबंटन के पुराने फार्मूले पर लौटने की घोषणा बजट में की गई है और इसके लिए 2770 करोड़ रूपये के पिछले वर्ष के बजट को बढ़ाकर 4000 करोड़ रूपये किया गया है. यह स्वागत योग्य है, लेकिन कुपोषण की भयावह समस्या का यह सीमित समाधान ही है. फिर यह योजना सरकारी गरीबी रेखा पर ही टिकी हुई है. लाखों गरीब परिवारों को आज भी विभिन्न नाजायज कारणों से राशन प्रणाली से दूर रखने की कसरत की जाति है और इसका एकमात्र हल यही है कि पीडीएस को सार्वभौमिक बनाया जाएं. तभी कुपोषण से लड़ा जा सकता है, जो आज प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या है – खासकर आदिवासियों-दलितों, महिलाओं-बच्चों और ग़रीबों के बीच.

प्रदेश की 45% आबादी आदिवासी और दलितों की है. इस समुदाय की उपयोजना के लिए पिछले वर्ष 20465 करोड़ रूपये आबंटित किए गए थे, तो इस वर्ष 1009 करोड़ बढ़ाकर 21474 करोड़ रूपये कर दिया गया है. मुद्रास्फीति को गणना में लें, तो वास्तविक आबंटन में कोई वृद्धि नहीं हुई है. बेरोजगारों को भत्ता और 60 वर्ष से अधिक आयु के किसानों को पेंशन – कांग्रेस के ये दो प्रमुख चुनावी वादे थे. लेकिन जब प्राथमिकतायें  नहीं बदली, तो इनके लिए फंड जुटना मुश्किल था. प्रदेश के असंगठित मजदूरों, योजनाकर्मियों, शिक्षाकर्मियों, संविदा मजदूरों और मध्यमवर्गीय कर्मचारियों की भाजपा से नाराजगी का फायदा कांग्रेस को मिला, लेकिन उनकी मांगों/समस्याओं को हल करने के लिए यह बजट कोई भरोसा नहीं जगाता. उन्हें तो अभी और संघर्ष करना है. रसोईया मजदूरों की मजदूरी में केवल 300 रूपये की वृद्धि करना और 6 घंटे प्रतिदिन काम के लिए 50 रूपये रोजी देना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि उन्हें 'बंधुआ मजदूर' की श्रेणी में बनाए रखना है. सरकारी विभागों सहित हर उद्योग में मजदूर घोषित न्यूनतम मजदूरी से भी वंचित हैं और सम्मानजनक न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने की चिंता से भी यह बजट दूर है.

सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र के व्यय के मुख्य अवयवों पर आबंटित राशि पिछले बजट की तुलना में या तो घटी है या फिर कमोबेश स्थिर है, (तालिका). तो फिर इस सरकार की प्राथमिकतायें भाजपा-राज की प्राथमिकताओं से किस तरह अलग हैं?

सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र के व्यय

बजट 2018-19 (भाजपा)

बजट 2019-20 (कांग्रेस)

1. स्कूली शिक्षा

14.8%

14.7%

2. अनुसूचित जाति-जनजाति विकास

7.7%

7.0%

3. स्वास्थ्य

5.6%

5.2%

4. महिला व बाल विकास

2.3%

2.3%

5. खाद्य व नागरिक आपूर्ति

5.7%

5.9%

6. लोक निर्माण

8.6%

6.8%

7. सिंचाई

4%

3.2%

8. पंचायत व ग्रामीण विकास

11%

9.9%

सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र के उपरोक्त अवयवों के व्यय ही आम जनता के जीवन-स्तर को निर्धारित करते हैं और व्यय-आबंटन की तुलना से स्पष्ट हैं कि कांग्रेस का बजट भाजपाई बजट से कट-पेस्ट का उम्दा  उदाहरण है. बजट आबंटन के इस पैटर्न के चलते आम जनता की उस बदहाली में कोई विशेष सुधार नहीं होने वाला है, जो भाजपा राज में थीं. तो इस सरकार की प्राथमिकतायें भाजपा-राज से किस तरह अलग है?

जिस भाजपाई बजट का कांग्रेस विरोध करती थी, उसी कट-पेस्ट बजट का आज भाजपाई विरोध कर रहे हैं. सवाल सिर्फ एक है – सत्ता में आने के लिए विरोध का दिखावा करना जरूरी है, वर्ना दोनों की आर्थिक नीतियां तो एक ही हैं. उदारीकरण की नीतियां राज्य के लोक-कल्याणकारी चरित्र को ख़त्म करने की मांग करती है. लेकिन चुनावी मजबूरियां हैं कि लोक-कल्याणकारी सत्ता होने का दिखावा किया जाएं. मोदी का अंतरिम बजट भी इसी का सबूत है.

शरद जोशी का एक व्यंग्य है – जीप पर स्वर ईल्लियां. अब ये ईल्लियां बजट पर सवार हैं. यदि यहीं नीतियां जारी रही, तो राहत के ये छींटें भी जनता तक नहीं पहुंचेंगे. यही वामपंथ की भूमिका आती है कि आम जनता की रोजी-रोटी और जिंदगी से जुड़े सवालों पर उन्हें लामबंद करें और जनसंघर्षों के जरिये नीतियों को बदलने की लड़ाई आगे बढ़ाएं.

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