भोले छत्तीसगढ़ियों पर गैर छत्तीसगढ़ियों का कब्जा

राज्य निर्माण के बाद पिछले सत्रह सालों में छत्तीसगढ़ की कितनी सम्पदा लूटी गई। छत्तीसगढ़ से कमाई करने के बाद गैर छत्तीसगढ़ियों ने अपने गृह राज्यों में न जाने कितने की सम्पत्ति बना ली है...

India Writers

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति

रायपुर, 07 अगस्त 2017

सरकारी कामकाज में छत्तीसगढ़ी के प्रयोग को मान्यता देने के राज्य सरकार के फैसले से खासकर जिलों, ब्लॉकों व पंचायतों के अलावा राज्य सचिवालय में भी खुशनुमा माहौल है। जिन कर्मचारियों से छत्तीसगढ़ी बोलते नहीं बनती, वे भी इसे बोलने की कोशिश कर रहे हैं। उनमें छत्तीसगढ़ी सीखने की ललक है क्योंकि यह एक बेहद मीठी बोली है। भले ही वे टूटी-फूटी छत्तीसगढ़ी बोल रहे हैं लेकिन भाव स्पष्ट है कि वे इस बोली को सीखना चाहते हैं।

इसके उलट एक मंत्री राज्य सरकार के इस फैसले ने दुखी हैं क्योंकि छत्तीसगढ़ी तो छोड़िए वे स्पष्ट हिंदी भी नहीं बोल पाते हैं। अशुद्ध उच्चारण की वजह से उन्हें कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाषण देने से रोका जाता है या वे खुद ही भाषण देने से बचते हैं। निमाड़ी-मालवी बोली का पुट उनकी बातचीत में स्पष्ट दिखता है। इसलिए लोग उन्हें अपने बीच का मानने से अब तक तैयार नहीं हो पाए हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस या किसी दूसरे राजनीतिक दल ने अगर उनके सामने ठेठ छत्तीसगढिय़ा को उतार दिया तो इन मंत्रीजी का भूतपूर्व होना तय है क्योंकि एक तो उनमें स्थानीयता का अभाव है और फिर उनके कारनामे ऐसे हैं कि अब शायद ही कोई मतदाता उन्हें वोट देने के लिए तैयार हो।

छत्तीसगढ़ में स्थानीयता का मुद्दा बेहद गंभीर है और एक संस्था ने इस मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाने का दायित्व उठाया है। बेशक शुरुआती दिनों में संस्था को कई तरह की दिक्कतों व प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा परंतु अब छत्तीसगढ़ के गांवों से लेकर शहरों तक यह बात समझी जाने लगी है कि गैर-छत्तीसगढ़ियों के हाथों छत्तीसगढ़ का भविष्य सुरक्षित नहीं है क्योंकि बाहरी लोग छत्तीसगढ़ आकर केवल शोषण और दोहन करते हैं। अगर कोई पैमाना हो तो इसे जरूर नापना चाहिए कि राज्य निर्माण के बाद पिछले सत्रह सालों में छत्तीसगढ़ की कितनी सम्पदा लूटी गई। छत्तीसगढ़ से कमाई करने के बाद गैर छत्तीसगढ़ियों ने अपने गृह राज्यों में न जाने कितने की सम्पत्ति बना ली है।

इसमें कई शक नहीं है कि छत्तीसगढ़ की धरा उर्वरा है। यहां आने वाला सिर्फ और सिर्फ पनपता है। यहां आने के बाद कोई भी वापस लौटने की नहीं सोचता है लेकिन यहां रहकर उस गैर छत्तीसगढ़िया का अपने गृह राज्य से प्यार बना रहता है और वह उसी इलाके के विकास के बारे में सोचता है। नई पीढ़ी में छत्तीसगढ़ के लिए प्यार और समर्पण का भाव पैदा करने के लिए एक वातावरण बनाने की जरूरत है और इसके लिए राज्य सरकार को आगे आना चाहिए परंतु वह ऐसा नहीं कर रही है। इसकी वाजिब वजह है।

राज्य सरकार में महत्वपूर्ण स्थानों पर ऐसे अफसर कुण्डली मारकर बैठे हैं, जिन्हें निश्चित रूप से प्यार नहीं है। वे यहां केवल कमाने-खाने आए हैं। उन्हें इस बात से बिल्कुल भी मतलब नहीं है कि छत्तीसगढ़ में खेती का रकबा बढ़े, यहां के खेतों को पानी मिले, यहां सिंचाई के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट शुरू हों। उनकी कोशिश होती है कि छत्तीसगढ़ में बाहरी उद्योग आएं परंतु उनके नौकरी स्थानीय नौजवानों को न मिले। इन उद्योगों में वे अपने नाते-रिश्तेदारों को एडजस्ट कराते रहे हैं। छत्तीसगढ़ी नौजवान केवल दिहाड़ी मजदूर की भूमिका में इन उद्योगों में भागीदार बनकर रह जाता है। सरकारी नौकरियों में भी इन गैर छत्तीसगढ़ियों का बोलबाला होता है क्योंकि सलेक्शन कमेटी में वही लोग शामिल होते हैं। छत्तीसगढ़ी नौजवान के लिए बाबू और सिपाही की पोस्ट रहती है। बाकी के पदों पर गैर छत्तीसगढ़िया अफसरों के करीबी या फिर मैनेज करने वालों की भर्ती होती है।

छत्तीसगढ़ियों के साथ होने वाले इस व्यवहार को लेकर स्थानीय मीडिया में भी खामोशी रहती है क्योंकि उसमें भी गैर छत्तीसढ़ियों का बोलबाला है। प्रदेश में चल रहे अधिकतर मीडिया समूहों में गैर छत्तीसगढ़ियों ने कब्जा कर रखा है। जिन मीडिया समूहों में कभी छत्तीसगढ़िय़ों की तूती बोलती थी, उन्हें षड्यंत्र करने बार का रास्ता दिखा दिया गया।

छत्तीसगढ़िय़ा मूलत: सीधा व सरल होता है, उसे साजिश या राजनीति करनी नहीं आती। बाहरी लोग उन्हें किसी न किसी मामले में फंसा कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। किसी भी संस्था में स्थानीय लोगों का केवल उपयोग किया जाता है और इस्तेमाल करने के बाद दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया जाता है।

कहने का मतलब यह है कि अब वह वक्त आ गया है, जब छत्तीसगढ़ियों को अपने हित के लिए जागरूक होना होगा। सामने विधानसभा चुनाव है और यही वह मौका है कि जनप्रतिनिधि ऐसा चुना जाए, जो छत्तीसगढ़ की माटी में पला-बढ़ा है, उसे अपनी बोली-भाषा से प्यार हो… इसके बाद ही हालात में सुधार होने की उम्मीद है वरना छत्तीसगढिय़ा छले ही जाते रहेंगे।

चोखेलाल

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