शीला दीक्षित की दिल्ली के दावेदार!

मोदी-केजरीवाल दोनों राजनीति की 'कांग्रेस संस्कृति' का साझा विरोध करके सत्ता में आये थे! लेकिन मजेदारी यह है कि दोनों ही कांग्रेस की विरासत पर अपनी दावेदारी ठोकने में दिन-रात एक किये रहते हैं. ...

दिल्ली (Delhi) भारत का प्राचीन शहर (ancient city of India) है. कहते हैं दिल्ली शहर कई बार बसा और उजड़ा है. महाभारत (Mahabharata) काल से यह सिलसिला चल रहा है. मध्यकाल में यह शहर लम्बे समय तक भारत की सत्ता का केंद्र रहा. आधुनिक काल में भी वह सत्ता का केंद्र (center of power) है. दिल्ली याने सत्ता और सफलता. लिहाज़ा, 'दिल्ली दूर नहीं' मुहावरा ही बन गया. दिल्ली को सत्ता का केंद्र बनाने वाले शासकों ने अपनी-अपनी रुचि और उपयोग के हिसाब से दिल्ली की अभिकल्पना (design of Delhi) की. शुरू में अंग्रेज़ भारत पर कलकत्ता से शासन करते थे. 1880 में उन्होंने शिमला में ग्रीष्मकालीन राजधानी (summer capital in Shimla) बनाने का फैसला करके 1888 तक भव्य वाईसरीगल लॉज के साथ कई प्रशासनिक और सैन्य इमारतों का निर्माण कराया. 1912 में राजधानी कलकत्ता से दिल्ली बदलने का फैसला हुआ तो वास्तुकार लुटियंस (architect Lutyens) को 'नई दिल्ली' की अभिकल्पना का काम सौंपा गया. 1929 में वह दिल्ली तैयार हुई जिसे आज तक लुटियंस की दिल्ली कहा जाता है. 1931 में लुटियंस की दिल्ली का उद्घाटन हुआ और उसने मुग़लों की दिल्ली (Delhi of the Mughals) की चमक फीकी कर दी. आज़ादी के बाद भारत का सत्ता केंद्र (power center of India) लुटियंस की दिल्ली (the Lutyens' Delhi) ही बना. क्योंकि सत्ता और शासन का गांधीवादी ढब भारत के नए  शासकों को पसंद नहीं था.

प्रेम सिंह

लुटियंस की दिल्ली बनने के बाद से दिल्ली में कई तरह के निर्माण कार्य तो काफी होते रहे, लेकिन 20वीं सदी के अंत तक उसकी मूल संरचना में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया. पहली बार शीला दीक्षित ने, जो 1998 से 2013 तक 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं, दिल्ली के विकास की एक नई अभिकल्पना की और उसे अंजाम देना शुरु किया. आज जो दिल्ली हमारे सामने है, वह शीला दीक्षित की दिल्ली है. 'टूटे नहीं विकास की डोर' - शीला दीक्षित ने अपने चुनावों में यह नारा रखा. हम शीला दीक्षित की विकास की अवधारणा के स्पष्ट विरोधी हैं. सार्वजनिक नागरिक सेवाओं को सरकारी दायरे से पूरी तरह या आंशिक रूप में निकाल कर निजी क्षेत्र में ले जाने की उनकी नीति के भी हम पूर्ण विरोधी हैं. देश के ज्यादातर नेताओं की तरह गवर्नेंस का उनका नज़रिया भी भारत का संविधान न होकर विश्व बैंक के आदेश हैं. कोई भी भारतीय नागरिक इस नज़रिए से सहमत नहीं हो सकता. लेकिन शीला दीक्षित ने अपने विकास और प्रशासन के आधार पर 15 साल तक दिल्ली और दिल्लीवासियों के दिलों पर राज किया.

आज शहर में जितने फ्लाईओवर, अंडरपास, दिल्ली के चौतरफा बने राष्ट्रीय राजमार्ग, सिग्नेचर ब्रिज, आलीशान फार्म हाउस, बैंकट हॉल, रिसॉर्ट्स, मोटल्स, मॉल, दिल्ली सरकार का नया सचिवालय, क्नॉट प्लेस और अंतर्राज्यीय बस अड्डे सहित कई स्थलों का नवीनीकरण और सौन्दर्यीकरण, सरोजिनी नगर और किदवई नगर में पुराने सरकारी आवासों को गिरा कर बने नए सरकारी आवास/ऑफिस/बिज़नेस कॉम्प्लेक्स ... और ज़मीन के नीचे से ज़मीन के ऊपर तक आश्चर्य की तरह बिछता चला गया दिल्ली मेट्रो का जाल - सब शीला दीक्षित की देन है. राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन, जिसमें भ्रष्टाचार के लिए उनकी भारी हुई, से जुड़े निर्माण कार्य भी शीला दीक्षित के कार्यकाल में हुए. इनके अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के कई नए कॉलेज खोले गए. दिल्ली के इंजीनियरिंग कॉलेज को दिल्ली टेक्नोलॉजीकल यूनिवर्सिटी (डीटीयू) बना कर राज्य यूनिवर्सिटी का दर्ज़ा और अलग कैंपस दिया गया. सफदरजंग अस्पताल से सम्बद्ध वर्द्धमान मेडिकल कॉलेज भी उनके कार्यकाल में खोला गया. दो नए विश्वविद्यालय - गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ और डॉ. बीआर अम्बेडकर - खोले गए. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की परिकल्पना भले ही किसी रूप में पहले से मौजूद रही हो, उस पर तेजी से अमल शीला दीक्षित के कार्यकाल में ही हुआ. शायद शीला दीक्षित के शासनकाल में ही रिकॉर्ड भीड़ दिल्ली में आई और दिल्ली तथा एनसीआर में जहां डील समय बस गई. इन समस्त निर्माणों से दिल्ली की काया ही पलट गयी. बाहर से आने वालों की बात जाने दें, यहां के वाशिंदे दिल्ली की नई सरंचना से चक्कर खाने लगे.      

केंद्र में कायम मौजूदा 'ईमानदार' प्रधानमंत्री और राज्य में कायम मौजूदा 'ईमानदार' मुख्यमंत्री दोनों राजनीति की 'कांग्रेस संस्कृति' का साझा विरोध करके सत्ता में आये थे! लेकिन मजेदारी यह है कि दोनों ही कांग्रेस की विरासत पर अपनी दावेदारी ठोकने में दिन-रात एक किये रहते हैं. हाल का एक उदाहरण देखा जा सकता है. दिल्ली का इफिल टावर कहे जाने वाले वजीराबाद सिग्नेचर ब्रिज का पिछले साल नवम्बर में उद्घाटन हुआ. उदघाटन स्थल पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की पार्टियों के नेता आपस में भिड़ गए. दोनों सिग्नेचर ब्रिज के निर्माण का श्रेय लेना चाहते थे, जिसके निर्माण का फैसला 2004 में किया गया था. उस घटना पर कुछ पत्रकारों ने यह सवाल उठाया था कि सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन की असली हकदार शीला दीक्षित हैं. लेकिन उन्हें उद्घाटन समारोह में निमंत्रित ही नहीं किया गया था. जनता का धन अपने प्रचार पर लुटाने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री ने अपने फोटो सहित वजीराबाद के सिग्नेचर ब्रिज के विशाल और महंगे होर्डिंगों से पूरी दिल्ली को पाट दिया था. उनमें से कई होर्डिंग अभी तक नहीं हटाये गए हैं.

मेट्रो का जब भी कोई नया चरण शुरू होता है या बन चुके चरण का उदघाटन होता है तो दोनों 'ईमानदारों' में श्रेय लेने की होड़ मच जाती है. हकीकत यह है कि शीला दीक्षित ने दिल्ली का जो कायाकल्प किया, उसका ढंग का रख-रखाव तक केंद्र और दिल्ली की मौजूदा सरकारें नहीं कर पाई हैं. दिल्ली गंदगी, बीमारी, ट्रेफिक जाम और अपराध जैसी समस्याओं से बुरी तरह त्रस्त है. लेकिन दिल्ली के चप्पे-चप्पे को बधाई देने के नित नए विज्ञापन अखबारों से लेकर सड़कों तक बिखरे देखे जा सकते हैं. मोदी जो देश के स्तर पर कर रहे हैं, केजरीवाल वह दिल्ली के स्तर पर कर रहे हैं. अपनी अकर्मण्यता को ढंकने के लिए जनता के धन की ऐसी बर्बादी शायद ही अब से पहले किसी सरकार या नेता ने की हो, जैसी देश के ये दो 'ईमानदार' कर रहे हैं! सिग्नेचर ब्रिज उद्घाटन की अशोभनीय घटना के बाद शीला दीक्षित ने चुटकी ली थी कि ये लोग प्रचार को ही काम मानते हैं!

अब लोकसभा चुनाव सामने हैं. अगले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव होने हैं. शीला दीक्षित की दिल्ली पर कब्जा बनाये रखने के लिए दोनों दावेदार नए-नए दांव और चालें चल रहे हैं. हमने यह किया, हमने वह किया का झगड़ा रोज दोनों के बीच होता रहता है. जबकि हकीकत में दोनों के बीच साझा है. मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई से अघाए लोगों को 'जीने की कला' सिखाने वाले 'सरकारी संत' रविशंकर ने 2016 में विश्व संस्कृति मेले के नाम पर पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से पहले से ही संवेदनशील यमुना के कछार को तबाह कर डाला. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की रपट ने यह खुलासा किया. वह भारी-भरकम तमाशा बड़े और छोटे 'ईमानदार' - दोनों ने मिल कर आयोजित किया था. दिल्ली में एक सड़क का नाम औरंगजेब रोड था. दोनों ने सड़क का वह नाम बदल कर 'हिंदू संस्कृति' की रक्षा का सम्मिलित शौर्य प्रदर्शित किया. अक्सर देखने में आता है कि 'आप' के कुछ 'विघ्न संतोषी' नेताओं को धर्मनिरपेक्ष पत्रकार और बुद्धिजीवी आरएसएस का बताते रहते हैं. यह कहते हुए कि वे केजरीवाल और 'आप' को बदनाम करने के लिए वहां प्लांट किये गए हैं. लेकिन विवादों के बावजूद वे लगातार पार्टी में बने रहते हैं. 'आप' ने जो दो राज्यसभा के सदस्य बनाये हैं, उनकी पहचान के बारे में धर्मनिरपेक्ष पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने कोई जिज्ञासा आज तक नहीं जताई है. उन महानुभावों ने भी नहीं, जो खुद राज्यसभा जाने के लिए केजरीवाल की ओर टकटकी लगाए हुए थे. हो सकता है राज्यसभा भेजे गए सज्जन भी साझा तत्व हों! शायद दोनों के बीच इसी साझेपन को देख कर एक को बड़ा और दूसरे को छोटा 'मोदी' कहा जाता है.

हाल में केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा दे दिया जाए तो वे लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रचार करेंगे. (तब शीला दीक्षित ने कहा था कि देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली में अन्य राज्यों जैसा विधान नहीं हो सकता.) मजेदारी यह है कि मोदी के राज में देश में फासीवाद उतर आने पर अतिशय चिंता जताने वालों ने हमेशा की तरह 'ईमानदार' नेता से पूछा तक नहीं कि महज राज्य का दर्ज़ा जैसी मांग मान लिए जाने के बदले फासीवादी मोदी का समर्थन कैसे किया जा सकता है? उन सयाने लोगों ने भी नहीं पूछा जो केजरीवाल को 'समाजवादी' बनाने गए थे और जिन्हें अभद्रतापूर्वक बाहर का रास्ता दिखाया गया. जबकि ये लोग अन्य नेताओं अथवा नागरिकों के कतिपय वक्तव्यों अथवा फैसलों को अपने अनुमान से आरएसएस/भाजपा के समर्थन में बता कर उन पर चारों तरफ से टूट पड़ते हैं. वह दौर तो गुजर गया जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और 'आप' को स्वतंत्रता आंदोलन, जेपी आंदोलन, दूसरी क्रांति, तीसरी क्रांति के साथ जोड़ा जा रहा था.

यह बार-बार बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और 'आप' आरएसएस के तत्वावधान में संपन्न हुए थे. इसलिए वह सब श्रेय, जिसे धर्मनिरपेक्ष पत्रकार और बुद्धिजीवी अकेले 'आप', उसमें भी केजरीवाल को देते हैं, अपने आप आरएसएस को भी चला जाता है. हमने काफी पहले लिखा था कि पूंजीवाद अपनी जनता गली-मोहल्लों और घरों में बनाता चलता है. भारत के धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी खेमे का यह रवैया देख कर कहा जा सकता है कि पूंजीवाद अपनी जनता के साथ अपने बुद्धिजीवी और राजनीतिक पार्टियां भी बनाता चलता है. 

बहरहाल, यह देखना रोचक होगा कि शीला दीक्षित की दिल्ली के दावेदारों को आपस में कितना हिस्सा मिलता है? खुद शीला दीक्षित अपनी दिल्ली को फिर से कितना फतह कर पाती हैं! दिल्ली में कांग्रेस की राजनीति का चक्र कुछ ऐसा चला कि वे ऐन चुनाव के वक्त दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष हैं. दावेदारी के इस युद्ध में एक और बात गौर करने की है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा), दिल्ली में जिसका मत प्रतिशत एक समय 14 के ऊपर पहुंच गया था, कांग्रेस-भाजपा से अलग दिल्ली की दावेदार पार्टी के रूप में उभरी थी. दिल्ली पर बसपा की दावेदारी की चुनौती साझे दावेदारों ने पिछले चुनाव में ख़त्म कर दी. अब बसपा  केवल 5 प्रतिशत पर सिमट गई है. 

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष हैं.)

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