बिपिन रावत को केवल बांग्लादेशी मुसलमान ही क्यों दिखे, बांग्लादेशी हिंदू क्यों नहीं दिखते?

असम में खेल सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक का नहीं हुआ है, हिंदू वोट बैंक का भी 'ग्रेट गेम' हुआ है। ऐसा नहीं होता, तो 'बराक वेली' में बांग्ला को आधिकारिक भाषा बनाये जाने की घोषणा नहीं होती......

पुष्परंजन
हाइलाइट्स

तो सेना पर चर्चा क्यों नहीं हो?

इस देश में 'दूसरे जनरल वी.के. सिंह' तैयार किये जा रहे हैं?

असम में खेल सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक का नहीं हुआ है, हिंदू वोट बैंक का भी 'ग्रेट गेम' हुआ है। ऐसा नहीं होता, तो 'बराक वेली' में बांग्ला को आधिकारिक भाषा बनाये जाने की घोषणा नहीं होती...

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भारतीय सेना को युद्ध की स्थिति में कैसे काम करना है, सामान्य परिस्थितियों में पब्लिक, मीडिया के साथ सेना का किस तरह से व्यवहार होना चाहिए? सेना में अपने से सीनियर के आदेशों का कैसे सम्मान करना है? इन तमाम बातों के लिए आचार संहिता बनी है। इस आचार संहिता की परिधि में यह नहीं है कि सेना के किसी अधिकारी को राजनीति अथवा किसी समुदाय विशेष पर टिप्पणी का अधिकार है। बल्कि, भारतीय सेना के 'कोड ऑफ कंडक्ट' में कई जगहों पर मानवाधिकार का ध्यान रखने की वजाहत दी गई है।

सेना प्रमुख तत्कालीन सरकार के मुखिया से कुछ विषयों पर मुखालिफ रहे हैं, यह बात भी जनरल के.एम. करियप्पा के कॅरियर को देखकर लग जाता है। 1 जनवरी 1949 को यूएन की मध्यस्थता में सीज फायर का विरोध करते हुए जनरल करियप्पा ने पीएम नेहरू को पत्र लिखा था, उससे आभास हो गया था कि सेनाध्यक्ष इस्तीफा देने वाले हैं। इस दरार को दुरूस्त कर पंडित नेहरू ने उन्हें सेना को इंपीरियल ढांचे से निकालकर राष्ट्रवादी रूप देने की जीम्मेदारी सौंपी थी। दस्तावेज बताते हैं कि जनरल करियप्पा ने सेना को बिल्कुल गैर राजनीतिक रखने की परंपरा डाली थी।

नेहरू के समय तय हुआ कि आजाद हिंद फौज के काडरों को सेना में शामिल कर लिया जाय। जनरल करियप्पा ने इससे इंकार कर दिया। मगर, उन्हीं जनरल करियप्पा ने सेना में अभिवादन के वास्ते आजाजद हिंद फौज के 'जय हिंद' को स्वीकार किया था। जनरल करियप्पा इसके भी विरूद्ध थे कि सेना में जाति, समुदाय के आधार पर आरक्षण दिया जाए।

कश्मीर में जनरल करियप्पा का एक एक्शन मानवाधिकार का ध्यान रखने के संदर्भ में मील का पत्थर है। 1947 में जनरल करियप्पा को बारामुला में भूख से ग्रस्त कश्मीरियों ने घेर लिया, और उनसे अनाज मुहैया कराने की मांग करने लगे। बारामुला ही नहीं, कश्मीर के दूसरे इलाके में राशन मुहैया कराने में जनरल करियप्पा ने देर नहीं की। बताते हैं, जनरल करियप्पा के नाम से बारामुला में आज भी एक पार्क है। यह वही भारतीय सेना है, जिसने बाढ़ग्रस्त कश्मीर में कितना कुछ किया था। आज ऐसा क्यों हुआ कि पत्थरबाजा से अपनी रक्षा के लिए मेजर गोगोई को 'ह्यूमन शील्ड' का इस्तेमाल करना पड़ा? इस विषय पर जिस तरह से राजनीति हुई, नुकसान किसका हो रहा है?

पहले सेना में कई बड़ी बातें हो जाती थीं, उसका पता तक नहीं चलता था। जनवरी 2017 में सीआईए ने एक करोड़ 30 लाख दस्तावेजों को 'डिक्लासिफाइड' (गुप्त सूची से हटा) कर उन्हें ऑन लाइन जारी कर दिया। अमेरिकी सरकार ने दस्तावेजों को 'डिक्लासिफाइड' करने का आदेश 1995 में दिया था। उन्हीं दस्तावेजों में से एक से पता चला कि जनरल करियप्पा को मार देने की साजिश सेना में रची गई थी, जिसके दोषी छह लोगों को फांसी दे दी गई थी। सीआईए के अधिकारी ने 'रिफ्ट इन ऑफिसर कोर्प्स इन इंडियन आर्मी' नाम से रिपोर्ट 12 जून 1950 को भेजी थी। जिसमें जानकारी दी गई कि तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा की छवि खराब करने, और उन्हें जान से मारने की साजिश में आरएसएस का हाथ था। रिपोर्ट के अनुसार, 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सेना में कुछ सिख अधिकारियों को नार्थ-साउथ के नाम पर जनरल करियप्पा के विरूद्ध भड़काया था। उन्हें इस आधार पर उकसाने की चेष्टा की गई थी कि त्रावणकोर (आज का केरल), मद्रास, और महाराष्ट्र के सेना अधिकारी जनरल करियप्पा के प्रति अधिक निष्ठा दर्शाते हैं।'

तत्कालीन सीआईए अधिकारी ने अपने तथ्यों को मजबूत करने के वास्ते 15 दिसंबर 1948 को भेजी एक और रिपोर्ट को आधार बनाया, जिसमें जनरल करियप्पा ने जोजिला, झांगर, पूंछ, द्रास और करगिल को पाकिस्तानी कबीलाई 'लश्करों' के कब्ज से मुक्त कराया था। जनरल करियप्पा उस समय वेस्टर्न कमांड के जीओसी (जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ) थे, और उनकी यूनिट में दक्षिण व पश्चिम भारत के अधिकारियों की संख्या ज्यादा थी। सेना की इस कार्रवाई में जनरल करियप्पा के साथ जो अफसर थे, उन्होंने उनका साथ दिया था। यह कार्रवाई तत्कालीन सेना अध्यक्ष सर रॉय बूचर के आदेशों के विपरीत थी। कश्मीर पर इस देश के नेता चाहे जिसे क्रेडिट दें, मगर सच यह है कि जनरल करियप्पा नहीं होते, तो आज कश्मीर का मानचित्र कुछ और होता। जनरल करियप्पा 15 जनवरी 1949 को आजाद भारत के प्रथम सेनाध्यक्ष बनाये गये थे।

सीआईए की इस 'डिक्लासिफाइड सूचना' की पुष्टि 21 साल पहले रिटायर जनरल करियप्पा के बेटे एयर मार्शल नंदा करियप्पा शायद नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा, 'मुझे याद है, हर राजनीतिक दल-जमात से उनके ठीक-ठाक संबंध थे, फिर कोई ऐसा क्यों करता?' एयर मार्शल (रिटायर्ड) नंदा करियप्पा लगता है, अपने पिता की तरह बड़ी-बड़ी बातों को पेट में रखना पसंद करते हैं। आज की तारीख में इतनी बड़ी साजिश पर तो राजनीतिक सुनामी हो जाता।

खैर! जनरल करियप्पा की जानिब से एक चर्चा और कर देना जरूरी है। फील्ड मार्शल अयूब खान आजादी से पहले जनरल करियप्पा के मातहत काम कर चुके थे। 1965 के युद्ध में फ्लाइट लेफ्टिनेंट नंदा करियप्पा के हंटर एयरक्राफ्ट को पाक सीमा में मार गिराया गया, और उन्हें बंदी बना लिया गया। उस समय जनरल करियप्पा मरकारा में थे। उनसे जनरल अयूब खान ने फोन पर पूछा कि आप कहें तो, आपके बेटे को छोड़ दूं। जनरल करियप्पा का जवाब था, 'आज से वह मेरा बेटा नहीं, देश का बेटा है। छोड़ना है, तो सबको छोड़ियेगा। और सुनिये, उसे कोई 'स्पेशल ट्रीटमेंट' मत दीजिए!' तो ये थे जनरल करियप्पा!

इस देश में दो ही सेना प्रमुख हुए, जिन्हें 'फाइव स्टार जनरल' से नवाजा गया। एक थे, जनरल करियप्पा और दूसरे जनरल मानिक शॉ! दोनों सार्वजनिक रूप से कितना सोच-समझकर बोलते थे, सेना के अभिलेखागार से उनके वक्तव्यों को पढ़ने पर समझ में आ जाएगा।

कल से ही सोशल मीडिया पर यह चर्चा क्यों गरम है कि इस देश में 'दूसरे जनरल वी.के. सिंह' तैयार किये जा रहे हैं? सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत पहले भी बोलते रहे, बल्कि लगातार बोलते रहे। फिर ऐसा क्या कह दिया? सेना की ओर से गुरुवार को बयान आया कि जनरल रावत ने कोई 'राजनीतिक बयान' नहीं दिया है। फिर, आने वाले दिनों में बाकी सेना अधिकारी भी ऐसे बयान दें, तो उसे राजनीतिक नहीं कहना चाहिए। पहले दरीचे थे, अब एक बड़ा सा दरवाजा खुल गया। बयान दागते रहिए।

दो दिनों से टीवी पर कुछ रक्षा विशेषज्ञ, सेना के अवकाश प्राप्त अधिकारी असम के शिक्षा व स्वास्थ्य मंत्री हेमंत विश्वशर्मा इस बात से मुग्ध दिखे कि जनरल रावत ने असम में इस्लाम के प्रवेश की जो जानकारी दी, वह अद्भुत थी। अरे भाई, ऐसी 'अद्भुत जानकारी' गुगल पर उपलब्ध है कि 1205 में बख्तियार खिलजी की सेना असम में आई, और तब से वहां पर मुसलमान अस्तित्व में आये। 'डीआरडीओ' की संगोष्ठी में जनरल रावत ने असम समेत पूर्वोत्तर में बंगलादेशी घुसपैठ पर चिंता व्यक्त की। उसमें चीन व पाक के हाथ होने तक जो बात की, उस सुरक्षा चिंता से कौन असहमत हो सकता है? सवाल यह है कि असम में घुसपैठ का फायदा किस राजनीतिक दल को मिला है, क्या यह एक सेना प्रमुख के वास्ते सार्वजनिक रूप से विश्लेषण का विषय है? ऐसी बातें 'मिल्ट्री इंटेलीजेंस' की गोपनीय फाइलों से गुजरते प्रतिरक्षा मंत्रालय, कैबिनेट सचिवालय तक ठीक लगती हैं।

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के 'कम्युनल एंगल', और मुस्लिम वोट बैंक को सेना प्रमुख ने जिस तरह से विषय बनाया, और इस पार्टी की सीटों में जबरदस्त रूप से इजाफे की तुलना बीजेपी से की, वह सत्ता पक्ष को जरूर सुहा रहा है। मगर, इस देश के सारे राजनीतिक दल, विश्लेषक उसे नीलकंठ की तरह निगल लें, यह संभव नहीं। तभी कांग्रेस के वीरप्पा मोइली ने कहा, 'जनरल रावत को राजनीतिक बयान देने से बचना चाहिए।' कांग्रेस या दूसरे दल भी बड़े नपे-तुले अंदाज में एक-एक शब्द रगड़-परख कर बोल रहे हैं, ताकि उन्हें 'राष्ट्रविरोधी'', 'सेना का मनोबल तोड़ने वाले' कहना आरंभ न हो जाए। यह किस तरह का माहौल है? ऐसा क्यों लगता है, जैसे सरकार ने सेना को अपने चारों ओर 'ह्यूमन शील्ड' के रूप में तैनात कर रखा है?

जनरल रावत यह क्यों भूल जाते हैं कि ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के तीन में एक सांसद हिंदू हैं। हिंदू बहुल लोकसभा क्षेत्र करीमगंज से 'एआईयूडीएफ' के सांसद का नाम राधेश्याम बिस्वास है। 2011 के असम विधानसभा चुनाव में 'एआईयूडीएफ' के 18 विधायक थे, जो 2016 के चुनाव में घटकर 13 हो गये। तो फिर 'एआईयूडीएफ' को मुस्लिम वोट बैंक से कहां धुआंधार फायदा हुआ? वह तो घट गया न जनरल साहब! इतनी भी गणित नहीं आती? अभयापुरी साउथ से अनंत कुमार मालो 'एआईयूडीएफ' के विधायक हैं, इस आधार पर इस पार्टी के अध्यक्ष बदरूद्दीन अजमल कहते हैं कि हमने हिंदुओं को भी टिकट दिया, तो उसपर भरोसा करना चाहिए।

1985 के 'असम एकार्ड' में राजीव गांघी की क्या भूमिका रही थी? उसकी चर्चा फिर कभी। पिछले महीने जिस हड़बड़ी में नागरिकता की पहली सूची नुमायां हुई, वह 'हड़बड़ी का विवाह कनपट्टी पर सिंदूर' जैसी ही थी। लेकिन असम में खेल सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक का नहीं हुआ है, हिंदू वोट बैंक का भी 'ग्रेट गेम' हुआ है। ऐसा नहीं होता, तो कछार, हाइलाकांडी, और करीमगंज जिसे 'बराक वेली' भी बोलते हैं, वहां बांग्ला को आधिकारिक भाषा बनाये जाने की घोषणा नहीं होती। बीसियों लाख बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता कानून में छेड़छाड़ कर उन्हें बसाने के वास्ते केंद्र सरकार जो खेल कर रही है, उसका विरोध दो वैचारिक ध्रुव पर बैठे ममता बैनर्जी और माणिक सरकार नहीं करते। सेना प्रमुख विपिन रावत को केवल बांग्लादेशी मुसलमान ही क्यों दिखे, बांग्लादेशी हिंदू क्यों नहीं दिखते?

देशबन्धु से

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