बैंकरों की ज्यादा मुनाफा बटोरने की मूलभूत मानसिकता पर राजन को कोई आपत्ति नहीं

यदि रघुराम राजन ही नोटबंदी के समय RBI गवर्नर होते और उन्हें समझा दिया गया होता कि इससे बैंकों के पास अतिरिक्त 2-3 लाख करोड़ रुपये आम लोगों के घरों से आ जायेंगे तो उनमें मोदी से कम उत्साह नहीं होता ! ...

हाइलाइट्स

भारत का आज का दुर्भाग्य यह है कि इस प्रकार के पेशेवर 'ठग और पैगंबरी के मिश्रण से तैयार हुए चरित्रों' के चौखटे में राजनेताओं ने भी अपने को जड़ लिया है। मोदी-जेटली की आम जनों के दुख-दर्दों के प्रति निष्ठुरता इसी का प्रमाण है।

अरुण माहेश्वरी

...2008 के सबप्राइम संकट के पहले रघुराम राजन ने उस संकट को इसलिये नहीं देख लिया था कि पूंजीवाद अति-उत्पादन, अराजकता और मुनाफे की सामान्य दर की गिरावट के अपने आंतरिक संकट में फंस चुका है और एक पूंजीवादी जनतांत्रिक व्यवस्था में इसके सामाजिक प्रभावों को टालने की राजनीतिज्ञों की अब तक की सामाजिक सुरक्षा कवच वाली कोशिशें विफल साबित होने लगी, राज्य के पास संसाधनों का टोटा पड़ने लगा था। इसके बजाय राजन की दृष्टि इस बात पर थी कि क्यों अमेरिकी सरकारें, वह भले बुश की रही हो या क्लिंटन की, आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये उन्हें अधिक से अधिक उधार उपलब्ध कराके उनके जीवन के साथ ही अर्थ-व्यवस्था में सुधार की भी मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ रही हैं। ऐसे-ऐसे लोगों को अपने घर के लिये बिल्कुल आसान शर्तों पर उनकी हैसियत की बिना सही जानकारी के उधार दे रही है जो कभी भी उस उधारी को चुका नहीं पायेंगे। उन्हें बैंकरों की ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरने की मूलभूत मानसिकता पर कोई खास आपत्ति नहीं है क्योंकि इसे तो वे बैंकरों का धर्म मानते हैं, उनके शब्दों में दैनंदिन बैंकिंग के उबाऊ काम में कुछ अतिरिक्त मनोरंजन, और जब खुद सरकार उन्हें यह मौका दे रही है तब तो उस रास्ते पर न चलना और उसका लाभ न उठाना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं होगा। न उन्हें बैंकरों के द्वारा मनमाने तरीके से अपने वेतन और भत्तों को बढ़ाने में कोई नैतिक गड़बड़ी दिखाई देती है। उनकी दृष्टि की क्षुद्रता यहां तक है कि वे रोजगार-विहीन विकास की समस्या का समाधान भी वित्त बाजार में लेखाकारों, वकीलों आदि की गतिविधियों में वृद्धि में देखते हैं। अन्य जन-कल्याणकारी सोच से जुड़े बुद्धिजीवी जिन चीजों को जीवन की समस्याओं के मूल में देखते हैं, राजन उन्हें ही समस्या का समाधान मानते हैं। अन्य लोग आदमी की मुक्ति उसे पूंजी की बेड़ियों से मुक्ति में देखते हैं, तो राजन पूंजी की गुलामी की और ज्यादा जकड़बंदी में।

उनकी पुस्तक 'Fault Lines’ में एक अध्याय है — उन्हें उधार को खाने दो (Let them eat credit)। जनतंत्र में जनता के हितों की सार्वभौमिकता को मानने की वजह से हर सरकार का दायित्व होता है कि वह किसी भी सामाजिक विकास के कारण जन-जीवन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव से आम लोगों की रक्षा करे। जैसा कि हमने पहले ही बताया है कि अमेरिका में बैंकों की उधार के रुख को थोड़ा आम लोगों की ओर मोड़ कर उनके जीवन में राहत देने की कोशिश की गई थी जिसे राजन की तरह के लोग सबप्राइम संकट का मुख्य कारण मानते हैं। इस अध्याय में उनका यह नजरिया पूरी तरह से खुल कर सामने आया है।

कुल मिला कर हम यह पूरे दावे के साथ कह सकते हैं कि यदि रघुराम राजन ही नोटबंदी के समय रिजर्व बैंक के गवर्नर होते और यदि उन्हें किसी प्रकार यह समझा दिया गया होता कि इससे बैंकों के पास अतिरिक्त 2-3 लाख करोड़ रुपये आम लोगों के घरों से आ जायेंगे तो उनमें यह कदम उठाने के लिये मोदी से कम उत्साह नहीं होता ! सिर्फ इतना ही नहीं, राजन की किताबों से यह साफ है कि उन्हें यदि इस बात का ही अनुमान होता कि इस प्रकार के किसी कदम से बैंकों को आम लोगों का धन किसी भी वक्त अपने पास अटका कर रखने का अधिकार मिल जायेगा, तब वे और भी उत्साह के साथ इसका खुल कर समर्थन करते, जैसा उर्जित पटेल ने भी इसके प्रति अपने मौन समर्थन से किया।

भारत का आज का दुर्भाग्य यह है कि इस प्रकार के पेशेवर 'ठग और पैगंबरी के मिश्रण से तैयार हुए चरित्रों' के चौखटे में राजनेताओं ने भी अपने को जड़ लिया है। मोदी-जेटली की आम जनों के दुख-दर्दों के प्रति निष्ठुरता इसी का प्रमाण है।

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