कोरेगांव हिंसा की लीपापोती में क्यों लग गए बीजेपी के दलित सांसद ? और मोदी जी चुप क्यों हैं ?

महाराष्ट्र और गुजरात में बुनियादी फ़र्क़ यह है कि यहाँ दलितों को दबा नहीं सकते. बीजेपी के दलित सांसदों को लगता है, लोकसभा में लीपापोती कर मामला ख़त्म कर देंगे. मगर, ऐसा हुआ नहीं....

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मोदी जी चुप क्यों हैं ? कम से कम राष्ट्रपति को दलितों से शांति की अपील करना चाहिए !

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कोरेगांव हिंसा की लीपापोती में क्यों लग गए बीजेपी के दलित सांसद ?

बीजेपी के 40 दलित सांसद हैं. कोरेगाव हिंसा पर उनमे से एकाध के बयान टीवी पर सुना. ये नेता लोग दलित उत्पीड़न का इतिहास-भूगोल पर गोल-गोल बयान देते दिखे, मगर "हिन्दू एकता मोर्चा" और फडणवीस सरकार की ज़िम्मेदारी पर बोलने से किनारा कर गए.

एनडीटीवी पर जेएनयू वाले मेरे मित्र और लोकसभा सांसद डॉ. उदित राज इसी लाइन पर कांग्रेस सरकार के समय दलित उत्पीड़न को कोस रहे थे. मगर एक शब्द फडणवीस के खिलाफ नहीं कहा. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के मंत्री रामदास अठावले ने बस इतना कहा, "जांच होनी चाहिए".

1 जनवरी 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पेशवा बाजीराव की सेना को मात दी थी। इस लड़ाई में कुछ संख्या में ऐसे महार दलित भी थे, जिन्होंने अंग्रेजों की तरफ से लड़ाई लड़ी थी। पहली जनवरी को अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए महाराष्ट्र के पुणे में कोरेगांव भीमा में दलित समुदाय के लोग जुटे. वहां हिन्दू एकता मोर्चा के लोगों और दलितों में संघर्ष हुआ, जिसमें एक दलित युवक की मौत हो गई।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि कोरेगांव हिंसा की न्यायिक जांच होगी, मृतकों के परिवार को 10 लाख का मुआवजा दिया जाएगा।

महाराष्ट्र में दलितों का गुस्सा कौन भड़का रहा है ? शिवसेना का इरादा क्या है ?

महाराष्ट्र और गुजरात में बुनियादी फ़र्क़ यह है कि यहाँ दलितों को दबा नहीं सकते. बीजेपी के दलित सांसदों को लगता है, लोकसभा में लीपापोती कर मामला ख़त्म कर देंगे. मगर, ऐसा हुआ नहीं.

राम बिलास पासवान बाइट दे रहे थे- " क्या कहते हैं कि नया जेनरेशन अब बर्दाश्त नहीं करने वाला !"

शिवसेना ने भी सरकार पर सवाल उठाया है. क्या शिवसेना आग में घी डाल रही है?

महाराष्ट्र के मंत्री सुबह से चुप हैं, पुलिस मूक दर्शक बनी हुई है. देश की आर्थिक राजधानी को ज़बरदस्त नुकसान होने जा रहा है. दिल्ली के महाराष्ट्र सदन पर भी प्रदर्शन हो रहा है, जिसमे IFTU के कार्यकर्ता और आइसा के छात्र शामिल हैं.

मुंबई, पुणे में तोड़-फोड़ दहशत का माहौल है. जगह-जगह चक्का जाम, जुलुस-प्रदर्शन का मंज़र है. जो लोग साजिश कर इसका राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं, उन्हें आम लोगों की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं.

मोदी जी चुप क्यों हैं ? कम से कम राष्ट्रपति को दलितों से शांति की अपील करना चाहिए !

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