यात्रियों की मौत उन्हें खींचकर ले गई, सरकार का क्या कसूर ?

नेहरू, गांधी की बात छोड़ें, पटेल को भी किनारे करें, मोदीजी के सपनों के न्यू इंडिया पर फोकस करें. विकास तो हासिल उसी से होगा...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

अब सरकार का भी क्या कसूर। उसे बुलेट ट्रेन चलाने, समुद्र में शिवाजी की मूर्ति खड़ी करने, स्मार्ट सिटी बनाने के लिए अरबों रुपये चाहिए हैं। इन्हीं सब से तो भारत पूरी तरह खत्म होगा और न्यू इंडिया जन्म लेगा।...

भारत रत्न, राज्यसभा सांसद सचिन तेंदुलकर ने भी नए फुटओवर ब्रिज बनाने की आवश्यकता बताई थी, तो 2016-17 में पांच नए फुटओवर ब्रिज बनाने का आश्वासन तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने दिया था।

मुंबई के एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन के पुल पर दशहरे से एक दिन पहले भगदड़ मच गई और 23 लोग मर गए। आप कह सकते हैं, इसमें कौन सी बड़ी बात है। इतना बड़ा देश है, इतनी सघन आबादी है, उसमें कहीं न कहीं, कोई न कोई हादसा होता ही रहता है और मौत का क्या है, जब बुलावा आ जाए, जाना ही पड़ता है। अब यह तो मरने वालों का दुर्भाग्य था कि वे उस समय उस पुल पर थे, जब भगदड़ मची।

लेकिन यह तो मानवनिर्मित आपदा थी, इसमें भाग्य को क्यों जोड़ा जाए?

अरे भाई, जब बिजली लाने के लिए सौभाग्य का इस्तेमाल होता है, तो हादसे के लिए दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें? देखो, उन 23 लोगों की मौत उन्हें वहां खींचकर ले गई थी। वर्ना रोजाना हजारों लोग मुंबई की लोकल में सफर करते हैं, जिसमें छह-सात लोगों को छोड़कर सब सही-सलामत घर पहुंच जाते हैं। करोड़ों की जनसंख्या में छह-सात लोगों का मरना, कोई बड़ी समस्या तो है नहीं, जिसके लिए रेलवे को दोषी ठहराया जाए। हां, इस बार मरने वाले तीन गुना ज्यादा हैं, तो इसे दुर्घटना कहना सही है और देखो हमारे शासकों की संवेदनशीलता, हादसा होते ही नए पुल का टेंडर निकाल दिया। यूं ऐसे किसी हादसे की घंटी बहुत लंबे समय से बज रही थी।

मुंबई में पश्चिम और मध्य रेलवे दादर और एलफिंस्टन स्टेशनों पर जुड़ते हैं। दादर में तो सुविधाएं बेहतर हैं, लेकिन एलफिंस्टन अब भी उपेक्षित है। लार्ड एलफिंस्टन के नाम पर 1867 में शुरु हुआ यह रेलवे स्टेशन हमारे राष्ट्रप्रेमी शासकों को शायद विदेशी गुलामी की याद दिलाता था, इसलिए 2016 में महाराष्ट्र सरकार ने इसका नाम प्रभादेवी करने का प्रस्ताव दिया था और रेलवे ने इसे मंजूर भी कर लिया था। नाम बदलने की प्रक्रिया अभी चल रही है।

गनीमत है कि नाम अभी बदला नहीं वरना हादसे का दोष भारतीय नाम पर आ जाता, अभी तो अंग्रेजों पर ही इसका ठीकरा फोड़ने की गुंजाइश है। वैसे महान अंग्रेजी लेखक शेक्सपियर ने ही कहा था कि नाम में क्या रखा है। वे भारत में होते तो उन्हें पता चलता किनाम में ही सब कुछ रखा है।

एलफिंस्टन का नाम बदलने की प्रक्रिया शुरु करने में वक्त नहीं लगा, लेकिन हालात बदलने की जल्दी किसी को नहीं थी। शायद प्रशासन ऐसी ही किसी बड़ी घटना के इंतजार में था। इस स्टेशन के बेहद संकरे और पुराने फुटओवर ब्रिज पर दिन-ब-दिन यात्रियों की संख्या बढ़ती जा रही थी। इसलिए यात्री लंबे समय से पुल के चौड़ीकरण या नया पुल बनाने की मांग कर रहे थे। यहां तक कि भारत रत्न, राज्यसभा सांसद सचिन तेंदुलकर ने भी नए फुटओवर ब्रिज बनाने की आवश्यकता बताई थी, तो 2016-17 में पांच नए फुटओवर ब्रिज बनाने का आश्वासन तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने दिया था। लगभग 12-13 करोड़ रुपयों में यह काम हो जाता, अगर सरकार और रेल मंत्रालय वाकई आम यात्रियों की सुविधाओं के लिए फिक्रमंद रहते। लेकिन बजट का रोना रोकर इस काम को टाला गया।

अब सरकार का भी क्या कसूर। उसे बुलेट ट्रेन चलाने, समुद्र में शिवाजी की मूर्ति खड़ी करने, स्मार्ट सिटी बनाने के लिए अरबों रुपये चाहिए हैं। इन्हीं सब से तो भारत पूरी तरह खत्म होगा और न्यू इंडिया जन्म लेगा

नेहरू, गांधी की बात छोड़ें, पटेल को भी किनारे करें, मोदीजी के सपनों के न्यू इंडिया पर फोकस करें. विकास तो हासिल उसी से होगा। रही बात इस हादसे की, तो उसके लिए मुआïवाजे की घोषणा, जांच की औपचारिकता भी निभा ली जाएगी। अभी तो इस पर राजनीति करने का मौका हाथ लगा है, तो पहले उसे ही भुनाया जाए। इस बार रेल मंत्रालय ने दशहरा नहींमनाया, उसे यात्रियों के मरने का शोक है। वैसे यही तरीका आजमाया जाए, तो अब तक की रेल दुर्घटनाओं के हिसाब से मंत्रालय एक भी त्योहार नहीं मना पाएगा।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तो बाकायदा बुराई के प्रतीक रावण का अपने धनुष से खात्मा किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्थापना दिवस मना और देश भर में शस्त्र पूजा भी धूमधाम से हुई। 23 लोग मर गए तो मर गए, उनके साथ कुछ और जिंदगियां तबाह हो गईं तो हो गईं, रावण मारने का मौका तो साल में एक बार ही मिलता है, उसे क्यों छोड़ा जाए? बुराई खत्म होगी, तभी तो देश में अच्छे दिन आएंगे।

देशबन्धु का संपादकीय साभार

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