सवालों के जवाब देने से बचने की सुविधा के लिए "डर" नाम का हथियार

विद्यार्थी को असफल होने का डर दिखाया जाता है, व्यापारी को घाटे का, महिलाओं को इज्जत का, सेहतमंद को बीमार होने का और बीमार को मरने का डर दिखाया जाता है। ...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी जैसे लोगों ने इन्हीं बुरी ताकतों से समाज को बचाना चाहा था। लेकिन उन्हें मार दिया गया। अब यह समाज को तय करना है कि उनकी मौत को व्यर्थ जाने दे या बिना सिर-पैर की अफवाहों से डर कर डराने वालों को सफल होने दे। 

डर का हथियार

आदमी के द्वारा आविष्कृत सबसे बड़े हथियार का नाम है, डर। आदिम काल से ही इंसान ने दूसरों पर काबू पाने के लिए डर का इस्तेमाल किया। जब विज्ञान की समझ विकसित नहीं हुई थी तो प्रकृति का डर लोगों में भरा था, जिसका परिणाम यह हुआ कि पेड़-पौधों से लेकर सूर्य-चंद्रमा, ग्रहों और नदी-तालाबों की पूजा होने लगी। शुरु में इसमें आदर भाव था, बाद में केवल अंधविश्वास का भाव स्थायी हो गया। प्रकृति का विज्ञान समझ में आ गया, लेकिन अंधविश्वास दूर नहींं हुआ। शायद इसी मनोवृत्ति को कुछ चतुर-सुजान लोगों ने समझकर सदियों तक अपना वर्चस्व स्थापित करने की चाल चली और देश में जातिप्रथा की जड़ें फैलती गई। एक जाति, दूसरी जाति से डरती रहे, एक धर्म, दूसरे धर्म से खौफ खाता रहे, इसी में कुछ लोगों की स्वार्थपूर्ति होती है और शेष समाज उसका खामियाजा भुगतता है।

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जब ऐसा लगता है कि समाज आगे बढ़ रहा है, या उसमें चेतना फैल रही है या लोग अपने हक के लिए जागरूक हो रहे हैं, या उनका ध्यान सत्ता, धन की शक्ति से संपन्न लोगों की चालाकियों पर जा रहा है, फौरन डर के प्रसार की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। सवालों के जवाब देने से बचने की सुविधा के लिए डर नाम का हथियार बड़े काम आता है।

विद्यार्थी को असफल होने का डर दिखाया जाता है, व्यापारी को घाटे का, महिलाओं को इज्जत का, सेहतमंद को बीमार होने का और बीमार को मरने का डर दिखाया जाता है। जिनके पास डरने का कोई कारण नहींहोता, उन्हें परलोक बिगड़ने से डराया जाता है। जितने तरह के डर होंगे, बाजार में दुकानें भी उतनी तरह की खड़ी होंगी।

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भारतीय बाजार में हम देखते ही हैं कि नींंबू-मिर्ची से लेकर काली चोटी बुरी नजर से बचने के लिए खूब बिकती हैं। लेकिन तरह-तरह के कोचिंग संस्थान, निजी बीमा कंपनियों का व्यापार, महंगे अस्पताल, ओझाओं, तांत्रिकों, बाबाओं के आश्रम इनका धंधा भी डर नामक हथियार के दम पर ही चलता और फलता-फूलता है।

बाजार को शायद इस वक्त फिर अधिक मुनाफा देने वाले व्यापार की जरूरत पड़ गई है, या समाज में किसी किस्म की जागरूकता की सुगबुगाहट नजर आ रही है, तो एक नया डर खड़ा कर दिया गया, चोटीकटवा का।

डर की सवारी अफवाह होती है, जिसकी गति शायद कवि के मन से भी अधिक होती है।

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उत्तरभारत के बड़े हिस्से में अफवाह फैली हुई है कि कोई अज्ञात शक्ति महिलाओं की चोटी काट रही है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, हरियाणा, दिल्ली के कई हिस्सों से चोटी कटने-काटने की खबरें आ रही हैं, जिनके कारण 24 घंटे चलने वाले चैनलों की व्यस्तता और बढ़ गई है। चोटी काटने इंसान आता है या पक्षी अभी इस पर खबरों का बाजार गर्म है। यह देखना रोचक है कि ऐसा करने वाले को केवल लड़कियों की चोटी दिख रही है, लड़कों के बाल नहीं।

 बहरहाल, इस नए डर का असर यह हो रहा है कि कहीं हेलमेट पहन कर लड़कियां सो रही हैं, कहीं कपड़ा बांध कर। आगरा में तो एक वृद्धा को चोटी काटने के शक में पीट-पीट कर मार दिया गया। मारने वाले यही मानते होंगे कि ऐसा काम कोई महिला ही कर सकती है।

इस पूरे प्रकरण में यह नजर आ रहा है कि इस अफवाह का निशाना महिलाएं ही हैं।

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महिलाओं का आगे बढ़ना, जागरूक होना पुरुषप्रधान समाज को कई बार खटकता है। क्या इस बार तकलीफ इतनी बढ़ गई है कि उन्हें चोटी काटने के नाम पर आतंकित किया जाए?

वैसे भारत में अफवाहों का धंधा पहले से जमा-जमाया है और इसका लाभ उठाने वाले जानते हैं कि कब, कौन सी अफवाह से फायदा मिलेगा।

याद करें 21 सितम्बर 1995 का दिन, जब गणेश की मूर्ति को अफवाहों के दम पर दूध पिला कर दिखा दिया गया था। बिना सोशल साइट्स के, पूरे देश में एक ही दिन ऐसी अफवाह फैल गई, तो अनुमान लगा लीजिए कि अफवाहखोरों का सूचना और प्रसार विभाग कितना ताकतवर है। उस दिन गणेश जी को इतना दूध पिला दिया गया किआज 22 साल हो गए, उन्हें फिर दूध पीने की जरूरत नहीं हुई।

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मूर्ति को दूध पिलाने की अफवाह के सफल प्रयोग से फिर मुंह नोचवा, मंकी मैन आदि का सृजन हुआ। कुछ रातों तक लोगों को डरा कर ये न जाने किस बिल में छिप गए। अब चोटीकटवा नामक नए जीव के बारे में बातें फैलाई जा रही हैं। जब तक लोग इसके आतंक में रहेंगे और बचने के लिए नए-नए उपायों के बारे में सोचते रहेंगे, तब तक शायद देश में कोई बड़ा काम चुपके-चुपके कर लिया जाएगा और समाज को इसकी भनक भी नहींलगेगी। जब अफवाह के बूते डर फैलाने वालों का मकसद पूरा हो जाएगा तो चोटीकटवा भी विलुप्त प्राणी हो जाएगा। याद रखें कि अफवाहें नफरत करने वालों द्वारा गढ़ी जाती हैं, मूर्खों के द्वारा फैलाई जाती हैं और बेवकूफों के द्वारा स्वीकार की जाती हैं।

नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी जैसे लोगों ने इन्हीं बुरी ताकतों से समाज को बचाना चाहा था। लेकिन उन्हें मार दिया गया। अब यह समाज को तय करना है कि उनकी मौत को व्यर्थ जाने दे या बिना सिर-पैर की अफवाहों से डर कर डराने वालों को सफल होने दे। 

देशबन्धु का संपादकीय

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