छत्तीसगढ़ : पनामा पेपर्स पर कांग्रेस की सफलता, ढाई दिन में समेटा विधानसभा सत्र

पनामा पेपर्स जलता हुआ मुद्दा कांग्रेस के सामने है किंतु इससे परे जाकर वह विधानसभा सत्र को मुद्दा बना रही है, जिससे जनमानस का कोई सीधा सरोकार नहीं है।...

India Writers

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति

रायपुर, 06 अगस्त 2017

प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में थोड़ा आत्मविश्वास बढ़ा है। विधानसभा के मानसून सत्र में उनके परफारमेंस की ही परिणाम था कि राज्य सरकार को महज ढाई दिनों में ही सदन की कार्यवाही को समेटना पड़ गया। कांग्रेस ने मेहनत की परंतु अंतिम समय बाजी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने मार ली। पिछले दिनों कई ऐसी घटनाएं हुईं जो कम से कम सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में नहीं थी जिसमें प्रमुख मामला मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का था लेकिन कांग्रेस उसे भुना नहीं पाई।

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सत्तारूढ़ दल की तरफ से कांग्रेस को रोज कोई न कोई मुद्दा जरूर मिल जाता है लेकिन खुद में उलझी कांग्रेस उसे जनांदोलन में तब्दील करने में असफल रही है। मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के मुद्दे पर जनांदोलन खड़ा करने की जरूरत थी, लेकिन अब वह ढाई दिनों में विधानसभा का सत्र खत्म करने के मुद्दे पर सरकार से उलझ गई। राज्यपाल के पास बात नहीं बनी तो अब वह दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी में जुट गई है।

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निश्चित रूप से सदन की कार्यवाही को ढाई दिनों में समेटने को सरकार का लोकतांत्रिक कदम नहीं माना जा सकता है लेकिन कांग्रेस को सरकार से लडऩे के लिए रणनीति को बनानी चाहिए। उसे प्राथमिकता तय करनी चाहिए कि किस लड़ाई का स्वरूप कैसा होगा और उसको कहां तक लड़ा जाएगा।

मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का मुद्दा ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। संसदीय कार्यमंत्री खुले आम कहते रहे कि सदन के अंदर अगर कोई उनसे असंतुष्ट होगा तो वे उसका मुंह तोड़-फोड़ देंगे,  पर कांग्रेस ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पनामा पेपर्स जलता हुआ मुद्दा कांग्रेस के सामने है किंतु इससे परे जाकर वह विधानसभा सत्र को मुद्दा बना रही है, जिससे जनमानस का कोई सीधा सरोकार नहीं है।

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राजधानी में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मेला लगा हुआ है। कोटवार खुद को सरकारी सेवक घोषित करने की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं और शिक्षाकर्मियों ने भी सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रखा है। ये तीनों वह वर्ग हैं जो किसी भी राजनीतिक दल की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि इनकी पहुंच गांवों तक ही नहीं बल्कि हर मतदान केंद्र तक है। सरकार के खिलाफ उनकी नाराजगी को भुनाने की आवश्यकता है। लाखों की संख्या में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षाकर्मी और कोटवार जिसके साथ खड़े हो जाएंगे, उसकी सरकार बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। लेकिन प्रदेश कांग्रेस में रणनीतिकारों का भीषण संकट है। ऐसा कोई भी स्वीकार्य नेता नहीं है, जो इस वोट बैंक को कांग्रेस के पक्ष में करने की क्षमता रखता हो। कांग्रेस के अधिकतर नेता खुद को एलिट क्लास का मानते हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षाकर्मियों और कोटवारों के पास जाकर उनकी मांगों का समर्थन करना खुद की शान के खिलाफ समझते हैं और कांग्रेस नेताओं के इसी रुख के कारण सरकार सुविधाजनक स्थिति में रहती है।

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कांग्रेस के बड़े नेता अगर इन आंदोलनकारियों की पीठ पर हाथ रख दें तो फिर उसके बाद उन्हें कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि मतदाताओं का एक निर्णायक वर्ग उनके साथ होगा परंतु कांग्रेस नेताओं को तो दिल्ली में अपने आकाओं के सामने शक्ति प्रदर्शन करने की पड़ी हुई है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षाकर्मी और कोटवार जाएं भाड़ में…वे अपनी समस्याओं से खुद निपटें, कांग्रेस को तो दिल्ली में दिखाना है कि उन्होंने प्रदेश की भाजपा सरकार को परेशान कर रखा है।

अब तक इलेक्शन मोड पर नहीं आई है कांग्रेस

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भाजपा की तरह कांग्रेस अब तक इलेक्शन मोड पर नहीं आई है। वह सरकार का परम्परागत विरोध कर रही है। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के पास इतना वक्त नहीं है कि वे चुनाव की तैयारी शुरू कर दें। एक तरह से वे ठीक भी कर रहे हैं क्योंकि कांग्रेस में अंतिम क्षण तक प्रत्याशी तय नहीं होता है इसलिए अभी से मेहनत करने का कोई औचित्य नहीं है। यह बात अलग है कि पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस बार कह गए हैं कि टिकट के लिए अब किसी को दिल्ली के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि कांग्रेस ने तय किया है कि चुनाव से छह महीने पहले प्रत्याशी घोषित कर दिए जाएंगे। प्रदेश कांग्रेस के लिए तो यह स्थिति अधिक विकट होगी क्योंकि जिनको टिकट नहीं मिलेगी, उन्हें रायता फैलाने के लिए पर्याप्त वक्त मिल जाएगा।

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बहरहाल कांग्रेस को अपनी कार्यशैली में परिवर्तन करने की जरूरत है। पार्टी के नेताओं को बैठकर रणनीति बनानी होगी, जिम्मेदारियों का बंटवारा करना होगा और जवाबदेही तय करनी होगी अन्यथा आर्थिक संकट से जूझ रही कांग्रेस प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के सामने टिक नहीं पाएगी और फिर अगले पांच साल फिर विपक्ष में बैठना होगा। आरोप लगाने होंगे, घेराव करना होगा और मामले-मुकदमों से जूझना होगा।

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