पद्मावती : आज स्वयं को झुठलाता और अपने से मुंह चुराता नजर आ रहा है भारत

हम प्लासी की तीनों लड़ाइयां क्यों हारे? हम पानीपत की लड़ाई क्यों हारे? हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में क्यों पराजित हुए?...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

भारत आज स्वयं को झुठलाता और अपने से मुंह चुराता नजर आ रहा है। इसका कारण संभवत: यही है कि जैसी वैचारिक कायरता और शून्यता आज उत्तर से लेकर दक्षिण व पूर्व से लेकर पश्चिम, संपूर्ण भारत में फैली है वैसी पहले कभी भी नहीं थी। सती प्रथा पर प्रतिबंध से लेकर वर्तमान में सती महिमामंडन तक का करीब दो सौ वर्षों का यह सफर बेहद रोमांचक व चुनौतीपूर्ण रहा है....

अतीत नहीं वर्तमान में खोजिए

चिन्मय मिश्र

भारतीय समाज बहुत पुराना और जटिल है। प्रचलित अनुमान के अनुसार पांच हजार वर्ष पूर्व की पहली ज्ञात सभ्यता के समय से आज तक लगभग पांच हजार वर्षों की अवधि इस समाज में समाहित है। इस लंबी अवधि में विभिन्न प्रजातीय लक्षणों वाले और विविध भाषा परिवारों के आप्रवासियों की कई लहरें यहां आकर इतनी आबादी में घुलमिल गईं और इस समाज की विविधता, समृद्धि और जीवंतता में अपना-अपना योगदान दिया।'

-श्यामाचरण दुबे

भारत आज स्वयं को झुठलाता और अपने से मुंह चुराता नजर आ रहा है। इसका कारण संभवत: यही है कि जैसी वैचारिक कायरता और शून्यता आज उत्तर से लेकर दक्षिण व पूर्व से लेकर पश्चिम, संपूर्ण भारत में फैली है वैसी पहले कभी भी नहीं थी। सती प्रथा पर प्रतिबंध से लेकर वर्तमान में सती महिमामंडन तक का करीब दो सौ वर्षों का यह सफर बेहद रोमांचक व चुनौतीपूर्ण रहा है। यदि कोई और समय होता तो निश्चित तौर पर यह बहस होती कि रानी पद्मावती को जौहर करने के लिए क्यों विवश होना पड़ा? इसके लिए अलाउद्दीन खिलजी और राजपूतों के बीच हुआ युद्ध ही क्या एकमात्र कारण था? क्या सामान्य परिस्थितियों में महिलाएं स्वयं को अग्नि को समर्पित नहीं कर देती थीं? क्या आठवीं शताब्दी पूर्व की एक घटना की प्रस्तुति जिससे कि समाज का एक वर्ग सहमत नहीं है, (वह भी उस फिल्म को देखे बिना और सेंसर से पारित हुए बिना) तो उससे इस देश के सांस्कृतिक परिदृश्य और सामाजिक ताने-बाने के टूट जाने का खतरा पैदा हो जाएगा? ऐसी परिस्थिति में क्या प्रमुख राजनीतिक दल अपनी वैचारिक शून्यता का परिचय दे, रेत में सिर छुपा लेंगे और तूफान के गुजर जाने का रास्ता देखेंगे? इस घटना ने इतने प्रश्न खड़े कर दिए हैं कि अब उत्तर की भी गुंजाइश नहीं बची है। प्रश्नों की शृंखला निर्बाध जारी है, हम अपने एक प्रश्न का जवाब ढूंढ भी नहीं पाते हैं कि उसी प्रश्न में से एक प्रतिप्रश्न खड़ा हो जाता है और आगे की राह रोक लेता है।

राजपूती आन बान और शान वालों क्या गरीब राजपूतों की भी सुध ली जाएगी?

इतिहासविज्ञ एम.एन. राय अपनी पुस्तक 'दि हिस्टोरिकल रोल आफ इस्लाम' में लिखते हैं,'संसार की कोई भी सभ्य जाति इस्लाम के इतिहास से उतनी अपरिचित नहीं है जितने हिन्दू हैं और संसार की कोई भी जाति इस्लाम को उतनी घृणा से नहीं देखती, जितनी घृणा से हिन्दू देखते हैं।'

इस पर दिनकर ने लिखा है कि राय महोदय ने जो बात लिखी है, वह एक अंश में भारत के मुसलमानों पर भी लागू है, क्योंकि इस देश के मुसलमानों में भी इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और इसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत छिछला रहा है। वहीं इस मामले में स्वामी विवेकानंद ने 'भारत का भविष्य' में लिखा है, 'मुसलमानों की भारत पर विजय पददलितों व गरीबों के लिए मुक्ति की तरह आई। इसी वजह से हमारे एक बटा पांच (20 प्रतिशत) लोग मुसलमान हो गए। केवल तलवार ने ही यह सब नहीं किया है।' गौरतलब है अपने जन्म के अस्सी वर्ष के भीतर भारत में इस्लामी शासन स्थापित हो चुका था। दूसरी ओर वह अटलांटिक महासागर भी पार कर चुका था।

अभिव्यक्ति की आजादी पर नए खतरे

मुहम्मद साहब का जन्म 570 ईस्वी में और मृत्यु 632 ई. में हुई। सन् 622 ईस्वी में उन्होंने मक्का छोड़ मदीने की हिजरत की और यही वर्ष वास्तव में इस्लाम के आरंभ का वर्ष माना जाता है।  700 ईस्वी में  इस्लाम इराक, ईरान और मध्य एशिया तक पहुंच गया और सन् 712 ईस्वी में सिंध मुसलमानों की अधीनता में चला गया और उसी साल यूरोप में स्पेन में भी मुस्लिम शासन स्थापित हो गया था। अब एक और ऐतिहासिक तथ्य पर भी गौर करिए। हम जिस खूंखार मंगोल शासक को चंगेज खान के नाम से जानते हैं, उसका मूल नाम चिङ्-हिर हान (मृत्यु 1155 ई.) था। हान या खान एक सम्मानसूचक शब्द था। वस्तुत: चंगेजखां बौद्ध था।

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इस्लामी शासन के भारत में आने के करीब 600 सौ वर्ष पश्चात अलाउद्दीन खिलजी, जिसकी पैदाइश भी हिन्दुस्तान में हुई थी, का शासन भारत पर होता है और उसके शासन के करीब 800 वर्ष बाद हम उसके कुकृत्यों-कृत्यों पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विचार कर रहे हैं और एक किस्म का निरर्थक आक्रोश पूरे देश में फैला रहे हैं। इस एक पक्षीय आक्रामकता के बेहद खतरनाक परिणाम हो सकते हैं; जिनकी बानगी हमने देख भी ली है। आजादी के संघर्ष के दौरान भारत में नए तरह का धार्मिक सामंजस्य बना और विभाजन की वजह से उसमें दरार भी पड़ी। परंतु कभी भी भारत इस प्रकार से आक्रामक नहीं हुआ कि दूसरा पक्ष दहशत की वजह से डर कर कबूतर की तरह अपनी आंख बंद कर लें और स्वयं को परिस्थिति के भरोसे छोड़ दें। वहीं यह भी गौर करना आवश्यक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन की महज सांप्रदायिक उन्माद तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यदि फिल्मों की ही बात करें तो गोवा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में मराठी फिल्म 'न्यूड' व मलयाली फिल्म 'एस. दुर्गा' का प्रदर्शन रोका जाता। पेरुमल के उपन्यास को लेकर उठा उन्माद या पहले सल्मान रुश्दी के उपन्यास सेनेटिक वर्सेस पर लगी रोक बता रहे हैं कि यह असहिष्णुता भारतीय समाज की विविधता में एकता की नींव को ही हिला देना चाहती है। पद्मावती नामक फिल्म और राजपूत नामक समुदाय इस शतरंज के महज बैठे कठपुतली के मानिंद पूरे समाज को नचा रहे हैं। सिर्फ यह जान लेने भर से कि कौन यह कर रहा है, स्थितियां नहीं सुधरेंगी। समाज को सक्रियता से इस आसन्न संकट को समझना होगा। अपने समय के उदाहरण ही सामने रखने होंगे।

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परंतु वास्तविकता यह है कि हम अब समाधान तलाशने के लिए ऐतिहासिक समय का भी सहारा न लेकर मिथकीय काल में लौट जाना चाहते हैं। हमें चित्तौड़ का जौहर तो याद रहता है परंतु हमारे समय में हुआ देवराला सती प्रसंग हम भूलना चाहते हैं। वो सारा समाज रोज हो रहे बलात्कारों को लेकर चुप्पी साधे है। विचार करिए संजय लीला भंसाली द्वारा पद्मावती फिल्म बनाने की घोषणा के पहले क्या कभी उन्हें 'राष्ट्रमाता' का दर्जा देने की बात हुई। नब्बे के दशक में श्याम बेनेगल ने महान सीरियल 'भारत एक खोज' में इस विषय को संक्षेप में उठाया था, तब बवाल क्यों नहीं उठा? सोचना होगा कि किसी चुनाव के पहले पूरा देश एकाएक सांप्रदायिक क्यों हो उठता है?

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होना तो यह चाहिए था कि 'पद्मावती' की ऐतिहासिक उपस्थिति को वर्तमान में महिलाओं की स्थिति से जोड़ा जाता। परंतु ऐसा करने का प्रयास किया ही नहीं गया। पद्मावती कोई धार्मिक या धर्मविशेष की प्रतिनिधि न रहकर पूरे नारी समुदाय की प्रतिनिधि क्यों नहीं बन रही हैं?

'राजमातापद्मावती के वंशधरों का अभी गौरव गान हो रहा है या निंदा गान !

दहेज के लिए जलाई जाने वाली या स्वयं के अग्नि को समर्पित कर देने वाली किसी महिला को क्या कहा जाए, इस पर भी कभी विचार किया जाए? कोख में ही कन्या भ्रूण हत्या को क्या संज्ञा दी जाएगी? जब यह बात पूछी जाएगी तो कहा जाएगा कि दोनों अलग-अलग मसले हैं। अपनी पत्नी को जलाने वाला या जलने पर मजबूर करने वाले पति को लेकर यदि उतनी ही घृणा सामने आए जितनी कि आज अलाउद्दीन खिलजी को लेकर आ रही है तो हमारे देश की तस्वीर ही बदल जाएगी। लेकिन वहां तो सिर का पल्लू भी नीचे नहीं गिरना चाहिए। आज नए राजपूताने की सरकार ही कह रही है कि महिलाओं को झाड़ू-पोंछा लगाना चाहिए और हाथचक्की से आटा पीसना चाहिए। इससे क्या उनमें खून की कमी, समाप्त हो जाएगी?

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उन्हें बराबरी का सामाजिक हक प्राप्त हो जाएगा? नहीं! परंतु पुरुष प्रधान समाज में यह बात स्थापित हो जाएगी कि महिलाएं महज एक माध्यम हैं जो उनके लिए सुख-सुविधा जुटाने के लिए अपने शरीर को एक उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करेंगी। प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व की तरह असंतोष बढ़ जाने पर कुछ को सम्मानजनक पदों पर बैठा दिया जाएगा। जबकि उनमें वे सभी गुण हैं, जो कि किसी मनुष्य में होना चाहिए। अतिरिक्त दबाव के निकलते ही कुकर शांत हो जाएगा और उसी तरह समाज भी शांत हो जाएगा। हम सब भूल जाएंगे कि सती प्रथा को महिमामंडित नहीं करना चाहिए। हम यह भी ध्यान  नहीं रखेंगे कि वह क्या परिस्थितियां थीं, जिनमें भारत में विदेशी शासन स्थापित हो पाए। उनसे क्या सबक लें? हम प्लासी की तीनों लड़ाइयां क्यों हारे? हम पानीपत की लड़ाई क्यों हारे? हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में क्यों पराजित हुए?

पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंगयह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है

लक्ष्मीबाई को जौहर क्यों नहीं करना पड़ा। दिनकर ने लिखा है, 'जब सरकारें नहीं बनी थीं, मनुष्य के चिन्तन पर कोई रोक-टोक नहीं थी। किन्तु सरकारों के बनने के साथ थोड़ा-बहुत पहरा विचारों पर भी पड़ने लगा। हर सरकार चाहती है कि चिन्तक कोई ऐसी बात न बोले, जिससे हमारी शक्ति क्षीण हो, हमारे अस्तित्व पर खतरा आए।' इंदिरा गांधी पर तो खूब बातें होती हैं। मगर वर्तमान सरकार के बारे में आप क्या सोचते हैं?

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