2018 की बंद मुट्ठी : गुजरात चुनाव से भाजपा राज के अंत की शुरूआत हो गयी है

जिस कृषि संकट, जिस रोजगार के संकट, जिस चौतरफा आर्थिक संकट और राजनीतिक मोहभंग ने गुजरात में नरेंद्र मोदी के पसीने छुड़ा दिए, 2018 में होने जा रहे चुनावों में, उनके लिए चुनौती पेश करने जा रहा है......

हाइलाइट्स

कुल मिलाकर यह कि 2017 के अंत में सारे आसार इसी के हैं कि 2018 में मोदी सरकार अपनी बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक मुहिम और जनतंत्रविरोधी तानाशाही की मुहिम को जारी रखेगी। लेकिन, उसके लिए इन मुहिमों को सिर्फ जारी रखना काफी नहीं होगा बल्कि उन्हें तेज किया जा रहा होगा। लेकिन क्यों? इस क्यों का जवाब 2017 के ऐन आखिर में हुए गुजरात के चुनाव ने बखूबी दे दिया है।

भारत के लिए’ से उनका आशय वास्तव में ‘संघ परिवार के लिए’ है

0 राजेंद्र शर्मा

सत्ता पक्ष की फौरी राजनीतिक जरूरतों की कैंची से बुरी तरह से कतर कर छोटे किए गए संसद के शीतकालीन सत्र में भाजपा ने अपने निरंकुश बहुमत के बल पर, तीन तलाक को दंडनीय गैरजमानती अपराध बनाने का विधेयक एक ही दिन में, पेश करने के बाद पारित भी करा लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने इस विधेयक की ओर ही इशारा करते हुए इस दिन को ‘भारत के लिए ऐतिहासिक दिन’ बताया था, जिसका अनुवाद इस विधेयक पर चर्चा का समापन करते हुए विधिमंत्री रविशंकर प्रसाद ने ‘इतिहास बनाने’ के दिन के तौर पर किया था। लेकिन, इस विधेयक को जिस तरह से तैयार किया गया और आखिरकार थोपा गया है, उससे इसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती है कि एक बार फिर ‘भारत के लिए’ से उनका आशय वास्तव में ‘संघ परिवार के लिए’ है। संघ परिवार के लिए बेशक यह एक ‘ऐतिहासिक दिन’ है क्योंकि उसकी नजरों में यह विधेयक, तीन तलाक के खिलाफ उतना नहीं है, जितना भारत में एक समान नागरिक कानून या कॉमन सिविल कोड थोपने के, उसके पुराने सपने को पूरा करने की दिशा में, एक बड़ा कदम है।

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कहने की जरूरत नहीं है कि इसके कम से कम तीन तलाक पीडि़ता ‘मुस्लिम बहनों’ के पक्ष में या हित में होने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है। जैसाकि कानून के अनेक जानकारों तथा स्वतंत्र टिप्पणीकारों ने रेखांकित भी किया है, सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक साथ तीन तलाक को ‘असंवैधानिक’ ठहराए जाने और इस तरह तीन तलाक को अमान्य ही कर दिए जाने के बाद, इस सिलसिले में किसी कानून की जरूरत ही नहीं रह जाती है। फिर ऐसे दमनकारी कानून की किसी को क्या जरूरत हो सकती है, जो न सिर्फ एक पूरी तरह से सिविल कानून के मामले को, फौजदारी अपराध में बदल देता है बल्कि उसके लिए तीन साल तक सजा तथा जुर्माने का अतिवादी प्रावधान भी करता है। याद रहे कि इस तरह की सजा अब तक प्राणघातक हथियारों के साथ बलवा करने तथा जाली मुद्रा का कारोबार करने से लेकर, किसी समुदाय के धार्मिक विश्वासों का अपमान करने तक, काफी गंभीर किस्म के अपराधों के लिए ही सुरक्षित रही है।

 

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अचरज नहीं कि सिर्फ मुस्लिम उलेमा ही नहीं, प्रस्तावित कानून को कॉमनसेंस की नजर से देखने वाले साधारण लोगों द्वारा भी उठाए जा रहे इस तरह के सवालों का जवाब देने की भाजपा सरकार ने कोई जेहमत नहीं उठायी है कि अगर इस तरह अवैध तलाक देने वाले को तीन साल के लिए जेल भेज दिया जाएगा, तो उसकी अब गैर-तलाकशुदा बीबी और बच्चों के भरण-पोषण का क्या इंतजाम होगा? और तीन साल के लिए जेल भिजवाया गया पति, जेल से लौटकर पत्नी को अपनी ब्याहता के तौर पर स्वीकार करेगा या और अंतिमता के साथ तलाक दे देगा! नरेंद्र मोदी की सरकार को अगर यह सब दिखाई ही नहीं दे रहा है, तो इसीलिए कि वह इस सच को देखना ही नहीं चाहती है। उसकी नजरों में तो तीन तलाक का मुद्दा सिर्फ एम मोहरा है, जिसके सहारे वह अपने बहुसंख्यकवादी समर्थक समूह को, अपने समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ रहे होने के रूप में, एक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरणकारी संदेश देना चाहती है। इसीलिए, यह कोई संयोग नहीं है और वास्तव में वर्तमान सरकार ने इसे काफी गर्व से स्वीकार भी किया है कि उसने यह विवादास्पद कानून बनाने से पहले, कम से कम मुस्लिम समुदाय के किसी भी संगठन या मंच से परामर्श करने की जरूरत ही नहीं समझी थी।

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लेकिन, साल के जाते-जाते मोदी सरकार ने जो बहुसंख्यकवादी संदेश दिया है, सिर्फ तीन तलाक विधेयक या उसकी मार्फत समान नागरिक कानून की कोशिश तक ही सीमित नहीं है। केंद्रीय मंत्री, अनंत कुमार हेगड़े के बयान के जरिए, जिसके अपनी राय होने से इंकार करने से रत्तीभर ज्यादा कुछ करने की जरूरत मौजूदा सरकार ने नहीं समझी है, देश के संविधान को ही बदल डालने की संघ परिवार की पुरानी इच्छा ही दोहराई गयी है। बेशक, हेगड़े ने उक्त एलान खासतौर पर संविधान में मौजूद धर्मनिरपेक्षता के प्रावधान पर ही हमला करते हुए किया था।

कर्नाटक में अपने जिस सार्वजनिक भाषण में केंद्रीय मंत्री ने संविधान बदलने तथा जल्दी ही बदलने का एलान किया था, उसी सभा में उन्होंने सिर्फ धर्मनिरपेक्षता के विचार पर ही नहीं, खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने/ मानने वालों पर भी, यह कहकर अशिष्ट हमला किया था कि उनकी पैतृकता संदिग्ध है। यह दूसरी बात है कि इसमें उन प्रधानमंत्री को भी कुछ टोकने लायक नहीं लगा है, जिन्होंने गुजरात के चुनाव प्रचार के दौरान इसका बड़ा शोर मचाया था कि कश्मीर में किसी शख्श ने, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था, अपने किसी सोशल मीडिया पोस्ट में, उनके मां-बाप पर सवाल उठाया था!

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फिर भी हेगड़े के उक्त एलान के निशाने को सिर्फ संविधान में मौजूद ‘धर्मनिरपेक्षता’ के प्रावधान तक सीमित नहीं समझा जाना चाहिए हालांकि, यह प्रावधान पहले दिन से ही मोदी सरकार के निशाने पर रहा है। इस सरकार के एक पहले ही विज्ञापन में देश के संविधान का प्रथम पृष्ठ धर्मनिरपेक्षता के प्रावधान से ‘मुक्त’ करा के पेश किया गया था। वैसे, इस सिलसिले में यह दोहराना भी अनावश्यक नहीं होगा कि यह हमला संविधान की ऐसी व्यवस्था पर है, जिसकी पहचान देश के सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने, अपने एक नजीर कायम करने वाले फैसले में संविधान के बुनियादी ढांचे के अंग के रूप में की है, जिसके साथ छेड़छाड़ संविधान संशोधन के अपने अधिकार के जरिए खुद संसद भी चाहे तो भी नहीं कर सकती है। फिर भी भारत के संविधान निर्माण के इतिहास की साधारण सी जानकारी रखने वाले लोग भी यह जानते हैं कि स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण की समूची प्रक्रिया के दौरान, देश के लिए संविधान की डॉ आंबेडकर की कल्पना को लगभग हरेक पहलू से, आरएसएस और उसके संघ परिवार के उग्र हमलों का सामना करना पड़ा था। इसमें डॉ आंबेडकर की ‘नया मनुस्मृतिकार’ बनने की कोशिशों का मजाक उड़ाना भी शामिल था! वर्तमान संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली तक उनके हमले की जद से बाहर नहीं है। मोदी के राज में संसदीय संस्थाओं का कमजोर किया जाना इसी का संकेतक है और शीतकालीन सत्र का बड़ी आसानी से कतर दिया जाना, इसका ताजातरीन उदाहरण है।

2019 : विकल्प सिर्फ व्यापक जनांदोलन

कुल मिलाकर यह कि 2017 के अंत में सारे आसार इसी के हैं कि 2018 में मोदी सरकार अपनी बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक मुहिम और जनतंत्रविरोधी तानाशाही की मुहिम को जारी रखेगी। लेकिन, उसके लिए इन मुहिमों को सिर्फ जारी रखना काफी नहीं होगा बल्कि उन्हें तेज किया जा रहा होगा। लेकिन क्यों? इस क्यों का जवाब 2017 के ऐन आखिर में हुए गुजरात के चुनाव ने बखूबी दे दिया है। इसका अर्थ किसी से छुपा नहीं रह सकता है कि गुजरात जैसे राज्य में, जिसे प्रधानमंत्री मोदी का पॉकिट ब्यूरो ही नहीं माना जाता था, जहां सब कुछ के बावजूद ब्रांड मोदी का सबसे ज्यादा असर होना चाहिए, हाल के चुनाव में एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद, वह बमुश्किल तमाम बहुत मामूली बहुमत दिला सके हैं, वह भी सत्ताधारी पार्टी की सीटों में 2012 के विधानसभाई चुनाव के मुकाबले उल्लेखनीय कमी के साथ। 2014 के लोकसभाई चुनाव से तुलना करें तो,  जिसमें ब्रांड मोदी ने अपना प्रखर रूप लिया था, भाजपा को पूरी 66 सीटों और करीब 10 फीसद वोट का नुकसान हुआ है। यही वह प्रतिकूलता थी जिसे भांपकर नरेंद्र मोदी ने विकास की सारी दुहाई के बावजूद, खुद अपने आप को इस चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बनाया था और मुसलमान मुख्यमंत्री के खतरे से लेकर पाकिस्तान के षडयंत्र तक, हरेक सांप्रदायिक दंाव आजमाया था।

गुजरात चुनाव : अगर-मगर कुछ हो जाता तो गुजरात से भाजपा का पत्ता साफ़ था

जिस कृषि संकट, जिस रोजगार के संकट, जिस चौतरफा आर्थिक संकट और राजनीतिक मोहभंग ने गुजरात में नरेंद्र मोदी के पसीने छुड़ा दिए, 2018 में होने जा रहे त्रिपुरा से लेकर, कर्नाटक से होकर, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ तक के चुनावों में, उनके लिए कैसी चुनौती पेश करने जा रहा है, इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। दरअसल गुजरात के चुनाव का असली संदेश यही है कि नरेंद्र मोदी का जादू टूट रहा है। चुनाव के आगे आने वाले हरेक चक्र में, यह जादू गुजरात से ज्यादा टूटेगा। दूसरी ओर, गुजरात के संदेश से सबक लेकर और इस उम्मीद के साथ कि भाजपा को हराया जा सकता है, विपक्षी धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक ताकतें जो ज्यादा कारगर कार्यनीति अपनाएंगी, उसके प्रहारों से यह जादू और तेजी से टूटेगा। किसी ने सही कहा था--गुजरात चुनाव से भाजपा राज के अंत की शुरूआत हो गयी है। यही गुजरात का संदेश है। 2018, इस संदेश का फलीभूत होना देखेगा। यही है 2018 की बंद मुट्ठी का लेख।                                                                                                     0

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