यह सरकार दलितों की पीड़ा को समझने में नाकाम क्यों रही है?

चैनलों में इस खबर को ऐसे दिखाया गया मानो इस नुकसान के जिम्मेदार दलित ही हैं। पता नहीं ये पत्रकार और मीडिया मालिक कैसी दिव्य दृष्टि रखते हैं कि घटना देखते ही उसके कारक, कारण और परिणाम तक पहुंच जाते है...

देशबन्धु

दलित आंदोलन के बहाने राजनीति ने समाज को फिर बांटने का खेल खेला है। यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि इस हिंसा के लिए दलित ही जिम्मेदार हैं

प्रजासुखे सुखं राज्ञ: प्रजानां तु हिते हितम् ।

नात्मप्रियं हितं राज्ञ: प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए। जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है ।

कौटिल्य यानी चाणक्य का लिखा यह श्लोक संसद भवन के एक गुंबद पर दर्ज है। तब राजशाही थी, इसलिए राजा के कर्त्तव्य का जिक्र है, आज के संदर्भ में इसे प्रधानमंत्री का दायित्व कहा जा सकता है। चार साल पहले जब नरेन्द्र मोदी ने संसद में प्रवेश किया था, तो ड्योढ़ी पर सिर झुकाया था, आगे उन्हें सिर उठाकर इन नीति वचनों को भी देखना चाहिए था, जो संसद भवन के स्तंभों, गुंबदों पर उत्कीर्ण हैं। प्रजा यानी जनता के सुख में ही राजा को अपना सुख देखना चाहिए, लेकिन क्या आज ऐसी स्थिति है। देश जिस तरह से जल रहा है, कम से कम उसे देखकर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। पहले किसान अपने हक के लिए सड़कों पर उतरे, उन्हें आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया। फिर अन्ना हजारे ने न जाने क्यों किसानों के नाम पर अनशन का ऐलान किया, यह भी कहा कि वे इस मंच पर राजनीति नहीं होने देंगे, लेकिन राजनेताओं के हाथों जूस पीकर वे भी लौट गए, और सरकार को हिलाकर रख देंगे जैसी बातें खुद ही हवा में लटक गईं।

किसान एक बार फिर ठगे गए। इसके बाद बारी आई छात्रों की, जिनके नाम पर ठगी अभी चल ही रही है और वे भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आंदोलन करें या पढ़ाई करें।

2 अप्रैल को देश भर में दलित सड़कों पर उतरे। वे एससी एसटी एक्ट में बदलाव का विरोध करने के लिए भारत बंद करवा रहे थे, लेकिन इसमें देश के कई राज्यों में ऐसी हिंसा भड़की कि कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई। करोड़ों की सार्वजनिक और निजी संपत्ति का नुकसान हुआ सो अलग। बहुत से चैनलों में इस खबर को इस ढंग से दिखाया गया मानो इस नुकसान के जिम्मेदार दलित ही हैं। पता नहीं ये पत्रकार और मीडिया मालिक कैसी दिव्य दृष्टि रखते हैं कि घटना देखते ही उसके कारक, कारण और परिणाम तक तुरंत पहुंच जाते हैं।

यह सच है कि 2 अप्रैल को देश के कई राज्य सुलग उठे, लेकिन इनमें सबसे ज्यादा हिंसा वहीं हुई, जहां दलितों का उत्पीड़न सदियों से होता रहा है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, हरियाणा इन तमाम राज्यों में आंदोलन उग्र रहा। यह शायद संयोग ही है कि इन तमाम राज्यों में भाजपा की सरकार है। केंद्र में भी भाजपा की ही सत्ता है, जो यह दंभ भरती है कि संसद में एससी एसटी के कुल 131 सांसदों में 67 सांसद उसके हैं। जब दलितों का प्रतिनिधित्व करने वाले इतने लोग भाजपा के सांसद हैं, तो फिर यह सरकार क्यों दलितों की पीड़ा को समझने में नाकाम रही है?

क्यों वह उनका भरोसा नहीं जीत पा रही कि वह उनके हित के लिए कदम उठाएगी। जिस दिन भारत बंद का ऐलान हुआ, उसी दिन सरकार ने पुनर्विचार याचिका क्यों दायर की? क्या वह यह काम पहले नहीं कर सकती थी? क्या वह अध्यादेश नहीं ला सकती थी, ताकि ऐस कानून बन सके कि दलितों को सम्मान के साथ जीने का अहसास हो? जिस तरह रामनवमी जुलूस निकालने के बाद सांप्रदायिक हिंसा को रोकने में सरकार नाकाम रही, वही असफलता अब दलित आंदोलन में भी दिख रही है और यह संदेह होता है कि कहींयह सब कुछ जानबूझ कर तो नहीं होने दिया जा रहा, ताकि जनता का ध्यान भटक सके।

किसान, छात्र, सांप्रदायिक हिंसा सबकी बात भूलकर अब देश दलितों पर चर्चा कर रहा है और उसमें भी पक्षपात नजर आ रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें अब कानून-व्यवस्था संभालने में लगी हैं, यही कदम पहले क्यों नहीं उठाया गया? क्यों राजस्थान में करणी सेना दलितों के बंद का विरोध करने उतर आई, क्या वहां पुलिस की जिम्मेदारी करणी सेना ने उठा रखी है? क्यों मध्यप्रदेश में खुलेआम रिवाल्वर लेकर चलने वाले शख्स को पुलिस ने नहीं पहचाना, जबकि स्थानीय लोग उसकी पहचान बता रहे थे? हिंसा किसी भी तरह की हो और किसी भी पक्ष से हो, वह किसी सूरत में सही नहीं कही जा सकती। इसलिए कहा जाता है कि कानून सबके लिए बराबर है, पर समाज में भी सब बराबर कब होंगे, यह बड़ा सवाल है।

दलित आंदोलन के बहाने राजनीति ने समाज को फिर बांटने का खेल खेला है। यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि इस हिंसा के लिए दलित ही जिम्मेदार हैं और इस तरह फिर उन्हें गलत साबित करने की साजिश हो रही है। समाज बार-बार बंटने का काफी नुकसान उठा चुका है, अब कम से कम वह संभल जाए और राजनीति के षड्यंत्र को जीतने न दे। राजा ख्याल करे न करे, प्रजा अपने हितों का ख्याल खुद ही करे, आज चाणक्य होते, तो शायद यही कहते।

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देशबन्धु का संपादकीय

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