सजावटी लेकिन दिशाहीन बजट

पहले शिक्षा सेस 3 फीसदी था. इसे अब शिक्षा और स्वास्थ्य सेस का नाम देकर 4 फीसदी कर दिया गया है. इससे आम लोगों पर कर का बोझ बढ़ेगा और केंद्र सरकार को इस अतिरिक्त आय को राज्यों के साथ भी बांटना नहीं पड़ेगा...

हाइलाइट्स

पहले शिक्षा सेस 3 फीसदी था. इसे अब शिक्षा और स्वास्थ्य सेस का नाम देकर 4 फीसदी कर दिया गया है. इससे आम लोगों पर कर का बोझ बढ़ेगा और केंद्र सरकार को इस अतिरिक्त आय को राज्यों के साथ भी बांटना नहीं पड़ेगा. नौकरीपेशा करदाताओं को राहत के नाम पर जिस 40,000 रुपये पर कर छूट की बात कही गई है, वह मौजूदा परिवहन और मेडिकल छूट के आसपास ही है.

आम बजट 2018-19 में प्रस्तावित खर्च सरकार के भारी-भरकम दावों के मुकाबले काफी कम है

आम बजट पेश करने की रस्म महत्व के मामले में काफी समय से अपनी चमक खोता जा रहा है. केंद्र सरकार के कैलेंडर में यह एक मीडिया इवेंट की तरह है. इस मौके पर सरकार खुद को गरीबपरस्त दिखाने की कोशिश करती है. जबकि असलियत यह है कि नीतियां क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग सुधार के मकसद से की जा रही हैं. इन एजेंसियों को यह ठीक नहीं लगता कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कर्ज ले.

इस बार का बजट इस सरकार की राजनीतिक दृष्टिकोण को दिखाता है. ऐसा लगता है कि बजट भाषण मीडिया की सुर्खियों के लिए लिखा गया था. बजट में अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याओं के समाधान का कोई रोडमैप नहीं दिखता. जिन घोषणाओं को बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कहा जा रहा है, वे पहले की योजनाओं की ही रिपैकेजिंग हैं. जिस तरह से नरेंद्र मोदी सरकार राजनीतिक हौव्वा खड़ा करती है और मीडिया कोई सवाल नहीं उठाता, इससे पहले की सरकारों को शर्म आएगी.

हमें यह देखना चाहिए कि इस सजावटी बजट में क्या है. 2018-19 में कुल खर्च 10.1 फीसदी बढ़ाने की घोषणा सरकार ने की थी. जबकि इस दौरान नाॅमिनल जीडीपी की विकास दर 11.5 फीसदी रहने का अनुमान है. इसके मुकाबले खर्च काफी कम रखा गया है. 2016-17 के मुकाबले 2017-18 में कुल खर्च 12.3 फीसदी बढ़ने का अनुमान है.

कुल कर राजस्व 2017-18 के मुकाबले 2018-19 में 16.7 फीसदी बढ़ने का अनुमान है. 2017-18 का कुल खर्च बजट अनुमान के मुकाबले संशोधित अनुमानों में अधिक था. जबकि पूंजीगत खर्च बजट अनुमानों के मुकाबले संशोधित अनुमान में 36,357 करोड़ रुपये कम था. इसका मतलब यह हुआ कि पूंजीगत व्यय 2016-17 के मुकाबले 2017-18 में कम रहा. ऐसे खर्चे आम तौर पर ढांचागत निर्माण पर होते हैं और ये सरकारी निवेश का अहम अंग है. 2017-18 के संशोधित अनुमानों में कमी की असल वजह बड़े और मध्यम आकार के सिंचाई और बिजली उत्पादन परियोजनाओं पर होने वाले खर्च में कटौती है. पूंजीगत व्यय 2014-15 से 2018-19 के बीच हर साल औसतन 10.4 फीसदी की दर से बढ़ा है. जबकि 2009-10 से 2013-14 के बीच यह विकास दर 16.4 फीसदी थी. यह चिंताजनक है. क्योंकि सरकारी निवेश निजी निवेश को आकर्षित करता है. निजी क्षेत्र पहले से ही कम मुनाफे की वजह से परेशान है और ट्विन बैलेंश शीट की समस्या बनी हुई है.

2018-19 में वित्तीय घाटा नाॅमिनल जीडीपी का 3.5 फीसदी रहने का अनुमान है. यह पहले के लक्ष्यों से अधिक है. लेकिन इसके अभी और बढ़ने का अनुमान है क्योंकि जीडीपी के अनुमान अव्यावहारिक हैं. वित्तीय घाटा बढ़ने के लिए राजस्व में कमी बड़ी वजह है. हर किसी को यह दिमाग में रखना चाहिए कि कम वित्तीय घाटा का लक्ष्य और सरकारी कर्ज को जीडीपी के 40 फीसदी पर सीमित रखने का लक्ष्य रेटिंग एजेंसियों को यह दिखाने के लिए है कि भारत सरकार वित्तीय अनुशासन के प्रति प्रतिबद्ध है. यह बजट का मूल लक्ष्य बन गया है.

राजनीतिक तौर पर यह माना जा रहा था कि सरकार कृषि संकट के समाधान के लिए कुछ करेगी. 2017-18 में कई राज्यों में किसानों का असंतोष उभरा. बजट भाषण भी कुछ इसी तरह शुरू हुआ कि लगने लगा कि इस बजट में किसानों के लिए बहुत कुछ है. लेकिन अंत में कुछ खास नहीं निकला. वित्त मंत्री ने कहा कि जिन फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा नहीं हुई है, उनके लिए भी लागत से 50 फीसदी अधिक समर्थन मूल्य की घोषणा की जाएगी. इसके बाद नीति आयोग के केंद्र और राज्य से बात करके किसानों को उचित मुनाफा दिलाने के लिए फूल प्रूफ सिस्टम विकसित करने का निर्देश दिया गया. वास्तव में 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा के घोषणा पत्र में किया गया यह वादा अब तक एक जुमला ही रहा है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नई और पुरानी योजनाओं के तहत बजट आवंटन बेहद मामूली रहा. वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लक्ष्यों को 2022 के मुकाबले 2019 में पूरा करने को तो कहा लेकिन इसके लिए बजट आवंटन नहीं बढ़ाया. मतलब साफ है कि सरकार सिर्फ बोलना जानती है.

यही बात सरकार की अपनी प्रमुख योजनाओं पर भी लागू होती है. वित्त मंत्री ने ऐसी तीन योजनाओं का जिक्र कियाः प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत स्वास्थ्य एवं वेलनेस केंद्र और रहस्यमयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना. पहली योजना के तहत खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए 1,313 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. दूसरी के तहत 1.5 लाख केंद्रों की मदद के लिए 1,200 करोड़ रुपये दिए गए. तीसरे के बारे में दावा किया गया कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए यह दुनिया की सबसे बड़ी योजना है. सच्चाई तो यह है कि सरकार एक बीमा योजना को स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम के तौर पर पेश कर रही है. स्वास्थ्य बीमा के बारे में यह बात आई है कि इसकी वजह से अस्पताल बढ़ा-चढ़ा कर पैसे वसूलते हैं. इस योजना के लिए बजट में कोई आवंटन भी नहीं है. इस कार्यक्रम की घोषणा 2016-17 के बजट में की गई थी लेकिन तब से अब तक यह कैबिनेट से आगे नहीं बढ़ पा रहा है.

मातृत्व लाभ देने वाली प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना पर भी खास ध्यान नहीं दिया गया. इस योजना पर कम आंवटन और इसके क्रियान्वयन की खामियों से वित्त मंत्री को अवगत कराने का काम 60 अर्थशास्त्रियों ने ईपीडब्ल्यू के 23 दिसंबर, 2017 में लिखे एक खुला पत्र के जरिए किया था. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 के तहत यह प्रावधान था कि मातृत्व लाभ सरकार द्वारा सुनिश्चित किया जाएगा. केंद्र और राज्य की भागीदारी वाली इस योजना के लिए 8,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता थी. 2017-18 के बजट अनुमानों में 2,700 करोड़ रुपये का प्रावधान था लेकिन दिए गए सिर्फ 2,400 करोड़ रुपये. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धा पेंशन योजना के तहत बुजुर्गों को दी जाने वाली पेंशन 200 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये और विधवा महिलाओं के लिए 300 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये की बात को भी इस बजट में दरकिनार कर दिया गया.

इस बजट में एक महत्वपूर्ण कर प्रस्ताव है एक लाख रुपये से अधिक के फायदे पर 10 फीसदी का लांग टर्म कैपिटल गेन टैक्स. पहले शिक्षा सेस 3 फीसदी था. इसे अब शिक्षा और स्वास्थ्य सेस का नाम देकर 4 फीसदी कर दिया गया है. इससे आम लोगों पर कर का बोझ बढ़ेगा और केंद्र सरकार को इस अतिरिक्त आय को राज्यों के साथ भी बांटना नहीं पड़ेगा. नौकरीपेशा करदाताओं को राहत के नाम पर जिस 40,000 रुपये पर कर छूट की बात कही गई है, वह मौजूदा परिवहन और मेडिकल छूट के आसपास ही है.

इस सरकार के पहले बजट से 14वें वित्त आयोग का फाॅर्मूला लागू है. सामाजिक क्षेत्र में होने वाले खर्चों में राज्यों की भागीदारी अधिक है. इस सरकार के सत्ता में आते कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी आई. अगस्त, 2014 में 100 डॉलर प्रति बैरल की दर से बिकने वाला कच्चा तेल जनवरी, 2016 में 30 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चला गया. तब से यह लगातार 100 डाॅलर के नीचे बना हुआ है. अब यह अनुकूल स्थिति बदल रही है. कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं और इसमें आगे भी तेजी की उम्मीद है. कच्चे तेल के दाम कम होने का फायदा उठाते हुए सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के जरिए अधिक अप्रत्यक्ष कर वसूले. तेल की कीमत कम होने से व्यापार घाटा भी कम हुआ. इस वजह से महंगाई भी काबू में रही. इसका पूरा श्रेय सरकार ने लिया. 2014 के चुनावों के वक्त भाजपा ने महंगाई का मुद्दा जोर-शोर से उठाते हुए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर कई आरोप लगाए थे. लेकिन कम महंगाई के बावजूद मोदी सरकार निवेश में आई कमी को दूर करने में कामयाब नहीं हुई. न ही विनिर्माण क्षेत्र को गति देने में कामयाबी मिली. इस वजह से निर्यात में भी गिरावट आई.

यह बात सही है कि निवेश में कमी मोदी सरकार के आने के पहले से शुरू हो गई थी. लेकिन इस सरकार ने इसे ठीक करने के लिए पर्याप्त काम नहीं किए. सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया कि उसका पूंजीगत व्यय कम रहे. अब सरकार एक सजावटी बजट को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की कोशिश कर रही है.

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली वर्षः 53, अंकः 05, 3 फरवरी, 2018

(Economic and Political Weekly, )

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