बुलंद आवाज BHU की छात्राओं की

छात्राओं की सुरक्षा की चिंता को उनके खिलाफ हथियार नहीं बनाया जा सकता. महिलाओं के लिए असुरक्षित समझे जाने वाले दिल्ली में स्थापित JNU यह दिखाता है कि कैसे सम्मान और आजादी सुरक्षा का माहौल बना सकता है ...

हाइलाइट्स

किसी ने बीएचयू की छात्राओं को उकसाया नहीं. छात्राओं ने इससे भी कई ऐसी घटनाओं की शिकायत विश्वविद्यालय प्रशासन से की है. लेकिन कुछ नहीं होने से इस बार छात्राएं आंदोलन करने को बाध्य हो गईं. इस तरह की मांगें देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी उठे हैं. 2015 से पिंजरा तोड़ के नाम से दिल्ली, कोलकाता, अलीगढ़, मुंबई, कासरगोड़, रायपुर, जम्मू और अन्य जगहों के विश्वविद्यालयों में यह अभियान चल रहा है

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में छात्राओं का प्रदर्शन उनके अधिकार की मांग को दिखाता है

ऐसा लगता है कि भारतीय लड़कियां अब उच्च शिक्षा को शादी के लिए प्रमाण पत्र हासिल करने का जरिया भर नहीं मानतीं. सच्चाई यह है कि वे सड़कों पर आने को तैयार हैं, हाथों में तख्तियां लिए और सवाल उठा रही हैं. लेकिन इसके लिए न सिर्फ उन्हें काफी कुछ सुनना पड़ रहा है बल्कि पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ रही है. 101 साल पुराने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में यही सब हुआ. 10,000 से अधिक छात्राएं इस विश्वविद्यालय में हैं. इसके बावजूद इसके कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी को यह लगता है कि छात्राओं का आंदोलन बाहर के उन लोगों ने खड़ा कराया जो नरेंद्र मोदी के विरोधी हैं. त्रिपाठी ने दावा किया कि बाहर के लोग इन छात्राओं को बहकाकर गलत को सही साबित करने में लगे हैं. त्रिपाठी जिसे ‘गलत’ कह रहे हैं, 21 सितंबर की वह घटना है एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ की. उसकी शिकायत कर कार्रवाई के बजाए विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसी से सवाल करना शुरू कर दिया कि वह इतनी देर तक बाहर क्यों थी. यह सब करके त्रिपाठी और विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह साबित कर दिया कि वे अब तक किसी पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं. 

किसी ने बीएचयू की छात्राओं को उकसाया नहीं. छात्राओं ने इससे भी कई ऐसी घटनाओं की शिकायत विश्वविद्यालय प्रशासन से की है. लेकिन कुछ नहीं होने से इस बार छात्राएं आंदोलन करने को बाध्य हो गईं. इस तरह की मांगें देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी उठे हैं. 2015 से पिंजरा तोड़ के नाम से दिल्ली, कोलकाता, अलीगढ़, मुंबई, कासरगोड़, रायपुर, जम्मू और अन्य जगहों के विश्वविद्यालयों में यह अभियान चल रहा है. इन सब जगहों पर विश्वविद्यालय प्रशासन पर सवाल उठाए गए और छात्रों और छात्राओं के लिए अपनाए जा रहे अलग-अलग पैमाने पर आपत्ति की गई. हाॅस्टल में आने-जाने के लिए छात्रों के लिए अलग समय और छात्राओं के लिए अलग समय पर भी सवाल उठे.

ऐसे में 21 से 23 सितंबर के बीच बीएचयू में जो हुआ वह हमारे विश्वविद्यालयों में चल रहे मंथन का नतीजा है. इन सबसे यह सवाल उठ रहा है कि विश्वविद्यालय कैसे चलने चाहिए. इन्हें स्कूल के विस्तार के तौर पर चलना चाहिए जहां शिक्षक नियम बना देते हैं और छात्रों को उनका पालन करना होता है या फिर इन्हें शिक्षा के वैसे केंद्र के तौर पर काम करना चाहिए जहां पढ़ाने वालों और पढ़ने वालों के बीच सम्मान का रिश्ता हो और दोनों मिलकर पढ़ाई के लक्ष्यों को पा सकें. यह लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो पाएगा जब तक विश्वविद्यालयों में छात्राओं के साथ भेदभाव किया जाएगा.

छात्राओं की सुरक्षा की चिंता को उनके खिलाफ हथियार नहीं बनाया जा सकता. महिलाओं के लिए असुरक्षित समझे जाने वाले दिल्ली में स्थापित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यह दिखाता है कि कैसे सम्मान और आजादी सुरक्षा और ज्ञान का माहौल बना सकता है. जेएनयू का उदाहरण भले ही दूसरे विश्वविद्यालयों पर लागू न हो लेकिन छात्राओं की सुरक्षा की पुरानी अवधारणाओं को छोड़कर उनसे बातचीत करके उनकी सुरक्षा के उपाय करने चाहिए.

बीएचयू के कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय राजनीति के केंद्र नहीं हैं. उन्हें शायद पता नहीं है कि विश्वविद्यालय हमेशा से राजनीति की प्रयोगशाला रहे हैं. ऐसे में ज्ञान हासिल करने वालों को सवाल उठाने और अपनी बात रखने से रोकना उन्हें उसी घिसी-पिटी शिक्षा में उलझाए रखना होगा. हालांकि, कुछ लोग चाहेंगे कि विश्वविद्यालयों से रोबोट जैसे छात्र निकलें और ‘नए’ भारत में फिट हो जाएं. लेकिन ऐसे लोगों को निराश होना पड़ेगा. बीएचयू की छात्राओं ने यह साबित किया है और यह खुशी की बात है.

 

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली का संपादकीय

(Economic and Political Weekly, वर्षः 52, अंकः 39, 30 सितंबर, 2017)

 

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