'डर्टी ट्रिक्स’ : डाटा की चोरी, और सरकारी सीनाजोरी

यह एक ऐसी शुरूआत थी, जो बताती है कि बीजेपी के नेता, जो आज मोदी सरकार के मंत्री हैं, ने विदेशियों को बुलाकर लोगों की गोपनीयता चोरी करने, और उनका डाटा बैंक बनाने का जघन्य अपराध किया था।...

पुष्परंजन

'डर्टी ट्रिक्स’ : केसी त्यागी, चिदंबरम तो हैं नहीं कि बेटे के पीछे-पीछे अदालत में दौड़ेंगे, आपकी पोल खोलेंगे, और गठबंधन तोड़ देंगे

कानून व आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ऐसा 'बम' पटका, जिसने देश में बहस की दिशा बदल दी। ध्यान से देखिये, इससे पहले पूरा देश कई सवालों के उत्तर चाह रहा था। इराक में मारे गये 39 लोगों और उनके परिजनों के साथ क्या हुआ? राफेल डील में कितना खाया गया? संसद में अविश्वास प्रस्ताव क्यों इधर का उधर घूम रहा है? इन सवालों को छोड़कर देश डाटा चोरी की चिंता में लग गया है। लोगों के निजी डाटा चोरी की कहानी नई नहीं है। अपने यहां यह कारोबार 2009 या और पहले से चल रहा है। लोगों की 'कुंडली' कंप्यूटर में डालने, और उनके चुनावी इस्तेमाल की कहानी सियासत करने वालों को सही से पता है।

फिलहाल, इस कहानी के केंद्र में अमरीश त्यागी हैं, जिन्हें उठाने और पूछताछ की हिमाकत सरकारी एजेंसियां नहीं कर रही हैं। जेडीयू सांसद केसी त्यागी, चिदंबरम तो हैं नहीं कि बेटे के पीछे-पीछे अदालत में दौड़ेंगे। केसी त्यागी आपकी पोल खोलेंगे, और गठबंधन तोड़ देंगे। डाटा चोरी का इतना बड़ा गुब्बारा फुलाने वाले रविशंकर प्रसाद से पूछा जा सकता है, क्या इसे रोकने के वास्ते आपने कोई सख्त कानून बनाया है?

 

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दरअसल, इन्होंने 18 साल पुराने कानून में कोई संशोधन किया ही नहीं। साल 2000 में आईटी एक्ट के अनुच्छेदों को देखिये, तो अधिकतम तीन साल की कैद और पांच लाख का जुर्माना मुकर्रर किया गया है। इस देश में डॉटा उड़ाने की तकनीक कहां से कहां पहुंच गई, मगर इस देश का आईटी कानून वहीं का वहीं है।  चीन ने मई 2017 में 'साइबर सिक्योरिटी एंड डाटा प्रोटेक्शन लॉ' अपडेट किया था। मोदी सरकार के मंत्री रविशंकर प्रसाद, जिस तेवर में डाटा चोरी का आरोप कांग्रेस पर चस्पा कर रहे थे, उससे यही लग रहा था, जैसे यह देश से विश्वासघात या देशद्रोह का मामला है। आईटी एक्ट-2000 को ध्यान से देखें, तो इस अपराध की जांच सीबीआई और साइबर क्राइम सेल के दायरे में आती है। तो क्या आईटी मंत्री ने इसकी जांच कराई?

मार्क जुकरबर्ग ने जो कुछ अफसोस व्यक्त किया है, उसका संदर्भ भारत नहीं है। यह किस्सा अमेरिका से शुरू होते हुए ब्रिटेन पहुंचा है। इस मामले की जांच ब्रिटेन में चल रही है। ब्रिटिश संसदीय समिति ने फेसबुक के कर्ता-धर्ता मार्क जुकरबर्ग से पूछा है कि यूजर्स के बारे में निजी जानकारी कैम्ब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी के पास कैसे पहुंची? यह प्रकरण यूरोपीय संसद के लिए भी जांच का विषय बन चुका है। यूरोपीय संसद के अध्यक्ष अंतोनियो तजानी ने जुकरबर्ग से जानकारी चाही है कि निजी डाटा के धंधे के जरिये किसी देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ध्वस्त तो नहीं किया जा रहा है?

ब्रिटेन में रजिस्टर्ड कंपनी 'कैम्ब्रिज एनालिटिका', डाटा माइनिंग और डाटा एनालिसिस का काम करती है। इस कंपनी ने फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया साइट्स पर सक्रिय लोगों को 'बकरा' बनाया। उनके मनोविज्ञान को पकड़ने के वास्ते छोटे-छोटे सवालों का क्विज़ डिजाइन किया गया। उसका नाम था-'दिस इज माई डिजिटल लाइफ ! इसे डिजाइन करने वाले एजेक्जडर कॉगन ने सोशल साइट यूजर्स से सवाल किये। जैसे, आप कौन से शब्दों का अधिक इस्तेमाल करते हैं? कौन सी बातें आपको परेशान करतीं हैं? आपकी पर्सनालिटी कैसी है? कौन-कौन आपके दोस्त हैं? इस सवालों के उत्तर से उस व्यक्ति ही नहीं, उसके दोस्तों तक एजेक्जडर कॉगन का यह ऐप पहुंचने में कामयाब हुआ। इस तरह से फेसबुक के पांच करोड़ यूजर्स के डाटा को खोद निकालने में 'कैम्ब्रिज एनालिटिका' कामयाब हो चुकी थी।

'कैम्ब्रिज एनालिटिका' सिर्फ अमेरिका नहीं, दुनिया के 200 देशों में इस तरह के डाटा के जरिये चुनावों को प्रभावित करने का काम कर चुकी है। एक तरह से जहां-जहां वोटिंग प्रणाली थी, लोग-बाग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से वोट किया करते थे, उसे तोड़कर 'कैम्ब्रिज एनालिटिका' ने बैठे बिठाये चुनाव जीतने का ब्रह्मास्त्र उन पार्टियों को पकड़ा दिया, जिनके पास अरबों डॉलर और दूसरे संसाधन थे। इसमें छोटी पार्टियां, या इस तिकड़म से अनजान बड़ी पार्टियां लुट-पिट गईं। बैठे ठाले कंप्यूटर के जरिये दिमाग लगाने वाले रातों-रात अरबों डॉलर के बादशाह हो गये। उसकी एक बड़ी वजह दुनिया के अधिकांश देशों में डाटा चोरी रोकने में लचर कानून भी है।

खैर, जब डाटा चोरी का गोरखधंधा एक्सपोज हुआ, तो ये एक-दूसरे को टोपी पहनाने में लग गये हैं। इस विप्लवकारी एप का आविष्कारक एलेक्जेंडर कॉगन ने कहा, 'कंपनी के कर्ता-धर्ता सुरक्षित बचे हुए हैं, और मुझे बकरा बनाया जा रहा है।' मार्क जुकरबर्ग का इससे अनजान रहने का पाखंड इसी का हिस्सा रहा है। कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ पद से एलेक्जेंडर निक्स इसलिए भी नप गये, क्योंकि उन्होंने कुबूल किया था कि ट्रंप के चुनाव में उनकी कंपनी ने अहम भूमिका निभाई थी। तो क्या ऐसे चुनाव रद्द नहीं होने चाहिए? यह तो बेईमानी से जीता चुनाव है, जिसकी इजाजत ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने अमेरिकी निर्वाचन आयोग ने नहीं ली थी। अमेरिका में डाटा सुरक्षा से संबंधित नियामक एजेंसी

'अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन' इस प्रकरण की जांच कर रही है। उसका निष्कर्ष मिलना बाकी है।

इस मामले के कुछ हिस्से के 'एक्सपोज होने का नतीजा है कि पिछले पांच दिनों में फेसबुक के शेयर धड़ाम से नीचे गिरे हैं। संभव है, विज्ञापनदाता फेसबुक से कटें, और शेयरधारक पतली गली से निकल लें। यह भी मुमकिन है कि दुनियाभर में सरकारें फेसबुक समेत दूसरे सोशल मीडिया पर डाटा सुरक्षा को लेकर कड़े कानूनी प्रतिबंध आयद करें। 4 फरवरी 2004 को फेसबुक लांच हुआ था। मार्क जुकरबर्ग ने हार्वर्ड कॉलेज के चार साथियों के साथ इसकी शुरूआत की थी। सब कुछ चार का ही आंकड़ा था। 2004 में हार्वर्ड कॉलेज के इन चार छात्रों ने कल्पना नहीं की होगी कि सिर्फ डाटा जुटाने के धंधे से 13 साल बाद, 2017 में इनकी कंपनी की आय 40 हजार 653 अरब डॉलर को पार कर जाएगी, और इनके पास दुनियाभर से 25 हजार कर्मचारियों की फौज जुट जाएगी। ऐसा तिलस्म तो किसी परीकथा में ही सुनने को मिले।

अब इस किस्से को भारत ले आते हैं, जिसे लेकर रविशंकर प्रसाद प्रेस कांफ्रेंस में फुंफकार रहे थे। उन्होंने ललकारा कि कांग्रेस डाटा चोरी का चुनाव में इस्तेमाल करना चाहती है, हम इसे होने नहीं देंगे। उधर राहुल गांधी ने चुनौती दी कि साबित करो, आप मुद्दे भटकाने के वास्ते यह सब कर रहे हो। यह कथा कुछ अजीब सी है कि 'कैंब्रिज़ एनालिटिका' 2013 में रजिस्टर्ड होती है, और 2010 में उसके 'क्लाइंट' को बिहार विधानसभा के चुनाव में 'लैंड स्लाइड विक्टरी' मिल जाती है।

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जेडीयू के सेक्रेट्री जनरल और प्रवक्ता केसी त्यागी के तीन बेटे हैं। राजीव त्यागी, अमरीश त्यागी, और विकास त्यागी। केसी त्यागी का बयान दिलचस्प है। उन्होंने कहा, 'मेरे बेटे का संबंध इस कंपनी में केवल कामकाज का है।' अब, कामकाज करना, और उस कंपनी का डायरेक्टर होना, दो बातें हैं। 28 जनवरी 2010 को 'ओवलेनो बिजनेस इंटेलीजेंस प्राइवेट लिमिटेड' को रजिस्टर्ड कराया गया। इस कंपनी के दो डायरेक्टर दिखाये गये। अमरीश कुमार त्यागी, पता सी-13 एमआईजी फ्लैट्स, लोहियानगर, गाजियाबाद और दूसरे डायरेक्टर थे, शरद त्यागी, 'एसएफ 184 शास्त्रीनगर,गाजियाबाद ।' इस कंपनी के रजिस्टर्ड ऑफिस का पता है '13 फर्स्ट फ्लोर, बंगाली मार्केट, बाबर लेन, नई दिल्ली।'

एक और शख्स अवनीश कुमार राय ने एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन से बातचीत में दावा किया कि 2014 में कांग्रेस की छवि बिगाड़ने के वास्ते डाटा का दुरुपयोग किया गया था। अवनीश राय के अनुसार, 'इस कंपनी में चार डायरेक्टर थे, जिनमें से दो देश से बाहर के थे।' चार दिन पहले 'कैम्ब्रिज एनालिटिका' के सीईओ पद से निकाला गया, 'एलेक्जेंडर निक्स' उनमें से एक डायरेक्टर था। दूसरा, विदेशी डायरेक्टर एलेक्जेंडर वाडिंगटन ओक्स नामक शख्स था। तीसरा डायरेक्टर अमरीश कुमार त्यागी, और चौथा डायरेक्टर अवनीश कुमार राय ने खुद को बताया है। अवनीश कुमार राय बिहार में कौन सी जगह का है, इसका खुलासा नहीं किया। मगर, उसका बीजेपी के मंत्री महेश शर्मा से नज़दीकियां इस कहानी के एक सिरे को पकड़ने में मदद करता है।

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बात 2009 के लोकसभा चुनाव की है, महेश शर्मा गौतमबुद्ध नगर से प्रत्याशी थे। चुनाव संभालने के वास्ते अवनीश कुमार राय जैसे कई लोग लगाये गये थे। महेश शर्मा 16 हज़ार मतों से हार गये। वो हारे क्यों? इसका पता करने के वास्ते अवनीश कुमार राय ने कैम्ब्रिज एनालिटिका से जुड़ी कंपनी 'एससीएल गु्रप' के डैन मुरेसन से संपर्क किया। रोमानियाई मूल का मुरेसन तीन लोगों के साथ नोएडा आया, और वर विधानसभा क्षेत्र का सघन सर्वे किया, डाटा तैयार किये। इस टीम ने डॉ. महेश शर्मा की हार का पूरा खाका खींच दिया था। यह एक ऐसी शुरूआत थी, जो बताती है कि बीजेपी के नेता, जो आज मोदी सरकार के मंत्री हैं, ने विदेशियों को बुलाकर लोगों की गोपनीयता चोरी करने, और उनका डाटा बैंक बनाने का जघन्य अपराध किया था।

यह वही टीम थी, जिसके संबंध अवनीश कुमार राय से आगे बढ़े, और 2010 में यह एक कंपनी के रूप में भारत में 'डाटा माइनिंग' में लग गई। गाजियाबाद में रहते, इनका कारोबार बिहार, यूपी के चुनावों तक सीमित नहीं था। घाना का एक राजनीतिक दल 2010-11 में इनके संपर्क  में आया, और ये वहां खेल कर बैठे। अफ्रीका और कई विकासशील देशों में इन्होंने डाटा चोरी का अच्छा-खासा कारोबार फैलाया। 'एससीएल गु्रप' के हाथ कितने लंबे थे, उसका अंदाज़ इसी से लगा सकते हैं कि चुनाव जिताने-हराने की 'डर्टी ट्रिक्स' से अवगत कराने के वास्ते इन्होंने नाटो के 20 खुफिया और मिल्ट्री अधिकारियों को ट्रेंड किया था। इसके लिए 'एससीएल गु्रप' को पांच लाख पौंड का भुगतान किया गया था। जो खेल ये लोग खेलते रहे, उससे चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र तो एक मज़ाक बनकर रह गया। क्या ये लोग माफी के लायक हैं?

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