क्यों नस्ली नाजी फासीवाद के निशाने पर थे गांधी और टैगोर? हिटलर समर्थक हिंदुत्ववादियों ने की थी टैगोर की हत्या की साजिश

हिटलर समर्थक हिंदुत्ववादियों ने 1916 में ही अमेरिका में रवींद्रनाथ की हत्या की साजिश की थी क्योंकि बौद्धमय भारत के मूल्य और आदर्श, बहुलता विविधता सहिष्णुता की साझा विरासत के वे प्रवक्ता थे ...

हाइलाइट्स

हिटलर समर्थक हिंदुत्ववादियों ने 1916 में ही अमेरिका में रवींद्रनाथ की हत्या की साजिश की थी

क्योंकि बौद्धमय भारत के मूल्य और आदर्श, बहुलता विविधता सहिष्णुता की साझा विरासत के वे प्रवक्ता थे और हिंदुत्व के एजंडे का प्रतिरोध भी यही है।

राष्ट्रवाद पर उनके विचारों का आज जैसे विरोध हिंदुत्ववादी कर रहे हैं, उससे तीखा विरोध उनके नोबेल मिलने के बाद हिंदुत्ववादी फासीवादी ताकतें कर रही थीं और ऐसी ताकतें क्रांतिकारी संगठनों अनुशीलन समिति और गदरपार्टी में भी थीं, जिनके तार सीधे जर्मनी से जुड़े थे।

 

रवींद्र का दलित विमर्श-बारह

पलाश विश्वास

विकीपीडिया में राजनीतिक विचारों के लिए हिंदू जर्मन क्रांतिकारियों की तरफ से रवींद्र नाथ की ह्त्या की साजिश के बारे में थोड़ा उल्लेख है।

बंगाल में अनुशीलन समिति और देशभर में सक्रिय गदर पार्टी के क्रांतिकारियों के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए सबसे बड़ी चुनौती जर्मनी के संबंध थे।

हिंदुत्व के एजंडे के लिए गांधी की तरह रवींद्र का वध भी जरूरी है

देश को आजाद कराने के लिए नेताजी भी जर्मनी, इटली और जापान की मदद से सशस्त्र क्रांति की कोशिश में थे।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनुशीलन समिति और गदर पार्टी दोनों का भारी योगदान रहा है। लेकिन इन संगठन में शामिल हिंदुत्ववादियों के लिए राष्ट्र और राष्ट्रवाद के विरुदध रवींद्रनाथ के विचार आपत्तिजनक थे।

इसलिए 30 जनवरी, 1948 में हिंदुत्ववादियों के गांधी की हत्या करने से पहले 1916 में ही भारत के हिंदुत्ववादियों ने और जर्मनी के फासीवादियों ने मिलकर रवींद्रनाथ की उनके अमेरिका यात्रा के दौरान हत्या की साजिश की जिसमें वे नाकाम हो गये।

यही नहीं, रवींद्र नाथ की चीन यात्रा के दौरान भी हिंदुत्ववादियों ने उनकी हत्या की नाकाम कोशिश की।

आर्यावर्त का भूगोल भारत का भूगोल नहीं है

भारत में हिंदुत्ववादियों के इस कारनामे की कोई खास चर्चा नहीं हुई है।

गांधी की हत्या के बारे में सभी भारतीयों को मालूम है लेकिन गांधी की हत्या से पहले टैगोर को मारने की साजिश के बारे में भारत में कम ही लोगों को पता है।

कई दिनों से फेसबुक पर अपडेट पोस्ट नहीं कर पा रहा था। आज यह रोक हटते ही इन साजिशों के बारे में बांग्लादेश में लिखे गये दो महत्वपूर्ण आलेख हमने शेयर किये हैं। Tagore`s Crisis in America : An overview एक शोध निबंध है और इसके लेखक हैं बीडीनावेल्स डाट आर्ग के सुब्रत कुमार दास तो अमेरिका और चीन में रवींद्र के खिलाफ हिंदुत्ववादी साजिश पर रवींद्रनाथ ओ कयेकटि षड़यंत्र शीर्षक आलेख रोबिन पाल ने लिखा है। परवास डाट काम पर यह आलेख उपलब्ध है।

अनेकता में एकता का विमर्श ही रवींद्र रचनाधर्मिता है और यही मनुष्यता का आध्यात्मिक उत्कर्ष भी।

नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले ब्रह्मसमाजी, अस्पृश्य पीराली ब्राह्मण रवींद्रनाथ को बांग्ला की कुलीन साहित्य बिरादरी बाकी भारत के दलितो, पिछड़ों आदिवासियों की तरह कवि या साहित्यकार मानने को तैयार नहीं थे। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उन्हें कवि क्या कविगुरु विश्वकवि, गुरुदेव कहने से न अघाने वाले लोग उनके विचारों को हजम नहीं कर पा रहे थे। राष्ट्रवाद पर उनके विचारों का आज जैसे विरोध हिंदुत्ववादी कर रहे हैं, उससे तीखा विरोध उनके नोबेल मिलने के बाद हिंदुत्ववादी फासीवादी ताकतें कर रही थीं और ऐसी ताकतें क्रांतिकारी संगठनों अनुशीलन समिति और गदरपार्टी में भी थीं, जिनके तार सीधे जर्मनी से जुड़े थे।

रवींद्र की चंडालिका में बौद्धमय भारत की गूंज है तो नस्ली रंगभेद के खिलाफ निरंतर जारी चंडाल आंदोलन की आग भी है

मई, 1916 में जापान की यात्रा के दौरान रवींद्रनाथ ने उग्र जापानी राष्ट्रवाद की तीखी आलोचना कर दी। इसके बाद वे 18 सितंबर को अमेरिका पहुंचे। अमेरिका में तब गदरपार्टी संगठित हो रही थी। पहला विश्वयुद्ध शुरु हो गया था इंग्लैंड के खिलाफ जर्मनी का युद्ध शुरू हो जाने पर भरत की आजादी के लिए सक्रिय क्रांतिकारी जाहिर है कि बहुत जोश में थे। चूंकि जर्मनी इंग्लैड के किलाफ युद्ध लड़ रही थी तो भारत के क्रांतिकारी जर्मनी को भारत का मित्र मान रहे थे और इसी के तहत अनुशीलन समिति और गदरपार्टी के क्रांतिकारी जर्मनी के समर्थन में आ गये।

इसके विपरीत जर्मनी की नाजी सत्ता के अंध राष्ट्रवाद का और सैन्य राष्ट्रवाद के खिलाफ रवींद्र शुरू से मुखर रहे हैं। जापान के बाद अमेरिका में बी राष्ट्रवाद के खिलाफ उनके भाषण से हिंदुत्ववादी जर्मनीसमर्थक क्रातिकारी सख्त नाराज हो गये।

भारत शूद्रों का ही देश है

सानफ्राससिंस्को में गदरपार्टी का केंद्र था। जहां रवींद्रनाथ ने अपने भाषण में कहा, पश्चिम तबाही की दिशा में बढ़ रहा है। इसके जवाब में गदरपार्टी के रामचंद्र ने अखबार में बयान जारी करके कहा कि रवींद्रनाथ आध्यात्मिक कवि हैं जो विज्ञान नहीं मानते। वे मुगल साम्राज्य और दूसरे शासकों के राजकाज से अंग्रेजी हुकूमत को बेहतर मानते हैं। अगर रवींद्र प्राचीन भारतीय सभ्यता के पक्ष में हैं, तो अंग्रेजों की दी सर की उपाधि उन्होनें क्यों स्वीकार कर ली।

गौरतलब है कि हिंदुत्ववादी तत्व अब भी यही प्रचार करते हैं कि रवींद्र नाथ अंग्रेजों के गुलाम थे और उन्होने जन गण मन अधिनायक जार्ज पंचम के भारत आने के अवसर पर उनकी प्रशस्ति में गाया है। इसी तर्क के आधार पर राष्ट्रवाद की आड़ में जनगण को अनिवार्य करने वाले हिंदुत्ववादी ही कल तक इसे खारिज करके वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाने की मुहिम चला रहे थे।

बहुत खतरनाक होता है गूंगा लोकतंत्र

राष्ट्रवाद के खिलाफ रवींद्र के बयान के खिलाफ थे अमेरिका में गदर पार्टी के क्रांतिकारी।

रवींद्र के अमेरिका प्रवेश से पहले रामचंद्र ने बयान जारी किया कि रवींद्रनाथ का अमेरिका में आने का मकसद साहित्यिक नहीं है बल्कि वे हिंदू क्रांतिकारी प्रचार के खिलाफ आ रहे हैं। रवींद्र ने ब्रिटिश राजकाज के पक्ष में वक्तव्य रखते हुए भारतीयो के स्वायत्त शासन के खिलाफ भाषण दिया तो इसपर गदर पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया जतायी। इस विरोध के मध्य 5 अक्तूबर को पैलेस होटल के सामने रवींद्रनाथ पर हमले की कोशिश हो गयी। इस हमले के पीछे गदरपार्टी का हाथ बताया गया और अमेरिकी अखबारों में इस रवींद्र की हत्या का नाकाम प्रयास बताया गया। हालांकि रवींद्र नाथ ने इसे हत्या की साजिश मानने से इंकार कर दिया।

भारत चीन विवाद : अमेरिका-इजराइल के दम पर राष्ट्र की एकता और अखंडता को दांव पर लगाना भी राष्ट्रद्रोह है

रवींद्र की चीन यात्रा के दौरान भी रवींद्र की यात्रा के मकसद पर सवाल खड़े किये गये और बीजिंग से लेकर नानकिंग तक रवींद्र की सभाओं में गड़बड़ी फैलाने की कोशिशें हुईं।

जर्मनी में रवींद्र को खुले तौर पर गद्दार कहा जाता रहा और उनकी रचनाएं निषिद्ध की जाती रही। उनके बाषण सेंसर होते रहे। वहां रवींदर्नाथ को यहूदी बताया गया और उनका नाम रब्बी नाथन प्रचारित किया गया। उनके खिलाफ लगातार विषैले प्रचार जारी रहे और उनकी जरमनी यात्रा की भी आलोचना की जाती रही।

मोदी और आरएसएस आक्रामक प्रचार अभियान से अपनी असफलताओं को छिपाने में सफल रहे

1925 में इटली जाने पर तो रवींद्र को मुसोलिनी के समर्तन में बयान जारी करना पड़ा और जिसे इटली के समाचार पत्रों में खूब प्रचारित किया गया। बाद में रवींद्र ने अपनी गलती भी मान ली।  

इन साजिशों पर चर्चा से पहले बुनियादी सवाल यह है कि गांधी और टैगोर दोनों हिंदुत्ववादियों के निशाने पर क्यों हैं, यह हिंदुत्व के फासीवादी नस्ली जनसंहारी एजंडे को समझने के लिए बेहद जरूरी है।

अनुशीलन समिति और गदर पार्टी का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारी योगदान रहा है और इसके हिंदुत्ववादी तत्वों ने ही रवींद्र की हत्या की कोशिश की। इसके विपरीत गांधी के हत्यारों से जुड़े हिंदुत्ववादी संगठनों का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं है बल्कि शुरु से आखिर तक वे क्रातिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम के विरुद्ध ब्रिटिश हुकूमत के पक्ष में लामबंद थे।

टैगोर के वैदिकी साहित्य के महिमामंडन से बहुजनों और प्रगतिशील साथियों में भी यह धारणा बनी है कि जमींदार तबके के कुलीन रवींद्रनाथ हिंदुत्व के प्रवक्ता हैं।

समूचे रवींद्र साहित्य पर बौद्धमय भारत की अमिट छाप

गौरतलब है कि बंकिम के वंदेमातरम में बंगमाता को भारतमाता में रवींद्रनाथ ने ही बदला और कांग्रेस के मंच से इस गीत को राष्ट्रीय गान में बदलने की पहल भी रवींद्र नाथ ने।

रचनाओं और निबंधों में भारत की समस्या को सामाजिक मानते हुए अस्पृश्यता का विरोध करते हुए और बौद्धमय मूल्यों और आदर्शों को बौद्ध कथानक के आधार पर भारत में मनुष्यता के धर्म के रुप में प्रस्तुत करने वाले रवींद्र नाथ ने ब्राह्मणों या ब्राह्मणवाद के खिलाफ कुछ नहीं लिखा है।

पुरोहित तंत्र का विरोध करते हुए धर्मस्थलों में कैद ईश्वर की चर्चा करते हुए वे ब्राह्मणों की जन्मगत द्विजता के संदर्भ में सभी आर्यों की द्विजता की बात करते हैं तो सामाजिक नेतृत्व में ब्राह्मणों की भूमिका के नस्ली वर्चस्ववाद में बदल जानने की आलोचना के बावजूद ब्राह्मणों के सामाजिक नेतृत्व पर वैदिकी संस्कृति के अनुरुप जोर देते हैं। ब्राह्मणों की उनकी आलोचना ही ब्राह्मणवाद और ब्रहा्मणतंत्र पर कुठाराघात है और इसके लिए हिंदुत्ववादियों ने उन्हें कभी माफ नहीं किया।

इस राष्ट्रवाद के मसीहा तो हिटलर और मुसोलिनी हैं

गौरतलब है कि भारत में संत परंपरा में सामंतवाद विरोधी आंदोलन में भी मनुष्यता के धर्म पर जोर है और वहां भी आस्था का लोकतंत्र है और पुरोहित तंत्र औरदैवी वर्चस्व के किळाफ मनुष्यता के पक्ष में मनुष्यकेंद्रित आध्यात्म है जो रवींद्र के गीतांजलि का लोक और आध्यात्म दोनों हैं, इस पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे। लेकिन यह खास गौरतलब है कि सामंतवाद विरोधी दैवीसत्ता विरोधी संत आंदोलन में भी ब्राह्मण, ब्राह्मणवाद और वैदिकी संस्कृति का मुखर विरोध नहीं है। लेकिन यह सारा आंदोलन ब्राह्मण धर्म और ब्राह्मणवाद के विरोध में है और सबसे खास बात यह है कि भारत का बहुजन आंदोलन की नींव इसी संत आंदोलन में है।

दलित आदिवासी पिछड़ा विमर्श बौद्धमय भारत की नींव पर खड़ा है जिसे संतों के आंदोलन ने मजबूत किया है और टैगोर और गांधी दोनों इसी विरासत के तहत सामाजिक यथार्थ के मुताबिक बहुसंख्य भारतीयों को संबोधित करते हुए औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के साथ साथ फासीवादी हुंदुत्व का विरोध कर रहे थे। इसलिए हिंदुत्ववादियों की निगाह में आज भी ये दोनों सबसे बड़े शत्रु बने हुए हैं।

मजहबी सियासत के हिंदुत्व एजंडे से मिलेगी आजादी स्त्री को?

यह मामला बहुत आसान नहीं है क्योंकि टैगोर और गांधी दोनों ने भारतीय समाज के धार्मिक चरित्र के हिसाब से भारतीय यथार्थ का मूल्यांकन करते हुए बोला और लिखा है।

भारतीय समाज के इस धार्मिक चरित्र और आचरण को समझे बिना खालिस राजनीतिक वैचारिक विशुद्धता से फासीवादी नस्ली हिंदुत्व के एजंडा का मुकाबला असंभव है और भारत में प्रगतिशील, बहुजन और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के अलावा खुद गांधीवादी भी भारतीय समाज के इस यथार्थ और चरित्र को समझने से सिरे से इंकार करते रहे हैं और जाने अनजाने हिंदुत्ववादियों के पाले में बहुसंख्य जनता को धकेलने का काम करते रहे हैं।

रवींद्र ने शूद्रधर्म शीर्षक निबंध में साफ भी किया है कि शूद्रों की हिंदुत्व में अटूट आस्था ही नस्ली विषमता की व्यवस्था मजबूत होते रहने का मुख्य आधार है।

दिनचर्या और संस्कारों में ब्राह्मणधर्म के मनुस्मृति अनुशासन से बंधा जकड़ा भारत के बहुजन आंदोलन का सारा विमर्श ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के खिलाफ है, जिसके तहत गांधी और रवींद्र के बौद्धमय भारत केंद्रित दर्शन को समझना मुश्किल है। इसलिए बहुजन गांधी को दुश्मन नंबर वन मानते हैं और बहुजन पुरखों की विरासत में अस्पृश्य रवींद्र को शामिल करने के बजाय उन्हें ब्राह्मण मानते हैं।

पुरखों के भारतवर्ष की हत्या कर रहा है डिजिटल हिंदू कारपोरेट सैन्य राष्ट्र!

इस सामाजिक यथार्थ को समझे बिना राष्ट्रवाद और राष्ट्र के विरोध में रवींद्र के विचारों से असहमति की वजह से हिंदुत्ववादियों के रवींद्र विरोध के तर्क को समझा जा सकता है लेकिन मनुस्मृति, जाति वर्णव्यवस्था और हिंदुत्व के प्रवक्ता गांधी की हत्या का तर्क समझना मुश्किल है।

रवींद्र और गांधी में मतभेद भी भयंकर रहे हैं।

रवींद्र ने गांधी की चरखा क्रांति की कड़ी आलोचना की है तो प्राकृतिक विपदा को गांधी के ईश्वर का रोष बताने का भी उन्होंने जमकर विरोध किया है। लेकिन दोनों का स्वराज कुल मिलाकर हिंद स्वराज है जो हिंदुत्व के अंध राष्ट्रवाद के खिलाफ है।

भारत माता की जयजयकार करते हुए, वंदे मातरम गाते हुए देश की हत्या का यह युद्ध अपराध है

भारत के प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष लोग भारत के सामाजिक यथार्थ और सामाजिक संरचना को सिरे से समझने से लगातार इंकार करते रहे हैं और हिंदुत्व के एजेंडे और फासीवाद के विरोध में वे बहुसंख्य हिंदुओं की आस्था पर चोट करते रहे हैं जिसके नतीजतन नस्ली वर्चस्व के फासीवादी हिंदुत्व के पुनरूत्थान की जमीन बीतर ही भीतर पकती चली गयी और सतह से बाहर निकलकर वह भयंकर सुनामी में तब्दील है।

रवींद्रनाथ और गांधी दोनों भारतीय समाज और आम जनता पर धर्म के सर्वव्यापी असर को बेहद गहराई से समझते थे और आम जनता की आस्था को चोट पहुंचाये बिना वैदिकी संस्कृति का हवाला देकर बौद्धमय भारत के समता और न्याय, सत्य, अहिंसा और प्रेम पर आधारित मनुष्यता के धर्म को भारत की साझा विरासत के रुप में मजबूत कर रहे थे।

पूंजीवादी विकास और पूंजी पर आधारित सैन्य राष्ट्र के खिलाफ इसलिए टैगोर और गांधी के विचार हिंदुत्व के फासीवादी एजंडे के लिए सबसे खतरनाक है।

रवींद्र ने अपने निबंध भारतवर्षेर इतिहास में सत्ता संघर्ष में शामिल सत्ता वर्ग के इतिहास के बजाय जनपद और लोक में रचे बसे भारतीयों की बात की है।

युद्ध अपराधियों के सत्ता संघर्ष में भारतवर्ष लापता... यह जनगणमन का भारतवर्ष नहीं

कल हमने इसकी चर्चा करते हुए जानबूझकर भारतवासी का अनुवाद भारतवर्ष किया है क्योंकि यह रवींद्र विमर्श का , उनके दलित विमर्श का भी प्रस्थानबबिंदु है कि भातरवर्ष भारतवासियों से बना है, सत्ता वर्ग के नस्ली वर्चस्व से नहीं और इस भारत वर्ष का आधार विविधता बहुलता अनेकता में एकता और सहिष्णुता की साझा लोक लोकतांत्रिक जनपदकेंद्रित विरासत है।

रवींद्र और गांधी दोनों इसी भारतवर्ष के प्रवक्ता थे जो आज भी हिंदुत्व के फासीवादी कारपोरेटएजंडे के विरोध में है।

कृपया अब कल के अनुवाद को सुधार कर पढ़ेंः

কিন্তু এই রক্তবর্ণে রঞ্জিত পরিবর্তমান স্বপ্নদৃশ্যপটের দ্বারা ভারতবর্ষকে আচ্ছন্ন করিয়া দেখিলে যথার্থ ভারতবর্ষকে দেখা হয় না। ভারতবাসী কোথায়, এ-সকল ইতিহাস তাহার কোনো উত্তর দেয় না। যেন ভারতবাসী নাই, কেবল যাহারা কাটাকাটি খুনাখুনি করিয়াছে তাহারাই আছে।

लेकिन इस रक्तरंग रंजित परिवर्तनमान स्वप्नदृश्यपट द्वारा भारतवर्ष को आच्छन्न करके देखने पर यथार्थ के भारतवर्ष का दर्शन नहीं होता। भारतवासी कहां है, इस तरह का इतिहास इसका कोई जवाब नहीं देता। इससे लगता है कि भारतवासी हैं ही नहीं , जो मारकाट खूनखराबा करते रहे हैं, वे ही हैं। 

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