जाग मछन्दर गोरख आया : गोरखनाथ की शिक्षा का दशांश भी लागू करके दिखाएं आदित्यनाथ ! तय मानो सीधे हो जाएंगे आरएसएस वाले

’गोरक्षनाथ अपने युग के महान् धर्मनेता थे। उनकी संगठन-शक्ति अपूर्व थी। उनका समर्थ धर्मगुरु का व्यक्तित्व था। ...

गोरखनाथ का व्यक्तित्व और समस्याएँ –

योगी जागो गोरखनाथ जगाओ!

जगदीश्वर चतुर्वेदी

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ यदि सच में योगी गोरखनाथ की शिक्षाओं में विश्वास करते हैं तो बस उसका दशांश लागू करके दिखाएं! तय मानो आरएसएस वाले सीधे हो जाएंगे और गऊ-छोरी-मजनूँ -राम मंदिर आदि सब भूल जाएंगे! रामजी तो बस जंगल में टहलने निकल जाएंगे। दूसरी बडी बात यह कि स्वयं मुख्यमंत्री के अब तक के सभी साम्प्रदायिक भाषणों का विलोम पैदा हो जाएगा! योगी जागो गोरखनाथ जगाओ!

गोरखनाथ का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक और प्रेरणादायक है। नाथों-सिद्धों के साहित्य और सिद्ध और नाथ लेखकों को लेकर जितने भी भ्रम हिंदी आलोचना में हैं उनके निराकरण में उनके व्यक्तित्व विश्लेषण से मदद मिलती है।

नाथ- सिद्ध साहित्य बुनियादी तौर पर मिथभंजन करता है। जो लोग नाथों - सिद्धों के बारे में मिथ बनाकर स्टीरियोटाइप समीक्षा लिखते रहे हैं वे जानते हैं कि सिद्ध और नाथ साहित्य को स्टीरियोटाइप ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता।

नाथों और सिद्धों के बारे में यह मिथ है कि वे अनपढ़ थे। संवेदनशील नहीं थे। बुद्धिमान नहीं थे। असामाजिक थे। नशेड़ी थे। समाज बहिष्कृत थे या समाज के बाहर रहते थे। अराजक थे। ये सारी धारणाएँ ग़लत हैं। दुर्भाग्य है कि हिंदी समीक्षा में ये सारी धारणाएँ रामचन्द्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध से होकर पहुँची हैं। नाथ और सिद्धों के साहित्य को देखने का यह स्टीरियोटाइप मूल्याँकन है।

अपने युग के महान् धर्मनेता थे गोरक्षनाथ

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, ’गोरक्षनाथ अपने युग के महान् धर्मनेता थे। उनकी संगठन-शक्ति अपूर्व थी। उनका समर्थ धर्मगुरु का व्यक्तित्व था। उनका चरित्र स्फटिक के समान उज्जवल,बुद्धि भावावेश से एकदम अनाविल और कुशाग्र तीव्र थी। उनके चरित्र में कहीं भाव विह्वलता नहीं है। जिन दिनों उन्होंने जन्मग्रहण किया था, उन दिनों भारतीय धर्म साधना की अवस्था विचित्र थी। शुद्ध जीवन, सात्विक वृत्ति और अखंड ब्रह्मचर्य की भावना उन दिनों निम्नतम सीमा तक पहुँच चुकी थी। गोरक्षनाथ ने निर्मम हथौड़े की चोट से साधु और गृहस्थ दोनों की कुरीतियों को चूर्ण- विचूर्ण कर दिया।'

‘वे स्वयं पण्डित व्यक्ति थे। पर यह अच्छी तरह जानते थे कि पुस्तक लक्ष्य नहीं साधन है। उन्होंने किसी से भी समझौता नहीं किया। लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं ; परन्तु फिर भी उन्होंने समस्त प्रचलित साधना मार्ग से उचित भाव ग्रहण किया। केवल एक वस्तु वे कहीं से न ले सके वह है भक्ति। वे ज्ञान के उपासक थे और लेशमात्र भी भावुकता को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।’

गोरक्षनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे। उन्होंने जिस धातु को छुआ वही सोना हो गया

द्विवेदी जी के उद्धरण से यह बात साफ़ है कि नाथ कम से कम अनपढ़,जाहिल और गँवार वहीं थे। वे ज्ञान के उपासक थे। द्विवेदीजी ने लिखा है’गोरक्षनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे। उन्होंने जिस धातु को छुआ वही सोना हो गया।’

गोरक्षनाथ और अन्य कवियों की विशेषता है कि उन्होंने कविता को समाज के ज्वलंत सवालों से जोड़ा। सामाजिक कुरीतियों और अंध विश्वासों का विरोध करना बहुत बड़ा काम है और कविता की नई सामाजिक भूमिका की तलाश भी है। कविता को श्रृंगार और दरबार के विषयों के दायरे निकालकर बाहर लाना और जीवन के नए विषयों पर कविता लिखने के लिए लेखकों को प्रेरित करना महत्वपूर्ण काम है।

कविता और सामाजिकता का सकारात्मक रिश्ता पहलीबार बनता है और कविता के क्षेत्र में पहलीबार जीवन के ज्वलंत प्रश्न दाख़िल होते हैं। प्रासंगिकता और सामयिकता कविता में दाख़िल होते हैं। कविता और उसकी अंतर्वस्तु में दूरी ख़त्म होती है। कविता के समय और लेखक के समय में अंतराल ख़त्म होता है।

नाथों- सिद्धों की कविता ने दूसरा महत्वपूर्ण काम यह किया कि उसने कविता और विचारधारा के अंतस्संबंध को प्रत्यक्ष बना दिया। पहले यह संबंध प्रच्छन्न था। कविता और विचारधारा के अंतस्संबंध के आधार पर कविता की नई धारणा का आरंभ होता है।

कविता की समाजनिरपेक्षता ख़त्म होती है और लेखककी स्वायत्तता जन्म लेती है। ये कविगण मन के राजा थे जो कुछ मन में आता था वही लिखते थे। यानी लेखक की संप्रभु सत्ता का उदय होता है और लेखक अपने बारे में कुछ भी नहीं छिपाता। लेखक के निजी विवरण पहलीबार सामने आते हैं जबकि संस्कृत के लेखक निजी विवरण छिपाते थे।

नाथों- सिद्धों के साहित्य का विवेचन करते हुए पहलीबार यह हुआ है कि लेखक की जीवनशैली से जोड़कर लेखक के बारे में राय बनायी गयी है,यह मूल्याँकन की ग़लत पद्धति है।

लेखक के बारे में राय जीवनशैली,ख़ानदान,संगति, खानपान,रिहायश,शिक्षा-अशिक्षा आदि के आधार पर नहीं बनायी जानी चाहिए। लेखक का मूल्याँकन उसकी रचना के आधार होना चाहिए और रचना में व्यक्त विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को महत्व दिया जाना चाहिए।

नाथों- सिद्धों ने जिन तीन मसलों को महत्ता दी वे आज भी समस्या बने हुए हैं। ये हैं -१.अंधविश्वास,२. सामाजिक कुरीतियाँ और ३.रूढ़िवाद, ये तीनों आज भी सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती बने हुए हैं। समाज में वैचारिकतौर पर प्रतिगामी ताक़तें आज भी इन तीनों का जमकर दुरुपयोग कर रहे हैं। हमारे यहाँ किसी भी क़िस्म के आधुनिक विचार, संस्कार, मूल्य और एटीकेट के विकास में ये तीनों तत्व आज भी पग - पग पर बाधाएँ खड़ी कर रहे हैं।

नाथों - सिद्धों के साहित्य के आने साथ लेखक की सामाजिक हस्तक्षेपकारी भूमिका हो सकती है, यह बात भी सामने आई। पहले लेखक दर्शक मात्र होता था और भोक्ता होता था। लेकिन नए हालात में वह समाज में कविता के ज़रिए सक्रिय हस्तक्षेप कर सकता था। यह नया पैराडाइम है। लेखक मात्र सर्जक और भोक्ता नहीं है, बल्कि उसकी सामाजिक प्राणी के तौर पर नए विचारों के प्रतिपादन में बड़ी भूमिका होती है।

वे पहले लेखक थे जो’समाज’की प्रचलित धारणा को नहीं मानते थे। वे’समाज’की कोटि में बनाए संरचनात्मक रुपों और वर्गीकरणों को अस्वीकार करते थे।

नाथों- सिद्धों ने किताबें नहीं लिखीं,काव्यग्रंथ नहीं लिखे, क्योंकि इन रुपों के साथ लेखक की समझ भी जुड़ी थी। वे नए क़िस्म के मीडियम और विधारुप को निर्मित करते हैं वे’संवादग्रंथ’लिखते हैं। वे काव्यात्मकता और वैचारिक वर्चस्व को सीधे चुनौती देते हैं। वे कविता में’संवाद’को ले आते हैं।

विचारों को कविता में ले आते हैं। विवाद यह है कि ये उपदेश ग्रंथ किसके लिए हैं ? क्या ये योगियों के लिए हैं या सबके लिए हैं ? द्विवेदीजी का मानना है कि ये उपदेश योगियों के लिए लिखे गए हैं। हमारी राय है साधारणजन के लिए लिखे गए हैं।

योगियों का काव्यबोध सामान्य नागरिक के मनोभावों की अभिव्यक्ति करता है। उनका जीवन के प्रति विकसित नज़रिया है।

योगियों के अनुसार गुरु -शिष्य सम्बंध में गुरु वह है जो ज़्यादा जानता है।यानी गुरु का आधार ज्ञान है।जाति, वर्ण, वंश,गद्दी आदि के आधार पर गुरु को नहीं देखा जाना चाहिए।

हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार योगियों ने जिन महत्वपूर्ण बातों पर ज़ोर दिया वह है चित्त या मन की दृढ़ता और शुद्धता। तीर्थाटन का निषेध। काम, क्रोध में आसक्ति नहीं। हँसना-खेलना निषिद्ध नहीं है। गाने-बजाने का निषेध नहीं है। चित्त की शिथिलता का निषेध है। वाद-विवाद के बखेड़े में नहीं पड़ना चाहिए। गुरु की बात माननी चाहिए। सोच- समझकर बोलना चाहिए। धीरभाव से एक-एक पग रखना चाहिए। गर्व करना बुरी बात है। व्यवहार सहज होना चाहिए। वाणी और वीर्य का संयम रखो। नशे की चीज़ों का सेवन करना अनुचित है। पर-निंदा और नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाला नर्क जाता है।

नाथपन्थी पुस्तकों की खिल्ली उड़ाते थे। गोरखपंथी मानते थे -

‘घर -घर में पुस्तक के बोझ ढोने वाले विद्यमान हैं, नगर -नगर में पंडितों की मंडली मौजूद है, वन वन में तपस्वियों के झुण्ड वर्तमान हैं, किंतु परब्रह्म को जानने वाला कोई नहीं।’(गोरक्ष सिद्धांत संग्रह)

यह भी लिखा -

‘सभी सम्प्रदाय कहते हैं कि ग्रंथ हज़ारों की संख्या में हैं। मेरी बात मानों तो सभी को कुँए में फेंक दो। भला जो लोग आधुनिक समय में स्वयं मुक्त नहीं हो सके ; वे दूसरे को मुक्ति का उपदेश दे सकते हैं,यह कैसे मान लिया जाय ? जो व्यक्ति लोगों को अचरज में डाल देने के लिए,या अभिमानवश या जीविका के लिए, या व्यसन के लिए ; या अन्य किसी अभिलषित वस्तु की प्राप्ति के लिए ग्रन्थ लिखा करता है वह धर्मार्थी पुरुषों के आगे कैसे शोचनीय हो सकता है ?’

योग-बीज में कहा -

‘सैंकडों तर्क-व्याकरणादि ग्रन्थों से वृद्ध होकर ये ज्ञानमूढ लोग शास्त्रों के जाल में बुरी तरह फँस गए हैं, जिस अनिर्वाच्य पद को देवता भी नहीं बता सकते, उसे ये शास्त्र क्या बताएँगे ?’

गुरू कौन नाथ कौन ?

हजारी प्रसाद द्विवेदीजी के अनुसार ’गोरखनाथ के यहाँ गुरु पद की बड़ी महिमा गाई गयी है। गुरु ही समस्त ग्रंथों का मूल है और एकमात्र अवधूत ही गुरू पद का अधिकारी है।’

नाथ कौन है

इसी तरह नाथ वह है

'जो वर्णाश्रम धर्म से परे है और समस्त गुरुओं का साक्षात गुरु है। न उससे कोई बड़ा है और न बराबर। इस प्रकार के पक्षपात - विनिर्मुक्त योगेश्वर को ही’नाथ -पद’की प्राप्ति होती है।'

नाथों ने गुणमय वर्ण और गुणमय आश्रम का अभिमान करने वाले को गुरु नहीं बनाया। गोरखनाथ मानते थे कि ऐसे के साथ गुरु - शिष्य संबंध उसी प्रकार निष्फल है जिस प्रकार दो स्त्रियों के सम्बन्ध से पुत्र प्राप्ति का आशा।

'नाथ’यानी - ना यानी ब्रह्म जो मोक्ष दान में दक्ष है, उनका ज्ञान कराना, ’थ’यानी अज्ञान के सामर्थ्य को स्थगित करने वाला। अर्थात मोक्ष के तत्वों का ज्ञान कराने वाला नाथ है।

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