गुजरात : विकास तो हो गया लापता

गुजरात में इस बार भाजपा को न तो विकास के गुजरात मॉडल पर भरोसा है और न उसे अपना जाना-पहचाना सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथकंडा चलता नजर आ रहा है। ...

0 राजेंद्र शर्मा

बेशक, जो हुआ उसके आसार पहले से नजर आ रहे थे। गुजरात के अपने चुनाव प्रचार में खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ‘‘विकास’’ के दावों को बाकायदा छोड़ दिया है। विकास के कथित ‘‘गुजरात मॉडल’’ पर उठ रहे तीखे सवालों का और खासतौर पर इसके मुट्ठीभर उद्योगपतियों पर उचित-अनुचित हर तरह से कृपा बरसाने और शहरी मेहनतकशों तथा किसानों को तरसाने पर सवालों का, भाजपा और मोदी से जवाब देते ही नहीं बन रहा है। उनके पास इसका भी कोई जवाब नहीं है कि कथित गुजरात मॉडल कैसे मुस्लिमविरोधी तथा मजदूरविरोधी व महिलाविरोधी से आगे दलित-आदिवासीविरोधी, पिछड़ाविरोधी, किसानविरोधी और युवाविरोधी बन गया है। गुजरात में विकास के पगलाने के जवाब में ‘मैं विकास हूं, मैं गुजरात हूं’ का भाजपा का नारा जनता को कोई खास प्रभावित नहीं कर पाया है। इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ने गुजरात में अपने विकास के माडल का बचाव पेश करने के बजाए अपना पूरा जोर, इन मुश्किल सवालों को उठा रहे विपक्ष को बदनाम करने के लिए, ओछे निजी हमलों पर लगा दिया है। विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि इस मुहिम का नेतृत्व सीधे खुद प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं। यह दूसरी बात है कि इसके  बावजूद, भाजपा इसकी शिकायतें करना भी जारी रखे हुए है कि उसकी राजनीति तो विकास की राजनीति है जिसके खिलाफ, विपक्ष जातिवादी राजनीति का सहारा ले रहा है।

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    अपने चुनाव अभियान के अंतिम चरणों की धमाकेदार शुरूआत के लिए प्रधानमंत्री ने अपनी गुजराती पहचान को मुख्य थीम बनाया है। एक के बाद एक चुनाव सभाओं में प्रधानमंत्री ने यह कहकर कांग्रेस और खासतौर पर राहुल गांधी के उठाए सवालों की काट करने की कोशिश की है कि बाहर से लोग गुजरात में आकर, गुजरात के पुत्र की आलोचनाएं करने की जुर्रत कर रहे हैं। इस हिमाकत का जवाब गुजरात की जनता को देना होगा।

गुजराती अस्मिता की दुहाई देना और इसी के हिस्से के तौर पर अपने राजनीतिक विरोधियों को गुजरातविराधी बनाकर पेश करना बेशक, नरेंद्र मोदी का जाना-पहचाना हथकंडा रहा है। 2002 के मुस्लिमविरोधी नरसंहार की पृष्ठभूमि में हुए मुख्यमंत्री के रूप में अपने गुजरात के पहले चुनाव से ही नरेंद्र मोदी पांच करोड़ गुजरातियों के सम्मान की दुहाई को आजमाते आ रहे हैं और कांग्रेस को गुजरातीविरोधी साबित करने की कोशिश करते आ रहे हैं।

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        लेकिन, इस बार इस दुहाई को गुजरात के साथ कांग्रेस के ‘अन्यायों’ की लंबी-चौड़ी सूची गिनाने के साथ जोड़ऩे के जरिए, एक नया ही आयाम दे दिया गया है। वैसे इसकी शुरूआत भी तभी हो गयी थी जब चुनाव आयोग पर दबाव डालकर गुजरात में चुनाव की तारीखों की घोषणा टलवाने के बाद, नरेंद्र मोदी ने गुजरात के एक के बाद एक दौरों में, इस बार के चुनाव के भाजपा के प्रचार का मुख्य स्वर तय किया था। प्रचार के अंतिम चरण तक आते-आते आजादी के बाद से गुजरात के साथ ऐतिहासिक अन्यायों की सूची और लंबी हो गयी है और उसमें सरदार पटेल के साथ अन्याय, मोरारजी देसाई के साथ अन्याय, नर्मदा परियोजना के मामले में अन्याय आदि के साथ अब इस तरह के आक्षेप और जुड़ गए हैं कि इंदिरा गांधी जब प्राकृतिक आपदा के समय हालात का जायजा लेने मोरवी आयी थीं, नाक पर रूमाल बांध कर आयी थीं। उन्हें बुदबू आ रही थी! कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह श्रीमती गांधी का नाम लेकर, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर भी हमला करने की कोशिश की जा रही थी, जो उनके पोते हैं।

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          लेकिन, प्रधानमंत्री का चुनाव अभियान अगर गुजराती अस्मिता और गुजराती गौरव की दुहाइयों तक ही सीमित रहता तब भी गनीमत थी। इससे आगे बढक़र, इस अभियान में हिंदुत्व का दोहन करने पर भी उतना ही जोर है, जिसकी शुरूआत भी प्रधानमंंत्री के चुनाव प्रचार के पिछले अघोषित चरण से ही हो गयी थी। बेशक, पिछले दो दशकों से और खासतौर पर 2002 के मुस्लिमविरोधी नरसंहार के बाद से, हर चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा के चुनाव प्रचार का चेहरा मुस्लिमविरोधी बना रहा है। यहां तक कि इस लंबे अर्से में भाजपा गुजरात में न सिर्फ मुसलमानों को पूरी तरह से डराकर उनसे एक तरह से आत्मसर्पण कराने में कामयाब रही है बल्कि अपने विरोधियों को भी इसके लिए मजबूर करने में कामयाब रही है कि प्रकटत: मुसलमानों के साथ खड़े होने से दूर रहें वर्ना उन्हें मुस्लिमपरस्त घोषित कर, भाजपा उनके खिलाफ हिंदुओं का ध्रुवीकरण कर लेगी। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की मौजूदा चुनाव की कार्यनीति पर इसका असर साफ तौर पर देखा भी जा सकता है, जो सचेत रूप से इसका प्रयास कर रही है कि मुसलमानों के साथ खड़ी दिखाई न दे। यह राजनीतिक प्रक्रिया से मुसलमानों के लगभग पूरी तरह से बाहर ही कर दिए जाने का मामला है, जिसके दूरगामी नतीजे बहुत खराब होंगे।

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  जाहिर है कि भाजपा के ही दबाव में, कांग्रेस इतने पर ही नहीं रुकी है। राहुल गांधी के नेतृत्व में वह सचेत रूप से यह साबित करने में भी जुटी हुई है कि वह किसी भी तरह से भाजपा से कम ‘‘हिंदू’’ नहीं है। यही सिलसिला उस समय अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा जब राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर के दौरे पर भाजपा द्वारा उठाए गए गैर-हिंदू रजिस्टर में प्रविष्टि के विवाद के जवाब में, खुद राहुल गांधी भी यह स्पष्ट करने की हद तक चले गए कि अपनी दादी की तरह वह भी शिवभक्त हैं। गनीमत सिर्फ इतनी रही कि इसके साथ ही वह इतना जोडऩा नहीं भूले कि वह इन विषयों को निजी क्षेत्र के विषय मानते हैं और इसलिए सार्वजनिक जीवन में अपने धार्मिक विश्वासों की चर्चा करना पसंद नहीं करते हैं। इससे पहले ही कांग्रेस प्रवक्ता यह स्पष्ट कर चुके थे कि राहुल गांधी एक ‘जनेऊधारी हिंदू’ हैं। साफ है कि भाजपा के दबाव में ही सही, मुख्य विपक्षी पार्टी इस चुनाव में धर्मनिरपेक्ष मैदान खाली करती नजर आती है। इसे कई टिप्पणीकारों ने कांग्रेस का ‘साफ्ट हिंदुत्व’ को अपनाना कहा है, तो यह गलत भी नहीं है।

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बहरहाल, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि कांग्रेस के इस पैंतरे ने भाजपा के लिए, इस चुनाव में सांप्रदायिक दुहाई का इस्तेमाल मुश्किल बना दिया है। जवाब में भाजपा चुनाव अभियान के शुरू  से कांग्रेस के नेताओं के मंदिरों में जाने के ‘अधिकार’ पर सवाल उठाती आयी है। इसकी शुरूआत, विधिवत चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही योगी आदित्यनाथ तथा शिवराज सिंह चौहान के गुजरात दौरों के साथ हो गयी थी। बहरहाल, अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अभियान में कूद पड़े हैं। ताजातरीन सोमनाथ विवाद की पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री राहुल गांधी को यह याद दिलाने की हद तक चले गए कि वह जिस सोमनाथ मंदिर में गए थे, उनके पडऩाना जवाहरलाल नेहरू ने नहीं बनवाया था बल्कि उन्होंने तो राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्घार के उद्घाटन के लिए जाने का विरोध किया था। यहां आकर भाजपा के हिसाब से विपक्ष का गुजरातविरोध और हिंदूविरोध एक हो जाता है!

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     आखिरकार, चुनाव में हार-जीत का फैसला तो वोटों की गिनती के बाद ही होगा। लेकिन, इतना तय है कि गुजरात में इस बार भाजपा को न तो विकास के गुजरात मॉडल पर भरोसा है और न उसे अपना जाना-पहचाना सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथकंडा चलता नजर आ रहा है। इन हालात में सत्ताधारी पार्टी बदहवासी में चारों ओर हाथ-पांव मार रही है, शायद कोई तुक्का बैठ जाए।    

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