हिन्दुत्ववादियों का इतिहास, कल्पना से भी अधिक काल्पनिक है

हिन्दुत्ववादियों ने बिना विचार किए इलिएट और डाउसन के औपनिवेशिक इतिहास लेखन को स्वीकार कर लिया और उसे आगे बढ़ाया।...

Irfan Engineer

हिन्दुत्व और इतिहास

-इरफान इंजीनियर

ताजमहल के सम्बन्ध में भाजपा विधायक संगीत सोम के बयान से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का इतिहास, कल्पना से भी अधिक काल्पनिक है। इतिहास उनके हाथों में एक ऐसा उपकरण है, जिसके ज़रिए वे अपनी विचारधारा को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना चाहते हैं। उनकी विचारधारा के अनुसार, इस्लाम और ईसाई धर्म विदेशी हैं क्योंकि उनकी पवित्र भूमि, भारत (अर्थात सिंधु नदी से लेकर अरब सागर से बीच का भूभाग) के बाहर स्थित है। भारतीय संविधान, मुसलमानों और ईसाईयों को भारत के नागरिक का दर्जा देता है। परंतु हिन्दुत्व की राजनीतिक विचारधारा उन्हें विदेशी मानती है, जिन्हें या तो नागरिक का दर्जा दिया ही नहीं जाना चाहिए या उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में देश में रहने पर मजबूर किया जाना चाहिए। हिन्दुत्व, सभी हिन्दुओं का आह्वान करता है कि वे ‘विदेशी धर्मों’ और उनके मानने वालों के खिलाफ संघर्ष करें। हिन्दुत्ववादी चिंतक विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दुओं से यह आह्वान किया था कि वे ‘‘राजनीति का हिन्दूकरण करें और हिन्दुओं का सैन्यीकरण’’। राजनीति के हिन्दूकरण से अर्थ है ऊँची जातियों के हिन्दुओं का राजनीतिक और सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना।

हिन्दुत्ववादी, ‘विदेशी धर्मों’ के खिलाफ जो लड़ाई लड़ना चाहते हैं, उसे औचित्यपूर्ण सिद्ध किए जाने की ज़रूरत तो है ही, साथ ही इसके लिए नीची जातियों के हिन्दुओं को लामबंद किया जाना भी आवश्यक है क्योंकि उनकी मदद के बगैर यह युद्ध नहीं लड़ा जा सकता। हिन्दुत्ववादियों को नीची जातियों के हिन्दुओं को यह समझाना होगा कि वह हिन्दू धर्म, जो अत्यंत दमनकारी जाति व्यवस्था का पोषक है और हिन्दुओं के ही एक तबके को अछूत मानता है और उन्हें मनुष्य का दर्जा भी नहीं देता, वह हिन्दू धर्म, ‘विदेशी’ इस्लाम और ईसाई धर्म से श्रेष्ठ है। हिन्दुओं के सैन्यीकरण के लिए यह ज़रूरी है कि मुसलमानों और ईसाईयों का दानवीकरण किया जाए। इस दानवीकरण के लिए इतिहास को एक उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया गया। हिन्दुत्ववादी चिंतकों ने इतिहास को कल्पना और कल्पना को इतिहास बताना शुरू कर दिया। उन्होंने पौराणिक मिथकों और इतिहास के बीच की विभाजक रेखा को गायब कर दिया।

हिन्दुत्ववादियों का ‘इतिहास’, मूलतः हैनरी मियर्स इलिएट और जॉन डाउसन के औपनिवेशिक इतिहास लेखन पर आधारित है। इन दोनों ब्रिटिश नौकरशाहों ने भारत के इतिहास को तत्कालीन शासकों के धर्म के आधार पर दो कालों में विभाजित किया - हिन्दू काल और मुस्लिम काल। यद्यपि इलिएट और डाउसन ने इस्लाम के उदय के पूर्व के इतिहास को शासकों के धर्म के आधार पर ‘हिन्दू काल’ निरूपित किया तथापि, उस समय के शासक स्वयं को हिन्दू धर्म के अनुयायी के रूप में नहीं देखते थे। 

‘हिन्दू’ दरअसअल एक भौगोलिक परिकल्पना थी। सिंधु नदी के पूर्वी तट के पीछे रहने वालों को हिन्दू कहा गया और इसका कारण यह था कि ईरानी सिंधु को ‘हिन्दू’ उच्चारित करते थे। ‘‘हिन्दू शब्द को यूरोपीयनों या मुसलमानों के भारत के संपर्क में आने से सदियों पहले गढ़ा गया था’’ (डोनिगर 2013, 5)।

‘‘हिन्दू शब्द, सिंधु नदी से उपजा है। इस शब्द का इस्तेमाल हिरोडोटस ने पांचवी सदी ईसा पूर्व, ईरानियों ने चैथी सदी ईसा पूर्व और अरबों ने आठवीं सदी में उन सभी लोगों के लिए किया जो भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर पूर्व में बहने वाली विशाल सिंधु नदी के उस पार रहते थे। आज भी इस नदी को भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु और यूरोप में इंडस कहा जाता है’’ (डोनिगर 2013, 6-7)।

भारत में मुसलमानों का शासन प्रारंभ होने के पूर्व जो शासक यहां राज करते थे, वे अपने धर्म को हिन्दू नहीं कहते थे। इसके उलट, बाहरी व्यक्ति इस क्षेत्र के निवासियों को हिन्दू कहते थे। हमारे औपनिवेशिक आकाओं ने सबसे पहले हिन्दू, जो कि एक भौगोलिक परिकल्पना थी, को धर्म के अर्थ में इस्तेमाल करना शुरू किया। अंग्रेजों ने जो जनगणनाएं करवाईं उनमें उन्होंने उन सभी लोगों को हिन्दू कहा जो मुसलमान, ईसाई अथवा अन्य किसी ज्ञात धर्म के अनुयायी नहीं थे। इलिएट और डाउसन ने पूर्व-मुस्लिम काल को हिन्दू काल बताया जबकि उस समय के शासक कई अलग-अलग धर्मों के अनुयायी थे जिनमें जैन और बौद्ध धर्म शामिल हैं।

हिन्दुत्ववादियों ने बिना विचार किए इलिएट और डाउसन के औपनिवेशिक इतिहास लेखन को स्वीकार कर लिया और उसे आगे बढ़ाया। हिन्दुत्ववादियों ने हिन्दू काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग बताया और मुस्लिम काल को एक ऐसे दौर के रूप में प्रचारित किया जिसमें भारत का पतन हुआ। इसके विपरीत, मुस्लिम राष्ट्रवादियों और साम्प्रदायिक मुसलमानों ने मुस्लिम काल का महिमामंडन करना प्रारंभ कर दिया। दोनों ने इतिहास को अपने-अपने नज़रिए से प्रस्तुत किया।

रोमिला थापर लिखती हैं कि ‘‘इतिहास की व्याख्या दुतरफा होती है, जिसमें आज को अतीत में प्रक्षेपित किया जाता है और अतीत को आज पर थोपा जाता है। इस अतीत को भविष्य का आधार बनाने की कोशिश इतिहासविद करते हैं’’। ईएच कार भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। वे लिखते हैं ‘‘जब हम इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की कोशिश करते हैं कि ‘इतिहास क्या है’ तब हम जाने अनजाने अपने आज के संदर्भ में सोच रहे होते हैं और इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ रहे होते हैं कि जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें हमारी क्या स्थिति है।’’

हिन्दुत्ववादी चिंतकों में भी इतिहास के संबंध में मतभेद हैं। यह इस बात से जाहिर है कि वे ताजमहल के मुद्दे पर अलग-अलग बातें कह रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने पहले कहा कि ताजमहल का भारत की संस्कृति और उसकी विरासत से कोई संबंध नहीं है और उत्तरप्रदेश के पर्यटन विभाग की पुस्तिका में से ताजमहल का ज़िक्र हटा दिया गया। भाजपा विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को भारत पर एक सांस्कृतिक धब्बा बताया और कहा कि ताजमहल का निर्माण गद्दारों ने किया था।

भाजपा सांसद विनय कटियार का कहना है कि ताजमहल मूलतः शिव मंदिर था। बाद में आदित्यनाथ ने ताजमहल को भारत का गौरव बताया और यह कहा कि उसका निर्माण भारतीयों ने अपने खून-पसीने से किया था। वे ताजमहल की यात्रा पर भी गए।

हिन्दुत्ववादियों का यह मानना है कि हिन्दू काल भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग था और उत्तर पूर्व से मुस्लिम आक्रमणकारियों के हमले के बाद, हिन्दुओं और हिन्दू संस्कृति का दमन हुआ और देश आर्थिक और सामाजिक पतन की राह पर चल पड़ा। उनका कहना है कि मुस्लिम आक्रांता तानाशाह और धार्मिक कट्टरवादी थे और इस कारण उन्होंने हिन्दू संस्कृति के हर प्रतीक को नष्ट किया, इस्लामिक संस्कृति को देश पर लादा और सभी हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया। इसके कारण दोनों समुदायों के बीच स्थायी युद्ध और शत्रुता की स्थिति बन गई और दो राष्ट्रों का जन्म हुआ - मुस्लिम और हिन्दू। उन्होंने इस तथ्य को नज़रअंदाज किया कि दरअसल युद्ध या शत्रुता, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नहीं थी वरन विभिन्न राजाओं के बीच थी, जो संयोग से हिन्दू या मुसलमान थे।

हिन्दुत्ववादियों का यह भी मानना है कि मुस्लिम समुदाय ने अपने बादशाहों के ज़रिए हिन्दुओं को अपमानित किया और उन्हें गुलाम बनाया और यह भी कि उनका उद्देश्य हिन्दू संस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर देना था। उनका कहना है कि मुसलमानों ने हिन्दुओं के मंदिरों को ज़मींदोज़ किया और उनके ऊपर अपनी मस्ज़िदें बना लीं। उनका ऐसा दावा है कि पूरे देश में कम से कम ऐसी तीन हज़ार मस्जिदें हैं जो मंदिरों को गिराकर बनाई गई हैं। इनमें वे अयोध्या की बाबरी मस्ज़िद और मथुरा और वाराणसी की मस्ज़िदों को भी शामिल करते हैं। परंतु हिन्दुत्ववादियों ने कभी उन तीन हज़ार मस्ज़िदें की सूची प्रस्तुत नहीं कि जो उनके अनुसार मंदिरों को गिराकर बनाई गई थीं।

इतिहास को इस रूप में प्रस्तुत करने का मुख्य उद्देश्य पूरे मुस्लिम समुदाय को कलंकित करना और सभी मुसलमानों को ऐसे अत्याचारी और उत्पीड़क बताना है, जिनके खिलाफ हिन्दुओं को एक होकर युद्ध लड़ना चाहिए और अतीत में उनके साथ हुए अन्याय का बदला लेना चाहिए। परंतु हिन्दू समाज विभिन्न हिस्सों में बंटा हुआ है और इसके सामाजिक ढांचे के निचले पायदानों के लोगों को किसी तरह के अधिकार प्राप्त नहीं हैं और वे ऊँची जातियों के दमन के शिकार हैं। इसके चलते हिन्दुओं को एक करना संभव नहीं है। इस समस्या को सुलझाने के लिए दूसरे समुदायों का दानवीकरण करना शुरू किया गया ताकि यह बताया जा सके कि अन्य धार्मिक समुदाय, हिन्दुओं के लिए एक बड़ा खतरा हैं और सभी हिन्दुओं को एक होकर उनसे मुकाबला करना ही होगा।

हिन्दुत्ववादियों का दूसरा उद्देश्य है ‘शत्रु समुदायों’ की ज़मीनों, संस्थाओं और इमारतों पर यह कहकर कब्ज़ा करना कि वे मूलतः हिन्दुओं की थीं। तीसरा उद्देश्य है विस्तारवाद को प्रोत्साहन देना। इसके अंतर्गत एक ऐसे अखंड भारत की कल्पना की जाती है जिसका पाकिस्तान और बांग्लादेश तो हिस्सा होंगे ही, उसमें दक्षिणी चीन, म्यांमार, श्रीलंका और संपूर्ण पश्चिम एशिया भी शामिल होगा। चौथा उद्देश्य है एक ऐसे काल्पनिक, महान प्राचीन भारत का चित्र प्रस्तुत करना, जिसने विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में अपरिमित उपलब्धियां हासिल की थीं।

ऐसा कहा जाता है कि हज़ारों साल पहले वैदिक काल में ही हिन्दुओं ने हवाईजहाज (पुष्पक विमान), प्लास्टिक सर्जरी (हाथी के सिर का मानव शरीर पर प्रत्यारोपण) आदि का आविष्कार कर दिया था। यही नहीं, महाभारत युद्ध में परमाणु मिसाइलों का प्रयोग किया गया था और उस समय जेनेटिक इंजीनियरिंग भी थी। अपने अतीत पर गर्व उत्पन्न करने का उद्देश्य न केवल हिन्दू समुदाय को एक करना है बल्कि यह भी बताना है कि हिन्दू, सभी समुदायों से श्रेष्ठ हैं, उन्हें पूरी दुनिया पर शासन करने का अधिकार है और इसके लिए वे एक एकाधिकारवादी, सैन्य राज्य का निर्माण कर सकते हैं। हिन्दुओं के अतीत के महिमामंडन का एक लक्ष्य यह भी है कि किसी अन्य समुदाय को यह अधिकार ही नहीं दिया जाए कि वह अपने अतीत को गौरवपूर्ण बताए। इसीलिए यह कहा जा रहा है कि ताजमहल और यहां तक कि काबा, हिन्दू ढांचे हैं क्योंकि ‘शत्रु समुदाय कोई शानदार इमारत बना ही नहीं सकता’।

हिन्दुत्ववादी चिंतक पुरूषोत्तम नागेश ओक ने ‘भारतीय इतिहास पुनर्लेखन संस्थान’ की स्थापना की और कई पुस्तकें लिखीं। हिन्दुत्ववादियों की इतिहास की समझ मुख्यतः, ओक के लेखन पर आधारित है। संक्षिप्त में ओक के दावे निम्नानुसार हैं:

1) इस्लाम और ईसाई धर्म दोनों वैदिक धर्म से उपजे हैं। वेटिकन, ‘वाटिका नगरी’ का अपभ्रंश है। अब्राहम शब्द ब्रह्मा से उपजा है, चर्च, संस्कृत शब्द विचारविमर्श का अपभ्रंश है और ईसा मसीह ऋग्वैदिक देवता थे। उनका यह भी कहना है कि अंग्रेज़ी शब्द डिसाइपिल (शिष्य), संस्कृत शब्द दीक्षापाल से उपजा है और यह भी कि पूरी दुनिया में कृष्ण की पूजा की जाती थी।

2) अरब प्रायद्वीप, प्राचीन काल में वैदिक धर्म का अनुयायी था और काबा एक हिन्दू मंदिर था। काबा के अंदर एक ऐसा बर्तन मिला था जिसमें भारतीय राजा विक्रमादित्य का नाम लिखा हुआ था। मोहम्मद, हिन्दू थे और अरब लोग, महादेव की पूजा करते थे और काशी और हरिद्वार की तीर्थयात्रा पर आते थे। अल्लाह एक हिन्दू देवता हैं।

3) विदेशी मुसलमानों को भारतीय स्मारकों का निर्माता बताना गलत है। मुसलमान तो भारतीय स्मारकों के विध्वंसक थे, निर्माता नहीं। उनका कहना है कि ताजमहल, कुतुबमीनार, हुमायूं का मकबरा, लालकिला और आगरा के किले सहित अन्य कई इमारतों का निर्माण ‘विदेशी’ मुसलमानों ने नहीं किया था। वे तो हिन्दू ढांचे थे जिन पर तत्कालीन शासकों ने जबरदस्ती कब्जा कर लिया। इस तरह के दावों का आधार, इन इमारतों के किसी कोने में बने किसी छोटे से चिन्ह को बना लिया गया जिसके बारे में यह कहा जा सकता हो कि वह मुस्लिम मूल का नहीं है। कुछ मामलों में नाम की समानता को दावे का आधार बनाया गया। ओक के अनुसार, ताजमहल दरअसल एक शिव मंदिर था जिसका नाम तेजोमहालय था और जिसे शाहजहां ने जयपुर के महाराजा के छीन लिया था। ओक का तर्क है कि ‘ताज’ व ‘महल’ दोनों संस्कृत मूल के शब्द हैं। ओक ने अपने दावों के समर्थन में इसी तरह के कई बेसिरपैर के तर्क दिए हैं।

4) कुल मिलाकर, उनका यह दावा है कि मुगल कलाओं से लेकर मुगल गार्डन तक किसी का अस्तित्व ही नहीं है। मुगल काल में भारतीय संगीत के विकास की बात एक मिथक है। मुगलों द्वारा देश में किसी स्मारक का निर्माण नहीं कराया गया। भारतीय राजा पोरस की 326 ईसा पूर्व में सिकंदर के साथ हुए युद्ध में जीत हुई थी। भारत की सीमाओं का विस्तार बाली से लेकर बाल्टिक सागर तक और केरल से लेकर काबा तक था और संस्कृत पूरे विश्व की भाषा थी।

इस तरह के बेहूदा दावों को, इतिहासविदों और इतिहास के विद्यार्थियों द्वारा तो चुनौती दी ही जा सकती है, एक सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि इनमें कोई दम नहीं है। हिन्दुत्ववादी इस इतिहास को अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के दिमाग में भर रहे हैं - ऐसे लोगों के जिनकी धार्मिक भावनाओं को उभार कर उन्हें इस विचारधारा से जोड़ा गया है। प्रयास यह है कि हिन्दू एक हों और उन सभी धर्मों के मानने वालों से घृणा करें जो ‘विदेशी’ हैं। हिन्दुत्ववादियों का ‘इतिहास’ ‘विदेशियों’ को अत्याचारी और आक्रांता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है। वह हिन्दुओं को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे इन ‘विदेशियों’ से घृणा करें और उनके विरूद्ध हिंसा करने से भी न सकुचाएं।

इस तरह के विचारों से भरे हुए लोग अपने विश्वासों की तार्किक विवेचना करने में सक्षम नहीं होते। वे केवल वह दोहराते रहते हैं जो उन्हें सिखाया-पढ़ाया गया है। वे अपने नेता के अंधभक्त होते हैं। उनके नेता यह मानते हैं कि झूठ को यदि बार-बार, लगातार दोहराया जाए तो वह सच लगने लगता है। यही कारण है कि टीपू सुल्तान जैसे महान भारतीय योद्धा, जिसने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अपनी जान गंवाई को भी मुसलमान के चश्मे से देखा जाता है।

यद्यपि इतिहास की विकृत व्याख्या के कारण देश को बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस और उसके बाद हुए भयावह दंगों की त्रासदी झेलनी पड़ी है तथापि अब भी समय है कि हम देश की असली सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से हमारे देश के नागरिकों को परिचित करवाएं। हमारी शिक्षा व्यवस्था में इस तरह के परिवर्तन करने होंगे ताकि वह विद्यार्थियों में मानवीय मूल्यों को बढ़ावा दे और उन्हें अतीत का सही, निष्पक्ष और तार्किक आंकलन करना सिखाए।

(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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